रिकार्डतोड़ वोटिंग के संकेत क्या है?

गिरीशजीतमिलनाडु के मदुरई के तिरुमंगलम क्षेत्र की 78 साल की यसोदाई बुधवार को विधानसभाई चुनाव में वोट डालते समय चल बसीं. अस्वस्थ होने के बाद भी वोट देने की जिद थी. घर से 300 मीटर दूर पैदल चल कर वोट डालने बूथ पर गईं. ऊंगली पर वोट डालने का काला निशान भी लगा पर वोटिंग मशीन का बटन दबाने के पहले ही चल बसीं. वैसे तो चुनावों में ऐसे उम्रदराज बुजुर्ग वोट डालते ही हैं, लेकिन अस्वस्थता में भी वोट डालने की जिद और इस घटना को निम्न वास्तविकताओं के संदर्भ में देखा जाए तो बेहतर होगा.

1967 के गैरकांग्रेसवाद की लहर के समय ही तमिलनाडु में अप्रत्याशित रूप से रिकार्ड 75 फीसदी वोट पड़े थे,  इस बार भी लगभग उतने ही वोट पडे़.  तमिलनाडु के साथ ही केरल और पांडिचेरी में भी भारी संख्या में वोटिंग हुई. पांडिचेरी में तो मतदान 83.6 फीसदी रहा जो कि अभी तक का रिकार्ड है. इसी तरह केरल में यह रिकार्ड 74.4 प्रतिशत रहा जो कि अब तक के राज्य के मतदान प्रतिशत में सर्वाधिक है. यह 2006 में विधानसभाई चुनाव में 72.38 फीसदी था.

सवाल है कि मतदान के ये रिकार्ड प्रतिशत क्या किसी लहर के संकेत हैं या फिर राजनीतिक जागरूकता के? कहीं ये लाखों करोड़ के स्पेक्ट्रम तथा अन्य दूसरे घोटालों और परिवारवाद के खिलाफ खुन्‍न्‍ासभरी लामबंदी या नाराजगी तो नहीं या फिर राज्य सरकारों के भ्रष्ट आचरण पर सजग प्रतिक्रिया का उतावलापन भर है?

पिछले दिनों तमिलनाडु में मतदाताओं के बीच बांटने के लिए ले जाए जा रहे साठ करोड़ रुपए जब्त किए गए थे, इसी तरह केरल में भी वोटरों की खरीद-फरोख्त के लिए ले जाए जा रहे 75 लाख रुपए चुनाव आयोग ने जब्त किए, ये कहीं उसकी नाराजगी तो नहीं? लेकिन ऐसा तो चुनावों के दौरान पहले भी होता रहा है, इसमें ऐसा नया क्या है. तो क्या इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्‍ना हजारे की गांधीवादी पहल का असर माना जाए? लेकिन ऐसा भी कैसे माना जा सकता है क्योंकि अन्‍ना तो खुद चुनावी राजनीति को भ्रष्टाचार का पर्याय मान रहे हैं तो फिर जनता की ऐसी बढ़चढ़ कर भागीदारी के क्या अर्थ हैं? कहीं मतदाताओं के मन में सत्ता-प्रतिष्ठानों के भ्रष्ट आचरण पर किसी समवेत अभिव्यत्ति की योजना तो नहीं? फिलहाल ऐसे अनेक सवाल हवा में तैर रहे हैं.

मजे की बात है कि बुधवार को विधानसभाई चुनावों में जबर्दस्त वोटिंग की खबरें सिर्फ दक्षिण के राज्यों से ही नहीं है, खबर ये भी है कि बुधवार को ही जम्मू कश्मीर के पंचायत चुनावों में भी रिकार्ड वोटिंग हुई है. घाटी और जम्मू के आठ क्षेत्रों में अप्रत्याशित रूप से 78 फीसदी वोट पडे़. कुपवाडा में तो 86 फीसदी वोट पडे. ऐसा तब हुआ जबकि पृथकतावादियों ने बायकाट की अपील कर रखी थी, और आतंकियों का डर था सो अलग. कश्मीर में 2008 के विधानसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत 65 था, जो उस समय खुद में बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन कई चरणों में होने वाले मौजूदा पंचायत चुनाव के इस पहले चरण के मतदान के संकेत स्पष्ट हैं कि अब लोग कश्मीर की ‘आजादी और बायकाट की मांग’ पर ध्यान नहीं दे रहे हैं. अब स्थानीय स्तर पर सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, विकास की मांग प्रमुख है. और यह तभी हो सकता है जब विभिन्‍न क्षेत्र अपने योग्य नुमाइंदों को ही चुनें. पिछले दिनों उत्तरपूर्व में असम चुनावों में भी मतदान का प्रतिशत बेहतर ही रहा था. खबर है कि अब प.बंगाल के दार्जिलिंग में भी बायकाट और बंद की बातें दरकिनार हो रही हैं और लोग चुनाव में हिस्सा ले रहे हैं.

तो क्या इसे इस बात का संकेत नहीं माना जाना चाहिए कि व्यापक स्तर पर लोगों का लोकतांत्रिक रूझान बढ़ा है और इसका प्रमाण सभी जगह बढ़ता मतदान प्रतिशत और लोगों की बड़ी भागीदारी है? अब इसके पीछे घोटालों-भ्रष्टाचार के प्रति नाराजगी है या विकास के प्रति ललक या फिर जनप्रतिनिधियों के चुनाव के प्रति सतर्कता, ये तो शोध का विषय है, लेकिन चुनाव आयोग के धरपकड़ अभियान के प्रति भी एक सकारात्मक दृष्टिकोण है. इसी श्रृंखला में आंध्र के कडप्पा संसदीय क्षेत्र में चुनाव आयोग ने बुधवार को ही एक करोड़ रुपये जब्त किए हैं. यहां आगामी आठ मई को संसदीय सीट के साथ ही विधानसभा सीट का भी चुनाव है और टक्कर वाईएसआर के बेटे जगनमोहन रेड्डी और कांग्रेस के बीच है.

बहरहाल, इन चुनावी परिदृश्य की खास बात ये भी रही कि ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में कहीं ज्यादा रही. साथ ही पहली बार वोट डालने वाले युवा वोटर भी भारी संख्या में बूथ केंद्रों की लाइनों में दिखे. इन्हें भी सकारात्मक संदेश माना जा सकता है. फिलहाल मतदाताओं का बढ़चढ़कर मतदान में भाग लेना जहां लोकतंत्र के लिए बेहतर संकेत है वहीं भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए नई इच्छाशत्ति की गोलबंदी का आभास भी कराता है. लेकिन कोई ताज्जुब नहीं यदि इस नये लोकतांत्रिक रूझान के पीछे जंतर-मंतर पर हुए अन्‍ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी अनशन का भी असर हो क्योंकि इसने पूरे देश में न केवल गांधी की ‘नैतिक राजनीति’ को फिर से चर्चा में जीवित किया है बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक माहौल भी निर्मित किया है. काश! ये रूझान आगे भी बना रहे.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ में कल प्रकाशित हो रहा है. गिरीशजी से संपर्क girishmisra@lokmat.com  के जरिए किया जा सकता है.

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