लोकतंत्र का ‘तांडव’

गिरीशजी: ट्यूनीशिया, मिस्र के बाद अब किसका नंबर : मध्य-पूर्व में लोकतंत्र की आंधी चल रही है. मिस्र और ट्यूनीशिया में सत्ता शिखर के दो टीले ढह चुके हैं, अन्य कई ढहने के कगार पर हैं. जनता उत्साह में है. वो हर हाल में आगे बढना चाहती है- उसे आजादी से कम कुछ भी स्वीकार नहीं. 1991 में सोवियत संघ के विघटन के साथ अनेक समाजवादी देशों में भी ऐसी ही जम्हूरी हवा चली थी, जब देखते-देखते काफी कुछ बदल गया था. तब भी जनता इसी तरह खराब आर्थिक व्यवस्था, भ्रष्टाचार-कुशासन-बेरोजगारी की मुखालिफत में और खुली-उदारवादी आजादी की मांग करते हुए सडकों पर उतर गई थी और सारे लौह आवरण छिन्न-भिन्न हो गए थे. सब कुछ ताश के पत्ते की तरह बिखर गया था. तब भी नया उभरता मध्य वर्ग बदहाल जनता का नेतृत्व कर रहा था और आज भी पश्चिमेशिया और उत्तरी अफ्रीका के अरब देशों में यही तबका नेतृत्वकारी भूमिका में है.

अंतर सिर्फ यह है कि अब युवाओं की भागीदारी कहीं ज्यादा है, जो हर हाल में बदलाव चाहती है. वो बेकारी से त्रस्त होकर घुट-घुट कर जीने के बजाय अपने सपनों को पूरा करने पर आमादा है. उसमें अब और धैर्य नहीं हैं. नई तकनीक सोशल नेटवर्किंग साइट ने लोगों को देश-दुनिया से ही नहीं, आपस में भी जोड़ दिया है, जहां इस मुद्दे पर आम सहमति है कि वे अब और भ्रष्ट दुर्व्‍यवस्था को स्वीकार करने को तैयार नहीं. लेकिन इन्हीं के बीच शिया-सुन्नी विवाद की बात उठ रही है तो मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ ही हमास, हिजबुल्ला ही नहीं अल कायदा जैसे कट्टरपंथी संगठनों की भी चर्चा है. उधर, पश्चिमी देश किसी भी हालत में तेल और गैस के भंडारोंवाले इन इलाकों से अपना शिकंजा ढीला करने को तैयार नहीं, और इसे बनाए रखने के लिए लोकतंत्र की बात करते हुए अपने चाटुकार, तानाशाही-राजतंत्रों को बरकरार रखना उनका पुराना शगल है. पश्चिम को लेकर नाक-भौं सिकोड़ने वाली ताकतों में एक ओर ईरान सरकार है जो मिस्र, ट्यूनीशिया में 1979 की ईरानी इस्लामी क्रांति की गूंज सुन रहा है तो दूसरी ओर लीबिया की कर्नल गद्दाफी की सरकार है, जो 1969 से अब तक 40 साल के तानाशाही निजाम को सिर्फ पश्चिम विरोध के नाम पर जिंदा रखना चाहती है. तो ये है परिदृश्य. इसके थोड़ा और खुलासे के लिए कृपया चंद घटनाओं पर भी गौर करें-

– ईरान में राजधानी तेहरान के अलावा मशाद, इशफाहान और शिराज में सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए हैं तो बहरीन का पर्ल स्क्वायर काहिरा का तहरीर स्क्वायर बन गया है. पर्ल स्क्वायर में प्रदर्शनकारियों पर हुई गोलीबारी में अनेक लोग मारे गये हैं तो पचासों  घायल हुए हैं.

– लीबिया में अब तक राजधानी त्रिपोली, पूर्वी शहर बेनगाजी और अलबैदा में सरकार विरोधी प्रदर्शन में 84 लोग मारे गए. वहां कर्नल गद्दाफी के एकछत्र राज का आलम यह है कि लीबिया में संविधान नाम की चीज का कोई महत्व नहीं है. वैसे कुर्सी जाने की आशंका से भयभीत गद्दाफी ने सभी सरकारी कर्मियों के वेतन को दोगुना बढ़ाने की घोषणा के साथ ही पहली बार 110 राजनीतिक बंदियों को रिहा किया है. गौरतलब यह है कि तानाशाह को पहली बार ऐसे विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

– यमन अरब देशों में काफी गरीब है. यहां अमेरिका समर्थक राष्‍ट्रपति अली अब्दुल्ला सालेह पिछले 32 साल से तख्त पर आसीन हैं. जनता के प्रदर्शन पर दमन जारी है. राजधानी साना में विश्वविद्यालय क्षेत्र प्रदर्शनकारियों के गढ़ हैं. भयाक्रांत राष्‍ट्रपति सालेह ने मिस्र के मुबारक की तर्ज पर यह कहना शुरू कर दिया है कि वह खुद सत्ता में नहीं रहना चाहते और 2013 में वह राष्‍ट्रपति का चुनाव नहीं लडेंगे और न ही उनका बेटा अहमद उनका उत्तराधिकार संभालेगा. सालेह के राजकाज की स्थिति इतनी खराब है कि उनका शासन सिर्फ राजधानी साना तक ही सीमित है. बाकी देश में शक्तिशाली कबीलों का शासन चलता है.

