यूपी की बिसात पर भाई-बहन का रिश्‍ता

आलोक कुमार उत्तर प्रदेश में बिछी राजनीति के बिसात पर अजीबो-गरीब इत्तेफाक के साथ कई भाई और बहन के रिश्ते रोचक तरीके से दांव पर लगे हैं। कांग्रेस के अंदर से राहुल को किनारे कर प्रियंका बढेरा को सामने करने की बात उठ रही है। उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान या उसके बाद इसे बल मिल सकता है। युवराज राहुल के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का जादू नहीं चला तो कहा जा रहा है कि प्रियंका पर बड़ी जिम्मेदारी लाद दी जाएगी। भाई राहुल से बहन के रिश्ते को लेकर किसी विवाद के उभरने का राजनीतिक इंतजार लंबे समय से हो रहा है। राज्य का चुनाव कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के लिए आखिरी इम्तिहान साबित होने का अनुमान लगाया जा रहा है।

वैसे इतिहास के हवाले से आर्दश स्थिति की बात करते हुए लोग राहुल और प्रियंका के रिश्ते को कांग्रेस के अंदर जवाहरलाल नेहरू और विजयालक्ष्मी पंडित के रिश्ते की पृष्ठभूमि में देखते हैं। उत्‍तर प्रदेश की राजनीति में जवाहर लाल और विजया लक्ष्मी पंडित के भाई बहन के रिश्ते का एक इतिहास यह भी है। इतिहास गवाह है कि मोतीलाल नेहरू के इन दो संतानों के बीच हमेशा से इज्जत भरा फासला बना रहा। लोकप्रिय होने के बावजूद विजया लक्ष्मी पंडित राष्ट्रीय राजनीति के बजाय खुद को संयुक्त राष्ट्र संघ की राजनीति में समेटे रखी। कमला नेहरू की तरह ही विजया लक्ष्मी का स्वभाव बड़ी महात्वाकांक्षा पालने के बजाय सामान्य जीवन को ज्यादा तवज्जो देने वाला था।

लेकिन बीजेपी में उमा भारती के पदार्पण और उत्तर प्रदेश की कमान थामने के साथ ही आगामी चुनाव में भाई-बहन के राजनीतिक रिश्ते की कहानी ने व्यापकता ले ली है। मध्य प्रदेश की राजनीति से वाकिफ लोगों को पता है कि कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह निजी संबोधन में उमा भारती को ‘बहना’ कहते हैं। जबकि मंच की दिखावटी वैमनस्यता के बीच उमा भारती उम्र का लिहाज करते हुए दिग्विजय सिंह को सदा ‘भैय्या’ कहकर पुकारती है। मध्य प्रदेश के भैय्या और बहना पड़ोस के उत्तर प्रदेश में अपनी अलग-अलग हैसियत के साथ किस्मत अजमा रहे हैं। कह सकते हैं कि पंद्रह साल से उमा और दिग्विजय सिंह के बीच छिड़ा समर यहां नया आकार लेने जा रहा है। समर तो जारी है लेकिन समर का क्षेत्र मध्यप्रदेश से बदलकर उत्तर प्रदेश हो गया है।

उमा भारती की सक्रियता बढ़ने के साथ ही दिग्विजय सिंह से वार और पलटवार का रोचक सिलसिला शुरू होने वाला है। दिग्विजय सिंह के अंदर उमा भारती के खिलाफ गहरा घाव है कि दस साल पहले मध्य प्रदेश में दस साल के अक्षुण्ण दिग्गी राज को बहन उमा ने ही चटकाया था। इसके उलट उमा भारती को भरोसा है कि वह दिग्विजय सिंह के चार सालों के मेहनत के गुड़ को गोबर कर पाएंगी। राहुल गांधी के लिए जमीन की तैयारी में दिग्विजय सिंह बीते चार साल से सिर्फ यूपी को समझने, सोचने और करने में ही व्यस्त हैं। वैसे दिग्विजय सिंह के अलावा उमा के निशाने पर मुलायम सिंह या मायावती भी होंगी। उमा भारती की कोशिश होगी कि भगवा राजनीति के विरोध के नाम पर मायावती, मुलायम और कांग्रेस को खुद के पीछे दौड़वा लें। लेकिन इस कोशिश की सफलता या विफलता बीजेपी के घाघ नेताओं के सहयोग अथवा भीतरघात के चोट पर निर्भर करेगा। उमा भारती की लोध जाति उत्तर प्रदेश औऱ मध्य प्रदेश में समान रूप से बंटी हुई है। इसलिए भी आसार कम हैं कि सोशल इंजीनियरिंग की नींव पर खड़ी मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती के खिलाफ उत्तर प्रदेश में बाहरी नेतृत्व की बात ज्यादा उभर पाएगा।

