वैजयंती माला ने रचा भारतीय सिनेमा में इतिहास

प्रमोदभारतीय सिनेमा में वैजयंती माला नया इतिहास लेकर आती हैं। दक्षिण भारत का नमकीन पानी रग-रग में समाये वैजयंती माला नृत्य में थिरकते हुए पांव बंबई सिनेमा जगत में हौले-हौले रखती हैं और सिने-जगत उनके घुंघरुओं की आवाज से खनक उठता है। धीरे-धीरे यह खनक दर्शकों के बीच पहुंच जाती है। और दर्शक शास्त्रीय-नृत्य के मोहपाश में बंध-से जाते हैं। हमारे सामने और ख्‍वाबों में एक अकेला घुंघरू खनक उठता है। एक जोड़ी आँखों का नृत्यभरा अभिनय और दो थिरकते कदम हमारे अंदर नई ऊर्जा का संचार करने लगते हैं। यह नई ऊर्जा हमारा रोम-रोम कंपा देती है और हम नृत्य संग झूम उठते हैं। सिनेमा को लय-ताल संग पिरोकर चमकती आंखों से देखने लगते हैं। वैजयंतीमाला के नृत्य में सधे हुए पांव नई बानगी लिखते हैं। उनके नृत्य को ध्यान में रखकर स्क्रिप्‍ट लिखे जाने लगे और हम फिल्मों संग झूमने के आदी हो गए। इस तरह वैजयंती माला एक नई परंपरा रच डालती हैं।

कुशल अभिनेत्री और नृत्यांगना वैजयंती माला का जन्म मद्रास, तमिलनाडु में हुआ। दक्षिण से आकर बंबई फिल्म इंडस्ट्री में भाग्य चमकाने वाली पहली अभिनेत्रियों में ये एक हैं। वैजयंती माला ने अपने कॅरियर की शुरुआत निर्देशक एमवी रमन की तमिल फिल्म ‘वझकाई’ से की। हिंदी फिल्मों की शुरुआत 1951 में फिल्म ‘बहार’ से की। नंदलाल जसवंतलाल की फिल्म ‘नागिन’ ने उन्हें शीर्ष पर पहुंचा दिया। ‘मन डोले मेरा तन डोले…’ गाने में उनके सर्प-नृत्य ने जैसे एक इतिहास रच डाला। भरतनाट्यम की अपनी ट्रेनिंग का उपयोग वैजयंतीमाला ने अपनी लगभग सभी मुख्य फिल्मों में किया। जैसे-‘देवदास’, ‘न्यू देल्ही’ और ‘गंगा-जमुना’, जिनमें उनकी नृत्य प्रतिभा को ध्यान में रखकर ही स्क्रिप्‍ट लिखे गये। इस तरह फिल्मों में नृत्य को स्थान दिलाने की परंपरा हेमा मालिनी, जयाप्रदा और श्रीदेवी सरीखी अभिनेत्रियों ने आगे बढ़ाई और डांसर एक्ट्रेस में परिणत हो गईं।

दिलीप कुमार के साथ वैजयंती माला ने अद्भुत सफल ऑन-स्क्रीन जोड़ी बनाई और उनके साथ ‘नया दौर’, ‘गंगा-जमुना’ और ‘मधुमती’ जैसी हिट फिल्मों में दिखीं। इनकी अन्य सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में ‘ज्वेल थीफ’ और ‘संगम’ शामिल हैं। इन्होंने तीन बार सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता। 1958 में ‘साधना’ के लिये 1961 में ‘गंगा-जमुना’ के लिये और 1964 में ‘संगम’ के लिये। बाद में वैजयंती माला राजनीति से जुड़ीं और 1984 में संसद सदस्य बनीं। 1995 में इन्हें लाइफटाइम अचिवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘बॉन्डिंग-अ मेम्योर’ भी लिखी, जिसमें अपने बचपन से अब तक की तस्वीर उकेरी है। अभिनेत्री सह नृत्यांगना की निर्मित उनकी छवि अब नया कलेवर धारण कर चुकी है। यह छवि अब शास्त्रीय नृत्य से डिस्को थेक तक का सफर तय कर चुकी है।

आज अभिनेत्रियों का संगीत के सुरों में ताल मिलाना अवश्यंभावी सा है। वैजयंती माला नृत्य को इसी तरह सिनेमा की जान बना देती हैं। अभिनेत्रियां उनकी परंपरा को जीने लगती हैं। लेकिन, अप्सराओं के घुंघरुओं सी खनक हमारे ख्यालों में खनकती रहे और अभिनय आंखों के सामने नाचता रहे, ऐसा तो वैजयंती माला के नृत्य में सधे हुये पांव ही कर सकते हैं।

इनकी प्रमुख फिल्‍में 1951 में बहार,  1952 में अंजाम, 1953 में लड़की, 1954 में नागिन, 1955 में देवदास, 1956 में ताज, 1957 में नया दौर, 1958 में मधुमती, 1959 में पैगाम,  1961 में गंगा-यमुना, 1962 में रंगोली, 1964 में संगम, 1965 में नया कानून, 1966 में आम्रपाली, 1967 में ज्वेल थीफ, 1968 में साथी, 1969 में प्रिंस और 1970 में गंवार शामिल है.

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

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