– अल्जीरिया में 19 साल पुराना आपातकाल हटा लिया गया है. ऐसा प्रदर्शनकारियों के विरोध को शांत करने के लिए किया गया है. लेकिन अल्जीरिया के मानवाधिकार कार्यकर्ता, ट्रेड यूनियनों, वकीलों और युवाओं ने प्रदर्शन करके राष्‍ट्रपति अब्दुल अजीज बूटेफलीका के 12 साल के शासन के खात्मे की मांग की है.

– फलस्तीन के राष्‍ट्रपति महमूद अब्बास की पहल पर फलस्तीनी कैबिनेट ने इस्तीफा दे दिया है. उस पर अकर्मण्यता के आरोप थे. अब परिवर्तन का संकेत देते हुए अब्बास नई कैबिनेट बनाना चाहते हैं.

– जार्डन में भी हजारों प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार की मुखालिफत और व्यवस्था में सुधार की मांग करते हुए विरोध जारी रखा है.

– इराक में भी पिछले एक महीने के भीतर सबसे बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ और नाराज भीड़ ने अनेक सरकारी इमारतों-वाहनों को फूंक दिया.

– कुवैत से भी खबर है कि अनेक संसद सदस्यों समेत विपक्ष आगामी आठ मार्च को विरोध प्रदर्शन करके मंत्रिपरिषद में बदलाव की मांग करेगा. लेकिन वह शासक अमीर को हटाने के पक्ष में नहीं है.

लेकिन इन खबरों के संकेत तब तक अधूरे हैं जब तक कि बहरीन और ईरान की बात थोडी विस्तार से न की जाए. इनका जिक्र साथ-साथ इसलिए कि दोनों जगह सरकार विरोधी प्रदर्शनों में तेजी है और दोनों शिया बहुल हैं. दोनों का खास महत्व इस मायने में भी है कि जहां बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेडे का ठिकाना है, जो पश्चिम को जब-तब आंख तरेरने वाले ईरान को सीमा में रखने को पश्चिमी संबल है और फिर तेल रिफाइनरी के साथ बड़ा वित्तीय केंद्र भी, वहीं ईरान की प्रभावी शिया बिरादरी के दिल में हमेशा इस बात की टीस रहती है कि 70 फीसदी शिया आबादी वाले बहरीन पर अमेरिका समर्थक राजा हमद बिन इसा अल खलीफा राज क्यों करे जबकि वह अल्पसंख्यक बहरीनी सुन्नी तबके से है? क्या सिर्फ इसलिए कि वहां सुन्नी तबका संपन्न है और शिया सामान्यतः गरीब? बहरहाल 12 लाख की आबादी वाले इस छोटे से देश बहरीन में 54 फीसदी आबादी बाहरी देशों के श्रमिकों की है, जिनमें आधे तो भारतीय हैं. बाकी पांच लाख 68 हजार बहरीनी हैं- और इन्हें ही वोट का हक है. इनमें पौने चार लाख शिया हैं और लगभग पौने दो लाख बहरीनी सुन्नी. शियाओं का आरोप है कि राजा ने बाहरी देशों के सुन्नियों को बहरीनी नागरिकता दी है, जिससे वहां सुन्नी आबादी बढ़ सके. राजा और ऊपरी सदन को किसी भी प्रस्ताव पर ‘वीटो’ का अधिकार है और राजा ही ऊपरी सदन में सदस्यों को मनोनीत करता है, इससे भी सुन्नी आधिपत्य बढ़ा है. 40 सदस्यीय निचले सदन में भी सिर्फ 18 शिया हैं जबकि 22 सुन्नी सदस्य. राजा को संसद को भंग करने का भी अधिकार है.