भाई-बहन का एक घोषित रिश्ता मुख्यमंत्री मायावती और बीजेपी नेता लालजी टंडन के बीच है। 1996 के गेस्ट हाउस कांड के बाद से लालजी टंडन के लिए मायावती के भाई-बहन का घोषित रिश्ता है। पहले रक्षा बंधन के मौके पर मायावती सार्वजनिक तौर पर राखी बांधती थी लेकिन जब से अहसास हुआ कि राजनीति में कोई भाई और बहन नहीं बल्कि प्रतिद्वंदी होता है,  मायावती ने लालजी टंडन को सार्वजनिक तौर पर राखी बांधना बंद कर दिया है। कुल मिलाकर मार्च 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में इन्हीं भाई बहनों के बीच एक की हार पर दूसरे की जीत टिकी होगी। हाल के दिनों में उमा भारती के भैय्या दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस को जमीन से उठाने के लिए अथक मेहनत की है। राहुल भैय्या को जमाने के लिए दिग्विजय सिंह अपने दस साल पुराने अवतार में लौट आए हैं जब उनके उलट मिजाज से मध्य प्रदेश के तमाम अखबारों की सुर्खियां बना करती थी। दिग्विजय सिंह की पहचान धुर भगवा विरोधी की है। कहते हैं कि दिग्विजय सिंह के दस सालों के शासन में भगवा राजनेताओं को इस कदर तिरस्कृत करते रहे कि जनता में भगवा की राजनीति लेकर खास संवेदना जग गई और आखिरकार मध्य प्रदेश वापस बीजेपी के हाथ में चला गया।

उमा भारती के पदार्पण से पहले तक कांग्रेस के लिए बीजेपी से बड़ी दुश्मन मायावती थी जो कांग्रेस के दलित और मुस्लिम के गठजोड़ से पुराने तख्त पर कब्जा करके राजनीति कर रही हैं। राहुल गांधी को चाणक्य बने दिग्विजय सिंह इसलिए कलावती की कुटिया में खाने और सोने के लिए भेजते रहे कि उत्तर प्रदेश की तमाम कलावती कांग्रेस के वापस लौट आएं। दिग्विजय सिंह के खुद का ओसामा बिन लादेन को ओसामा जी कहने का बयान या फिर राहुल गांधी के अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ के आगे भारत के लिए मुस्लिम उग्रवाद से ज्यादा बड़ा खतरा हिंदू प्रतिक्रियावादियों को बताने की बात उत्तर प्रदेश चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं को फिर से कांग्रेस की तरफ आकर्षित करने के लिए ही आया था।

फिलहाल दलित भाइयों का बहन मायावती से मोह टूटता नजर आ रहा है और न ही मुस्लिम भाइयों को लग रहा है कि प्रदेश में कांग्रेस इतनी मजबूत हो गई है कि वो बहन मायावती या बिरादाना आचरण करने वाले मुलायम सिंह को छोड़कर जाने की जरूरत आ पड़ी है। दिग्विजय सिंह और राहुल गांधी की तरफ से अलग-अलग तरीके से चली गई यह चाल फिलहाल फलीभूत होता नजर नहीं आ रहा। लेकिन सच है कि आने वाले दिनों में इस वोट के बंदरबांट के लिए अलग अलग राजनीतिक दलों की तरफ से कुछ दांव और आजमाए जाएं। इस बीच असम की तरह उत्तर प्रदेश में भी अल्पसंख्यकों की अलग राजनीतिक दल की जरूरत ने जोर पकड़ रखा है और कौमी एकजुटता के नाम पर पीस पार्टी के लोकप्रियता की बात सामने आ रही है। कांग्रेस के लिए यह एक नई मुसीबत है। मुसीबत इसलिए की अगुवा बनकर दिग्विजय सिंह ने तरुण गोगोई की तरफ से असम में अजमाए गए नुस्खे को घोषित तौर पर नकार दिया है और बहन उमा भारती के आगमन के मौके पर चिंघाडते हुए एलान कर दिया है कि प्रदेश चुनाव में कांग्रेस पार्टी किसी भी दल के साथ तालमेल नहीं करेगी। इस एलान का कांग्रेस से ज्यादा राहुल गांधी के भविष्य की राजनीति पर असर पड़ने का अंदेशा लगाया जा रहा है।

इधर सबसे होशियार बहन मायावती नजर आ रही हैं। भट्ठा परसौल जैसे मामलों को गाहे बगाहे छेड़कर किसानों की राजनीति करने वाले भाइयों के दलों के बीच हुर्रमपेट करती रही हैं। समय-समय पर किसान अत्याचार के इन मसलों पर समाजवादी धार पर खड़े तमाम भाई आपस में ही प्रतिद्वंदी बनने को मजबूर  हैं। इस खेल में बीच-बीच में बहन मायावती का भाई बनने तक की लालसा पालने वाले भाई अजीत सिंह को नुकसान ज्यादा हुआ है। खुद को मतदाताओं की कसौटी पर कसने के लिए अजीत सिंह के परेशान वोट बैंक पर दावेदारी के लिए मुलायम सिंह के साथ बीजेपी राजनाथ सिंह और राहुल गांधी की पार्टी के लोग बीते चार सालों से लगातार कसरत कर रहे हैं। कसरत कराने के बाद मायावती ने लक्ष्मी चौधरी के सहारे किसानों नेताओं का जमघट लगाकर सब प्रतिद्वंदियों को चमका रखा है। साथ ही आगे के लिए ये सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि कांग्रेस की डुगडुगी के बीच दलित किसानों का बीएसपी से अटूट रिश्ता बना रहे। दबंग किसानों को अजीत सिंह और मुलायम सिंह के बीच बंटने के लिए बीएसपी ने पहले ही छोड़ रखा था। इसबार छूटे दबंग किसानों को समेटने के लिए बीजेपी और कांग्रेस ने भी पसीना बहा रखा है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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