सन बयालीस जैसा माहौल है भ्रष्‍टाचार के खिलाफ

शेषजीभ्रष्टाचार की चर्चाओं से घिरे देश में विकीलीक्स के संपादक जूलियन असांज ने एक और आयाम जोड़ दिया है. फरमाते हैं कि स्विस बैंकों में जमा काले धन के खातेदारों में बहुत सारे नाम भारतीयों के हैं. इस देश का मध्य वर्ग लगातार भ्रष्टाचार की कहानियां सुन रहा है. टूजी, कामनवेल्थ और येदुरप्पा के घोटालों के माहौल में जब अन्ना हजारे का आन्दोलन आया तो वे सारे लोग मैंदान में आ गए जिनका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है. ज़ाहिर है यह किसी भी सत्ताधारी पार्टी के लिए बहुत बड़ी खतरे की घंटी है.  भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सारे मामले में जो सबसे दिलचस्प बात रही, वह यह कि राजनीतिक पार्टियों के सदस्य अपने हिसाब से भ्रष्टाचार की व्याख्या करते रहे, अपने विरोधी को ज्यादा भ्रष्ट बताते रहे लेकिन अखबार पढ़ने वाले देश के उस जागरूक वर्ग ने नेताओं की  बातों को गंभीरता से नहीं लिया.

ऐसे ही हालात थे जिसकी वजह से 1942 और 1977 में परिवर्तन आया था. भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए इस आन्दोलन में आम आदमी नेताओं को आवश्यक तिरस्कार की नज़र से ही देखता रहा. जूलियन असांज का नया खुलासा तस्वीर को बिलकुल नया रंग दे देता है. उसने साफ़ कहा है कि जिन दस्तावेजों को वे लीक कर रहे हैं वे सबूत नहीं हैं लेकिन उनमें बहुत अहम सूचनाएं हैं जिनका इस्तेमाल आगे की जांच में किया जा सकता है. एक निजी टीवी चैनल से बात करते हुए जूलियन असांज ने कहा कि भारत सरकार का यह कहना कि कुछ देशों के साथ दोहरा टैक्स समझौता न होने की वजह से काले धन को निकालना मुश्किल हो रहा है. असांज ने कहा कि यह तर्क बिलकुल बेतुका है. उन्होंने कहा कि काले धन को निकालना टैक्स से सम्बंधित मामला  नहीं है. वह वास्तव में बिलकुल अलग, काले धन का मामला है. उसने एक और बात कही जो अर्थशास्त्र का कोई भी विद्यार्थी जानता है. उसने कहा कि देश के अंदर की रिश्वत खोरी हालांकि राष्ट्रीय संसाधनों पर डाका डालती है,  लेकिन वह विदेशी बैंकों में धन रखने से कम खतरनाक है. उसमें पैसा देश में रहता है और उस रक़म को खरीदने के लिए विदेशी मुद्रा ज़ाया नहीं होती. जबकि किसी ने किसी रूप में वह पैसा देश के अंदर की इस्तेमाल होता है. यहाँ रिश्वतखोरी को सही ठहराने का कोई इरादा नहीं है. विदेशी बैंकों में पैसा जमा करने वालों के देशद्रोह को रेखांकित करने के उद्देश्य से यह तर्क दिया जा रहा है.