बहरीन में गांवों का गरीब तबका मुख्यतः बहरीनी शिया है. शिया समुदाय की पार्टी विफाक है जो बराबरी के हक के लिए आंदोलनरत है. फिलहाल राजधानी मनामा के पर्ल स्क्वायर पर गोलियों और टैंकों से हुए दमन के बीच बहरीनी जनता की मांग यही है कि प्रधानमंत्री शेख खलीफा बिन सलमान अली खलीफा इस्तीफा दें. शेख खलीफा राजा हमद अल खलीफा के चाचा हैं जो दशकों से प्रधानमंत्री हैं. बहुसंख्यक जनता यह भी चाहती है कि प्रधानमंत्री राजा द्वारा मनोनीत होने के बजाय जनता द्वारा निर्वाचित हो, जो उन्हें अभिव्यक्ति दे सके. उधर, अमेरिका और ब्रिटेन ने बहरीन सरकार से अपील की है कि प्रदर्शनकारियों पर सख्ती न की जाए. राजा हमद ने भी राष्‍ट्रीय टीवी प्रसारण में शिया युवाओं की मौत पर खेद जताते हुए जांच कराने का आश्वासन दिया है. मीडिया-इंटरनेट पर नियंत्रण में भी ढील की घोषणा की है. लेकिन सबसे दिलचस्प पहलू तो यह है कि लीबिया के कर्नल गद्दाफी की तरह बहरीन के हर परिवार को लगभग तीन हजार अमेरिकी डालर देने की बात भी राजा हमद ने कही है. स्पष्ट है कि यह लालच देने और जनता को खरीदने का प्रयास है. लेकिन दूसरी ओर सरकार एक साल पहले सरकार विरोधी प्रदर्शन के आरोप में 25 शियाओं पर मुकदमा भी चला रही है, जिसकी सुनवाई 24 फरवरी को है. कुल मिलाकर इससे नाराजगी बजाए घटने के और बढ़ रही है.

उधर, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने यह कहकर कि मिस्र की क्रांति 1979 की ईरानी क्रांति की गूंज है, और यह निरंकुश सरकार ही नहीं, पश्चिमी लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के भी खिलाफ है, स्थिति को नया मोड़ दे दिया है. खामेनेई की इस टिप्पणी के खिलाफ न केवल ईरानी विपक्षी नेता मीर हुसैन मुसाबी और मौलवी कुरूबी ने, बल्कि व्यापक स्तर पर विरोधस्वरूप कहा गया कि यह 1979 की इस्लामी क्रांति नहीं, बल्कि 2009 के उस जन आंदोलन से ज्यादा प्रेरित है, जब 30 लाख लोग सत्ता तंत्र के खिलाफ ईरान की सड़कों पर उतरे थे,  और जब उनका बर्बर दमन किया गया था.मजे की बात तो यह है कि मुस्लिम ब्रदरहुड ने भी ईरान सरकार के मत का विरोध करते हुए इसे ‘इस्लामी आंदोलन’ मानने से इनकार कर दिया है. ब्रदरहुड ने कहा कि यह मिस्र की पूरी जनता की जीत है, जिसमें मुस्लिम और ईसाई दोनों शामिल हैं, साथ ही लोकतंत्र और आजादी चाहने वालों की भी जीत है. फिलहाल असलियत जानने के लिए ईरानी शासकों को विपक्ष द्वारा आयोजित रैली में गलियों-सड़कों से उठने वाले जनता के उन नारों पर भी ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि-

‘पहले बेन अली, मुबारक,
अब सैयद अली की बारी’

बहरहाल, इन हालातों में मिस्र-ईरान के बीच समानता के बिंदु भी तलाशे जाने चाहिए. दोनों ही जगह युवा तबके की बहुलता है लेकिन उनके लिए अवसरों की भारी कमी है. भ्रष्टाचार, कुशासन, तानाशाही से क्षुब्ध निराश-हताश लोग  लोकतंत्र की मांग कर रहे हैं- यह बात जितनी सच है उतनी यह भी कि युवाओं में अब धैर्य नहीं है. सोशल नेटवर्किंग और इंटरनेट ने सारी दुनिया की तस्वीर उसके सामने खोल दी है. यही स्थिति सारे अरब देशों में है. सभी खुला लोकतंत्र चाहते हैं. लेकिन उनकी जरूरत का लोकतंत्र कैसा हो, ये तो वे ही तय करेंगे. गौर करने की बात ये भी है कि मिस्र और ट्यूनीशिया तुलनात्मक दृष्टि से उदार थे, इसलिए वहां जनता का विरोध प्रभावी रहा, लेकिन ऐसा ही दूसरे देशों में या अन्य सैन्य तानाशाहियों में भी संभव हो सकेगा, ये जरूरी नहीं. दूसरी चुनौती ये भी है कि लोकतंत्र सिर्फ एक दिन में ही नहीं आता. लोकतंत्र सिर्फ चुनाव, आन्दोलन या प्रदर्शन भी नहीं है. लोकतंत्र एक प्रक्रिया है, प्रवृत्ति है. लोकतंत्र मानवाधिकारों, न्यायपालिका, संविधान, सत्ता पक्ष-विपक्ष सभी के साथ सम्मान भाव है, इसमें आम सामाजिक प्रकृति को भी बहुलवादी होना होगा. बहरहाल, चुनौतियों के बीच भी शुरुआत तो कहीं न कहीं से होनी ही है-  कमोबेश हर जम्हूरी सफर ऐसे ही शुरू होता है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क girishmisra@lokmat.com के जरिए किया जा सकता है.

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