ये न्यायिक सक्रियता के प्रमाण हैं या फिर दखलंदाजी

गिरीश जी: क्या कहती हैं नजीरें : ब्रिटेन में लोकतंत्र का हजार वर्षों का इतिहास है. वहां मानवाधिकारों को लेकर ‘मैग्नाकार्टा’ घोषणा पत्र 1215 में जारी हुआ था. 1688 में ‘ग्लोरियस रिवोल्यूशन’  हुआ, जिसे दुनिया रक्तहीन क्रांति के नाम से जानती है. फिर दुनिया में मध्यवर्गीय क्रांतियों के रूप में 1776 की अमेरिकी क्रांति और 1789 की फ्रांसीसी क्रांति का सूत्रपात हुआ. बाद में बीसवीं सदी में अनेक देशों में समाजवादी क्रांतियां भी हुईं. लेकिन हर आधुनिक व्यवस्था खुद को बेहतर लोकतांत्रिक साबित करने के लिए केंद्रित शक्ति की अवधारणा से हट कर माँटेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित ‘शक्तियों के पृथक्करण’  को अपने-अपने ढंग से लागू करती रही.

भारत में भी इस पृथक्करण को संसदीय व्यवस्था के तहत स्वीकार किया गया. हालांकि विवाद की स्थिति में अमेरिका में एक दौर ऐसा भी आया जब वहां की कार्यपालिका ने नाराजगी में यह कहा कि न्यायपालिका ने फैसला तो दे दिया, अब वे उसे लागू भी करके दिखा दें. लेकिन यह दौर क्षणिक रहा और निपट गया. आमतौर पर सभी देशों ने इस पृथक्करण को मान्यता ही दी. आज पृथक्करण के बीच जिस तरह से भारत में न्यायिक सक्रियता बढ़ी है-  वो न केवल विचारणीय है बल्कि नए बेहतर संकेत भी करती है. कृपया हाल के कुछ फैसलों पर विचार करें.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कुछ समय पहले यह टिप्पणी करके कि अब देश में और नंदीग्राम और सिंगूर नहीं बनने दिया जाएगा, यह स्पष्ट संदेश दे दिया था कि भूअधिग्रहण मसले पर अब अदालत चुप बैठने वाली नहीं है, लेकिन ग्रेटर नोएडा में किसानों की जमीनों की वापसी पर उसका फैसला ऐतिहासिक है. यह सिर्फ मायावती सरकार से 156 हेक्टेयर भूमि की वापसी का मसला नहीं है-  यह नजीर है ‘लोक कल्याणकारी’  होने का दावा करने वाली सरकारों के चरित्र पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी का. इससे किसानों से विकास के नाम पर औने-पौने दामों पर जबरदस्ती जमीन लेकर उसे बिल्डरों, भूमाफिया, प्रभावशाली, पैसेवालों के गठजोड़ को कथित ‘जनहितकारी’  सरकार द्वारा मुहैया कराने और फिर उनके वहां मॉल्स, आलीशान इमारतें, भव्य कॉलोनियों के निर्माण द्वारा हजारों फीसदी मुनाफे पर बेचने के बडे़ पैमाने के धंधे का न केवल स्पष्ट खुलासा हुआ है, बल्कि इस पर विराम का रास्ता भी साफ हुआ है.

यह बात सिर्फ एक कथित विकास के ढोंग के पर्दाफाश की ही नहीं है, न्यायपालिका के इस ‘कृत्य’ से संविधान की प्रस्तावना में वर्णित ‘हम भारत के लोग..’  की भावना और मूल विचार को भी बल मिला है.यह कार्यपालिका यानी कि सरकार द्वारा सीमाओं का अतिक्रमण करके जनअधिकारों में हस्तक्षेप पर न्यायिक रोक ही नहीं है, दलालों-मध्यस्थों की बढ़ती लूट की प्रवृत्ति पर नियंत्रण भी है, जो कि आमजन विरोधी मानसिकता से संचालित हो रहा है. पिछले दिनों इसी फैसले के साथ ही कई अन्य अदालती निर्णय भी स्पष्ट रूप से यह रेखांकित कर रहे हैं कि सरकार और व्यापक संदर्भ में समाज के स्तर पर न्यायालय की जो पहल हुई है, उसने बहरों को सुनाने और सोते हुओं को जगाने का काम किया है.

ऐसा ही फैसला छत्तीसगढ़ में सलवा जुडूम और सरकारी शह पर आदिवासियों के कोया कमांडो दस्ते के निर्माण को अवैध ठहराना भी है, जिन्हें विशेष पुलिस अधिकारी (एसपीओ) कहा जाता है. कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि माओवादियों से सुरक्षा की जिम्मेदारी प्रशिक्षित सुरक्षा बलों की है-  इस जिम्मेदारी को अशिक्षित और अप्रशिक्षित एसपीओ के हवाले नहीं सौंपा जा सकता. सच तो यह है कि तीन हजार रुपए प्रतिमाह वेतन और हथियार देकर आदिवासी को आदिवासी के खिलाफ खडे़ करने की यह प्रवृत्ति ही गलत है. माना कि ‘बांटो और राज करो’  की नीति पर अंग्रेज लंबे समय तक हमें गुलाम बनाए रहे, लेकिन क्या आजाद भारत में कोई ‘कल्याणकारी’, जनता द्वारा निर्वाचित जनता की सरकार अपनी ही जनता के खिलाफ उसी साम्राज्यवादी नीति पर चल सकती है?

कहने वाले इसे न्यायिक सक्रियता भी कह सकते हैं, जब विदेश से काले धन की वापसी के लिए सुप्रीम कोर्ट को सक्रियता दिखाते हुए समिति बनानी पड़ती है. सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पी.डी. दिनाकरन के खिलाफ महाभियोग चलाने में लगे अवरोध को भी हटाती है, और आय से अधिक संपत्ति को लेकर अनेक नेताओं-प्रशासकों की तर्ज पर ओमप्रकाश चौटाला के नौनिहालों अजय और अभय चौटाला के खिलाफ आपराधिक मामलों को लेकर जिस तरह से कोर्ट ने सहमति दी है, वो खुद में महत्वपूर्ण पहल है. क्या ये न्यायिक पक्ष से कहीं ज्यादा समाज और पूरे तंत्र को दिशा देती हुई नजीरें नहीं हैं?

दरअसल, कोई भी सभ्य आधुनिक-लोकतांत्रिक व्यवस्था जिस शक्ति पृथक्करण पर चलती है, वहां शक्ति केंद्रीकरण की राजतंत्रीय-सामंती प्रवृत्ति के विपरीत इनका कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका में विभाजन होना आम बात है, लेकिन वहीं असामान्य सच यह भी है कि जब तीनों में से कोई अंग निष्क्रिय होता है, या किन्हीं कारणों से सीमा का अतिक्रमण करता है, जिसकी नजीर हाल में अनेक राज्य सरकारों की गतिविधियां भी हैं, तो दूसरे अंग उसे संतुलित और मर्यादित करने का ही काम करते हैं. आज जब ऐसी अपूर्व पहल हो रही है, तो इसका स्वागत ही होना चाहिए.

लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

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