चोरी से देश के बाहर पैसा जमा करने वाले देश की अर्थव्यवस्था पर दोहरा वार करते हैं. एक तो देश का पैसा रिश्वत के रास्ते चुराते हैं और दूसरा यह कि दुर्लभ विदेशी मुद्रा खर्च करके भारतीय रुपयों को स्विस बैंकों में जमा करने लायक बनाते हैं. इस तरह अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार करते हैं. देश में बन रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ माहौल में जूलियन असांज का यह खुलासा बहुत बड़ी उम्मीद लेकर आया है. यहाँ यह भी समझ लेना ज़रूरी है कि पिछले कुछ वर्षों से बीजेपी के नेता लाल कृष्ण आडवाणी इस कोशिश में लगे हुए हैं कि कांग्रेस को ही स्विस बैंकों में जमा काले धन के खलनायक के रूप में पेश किया जाय. आम तौर पर माना भी यही जाता है कि कांग्रेसियों ने सबसे ज्यादा खेल किया है. ऐसा शायद इसलिए कि यह काम 1970  के दशक से ही चल रहा है. लेकिन इस बात में भी कोई शक़ नहीं है कि बीजेपी के बड़े नेता भी इस लपेट में आयेगें. दुनिया जानती है कि बीजेपी के कई मंत्रियों और टाप नेताओं के बच्चों ने वाजपेयी सरकार के दौरान खुलकर घूस बटोरा था. कर्नाटक में मौजूदा सरकार भी घूस के खेल में किसी कांग्रेसी से कम नहीं है. बाकी पार्टियों के नेता भी विदेशी बैंकों की शरण में जाते रहे हैं. ज़ाहिर है जब खुलासा होगा तो सबका नाम आयेगा और अगर बीजेपी वाले यह सोचते हैं कि वाजपेयी जी की सरकार के दौरान जो लाखों-करोड़ के वारे न्यारे हुए थे, वह रक़म भारतीय बैंकों में जमा कर दी गयी होगी तो इसे मुगालता ही कहा जाएगा.

यानी अगर स्विस बैंकों में जमा रक़म के बारे में पूरी जानकारी मिलती है तो हालात बहुत बदल जायेंगे. यह देशहित में है. खुशी इस बात की है कि अब भ्रष्टाचार के खिलाफ राष्ट्रीय जनमत तैयार हो रहा है और जनता किसी भी भरोसेमंद सूचना पर भरोसा करने को तैयार है. वह किसी भी भ्रष्ट नेता, अफसर या पत्रकार को माफ़ करने को तैयार नहीं है. कोर्ट जाते हुए सुरेश कलमाड़ी के ऊपर चप्पल फेंकने वाला नौजवान देश के सामूहिक गुस्से को ही व्यक्त कर रहा था. राडिया टेप के पहले की एक बहुत ही नामी पत्रकार जब इण्डिया गेट से विशेष कार्यक्रम पहुंची तो जनता ने उन्हें दौड़ा लिया क्योंकि राडिया टेप के बाद की उनकी सच्चाई पत्रकारिता के लिए शुभ लक्षण नहीं है. इसी तरह से लोग  बड़े से बड़े लोगों को भ्रष्टाचारी मानने के लिए तैयार बैठे हैं. ऐसी हालत में देश में भ्रष्टाचार के विरोध करने का व्याकरण बदल रहा है. दिलचस्प बात यह है कि राजनीतिक नेताओं को अभी भनक तक नहीं है. वे अभी इसी मुगालते में हैं कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन का नेतृत्व किसी पार्टी के हाथ आ जाएगा. पूरी संभावना है कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है. अन्ना हजारे के आन्दोलन को जनता ने पूरी तरह नेताओं से मुक्त रखा. आने वाले वक़्त में भी ऐसा ही होने वाला है क्योंकि पूरे देश के जागरूक वर्ग में यह अवधारणा घर कर चुकी है कि सारे भ्रष्टाचार की जड़ राजनीतिक नेता ही हैं. इस बात में भी दो राय नहीं है कि बहुत सारे नेता ऐसे भी हैं जो भ्रष्ट नहीं हैं. लेकिन उनकी अधिसंख्य भ्रष्ट बिरादरी की कारस्तानियों का नतीजा उन्हें भोगना पड़ सकता है. आम आदमी को अभी तक मीडिया पर भरोसा है और यह खुशी की बात है. जो भी हो भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में वैसा ही माहौल बन रहा है जैसा अंग्रेजों के खिलाफ 1942  में माहौल बना था. उम्मीद की जानी चाहिए कि हालात हर हाल में बेहतर होंगे.

लेखक शेष नारायण सिंह देश के जाने-माने पत्रकार और स्तंभकार हैं. एनडीटीवी समेत कई चैनलों-अखबारों में काम कर चुके हैं. विभिन्न अखबारों में नियमित रूप से लिखते हैं. कई चैनलों पर बहसों व विश्लेषणों में शरीक होते हैं. वेब माध्यम के चर्चित चेहरे हैं.

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