सोनिया गांधी का अदृश्‍य भय

आलोक कुमारकिसी अपराध में सोनिया गांधी का नाम लेने से क्यों हिचकते हैं लोग? मेरे आग्रह भरे सवाल पर आप कह सकते हैं कि अपराध में संलिप्तता का पता ही नहीं लगता इसलिए सोनिया गांधी का नाम नहीं लेते लोग। लेकिन लंबे समय से अपराध की रिपोर्टिंग करने की वजह से अंदर ही अंदर लगता है कि अपराध के बाद अपराध के लाभान्वितों का शक के तौर पर भी तो नाम लेने की स्थापित परंपरा है। इस परंपरा के निर्वाह का अक्सर फायदा होता है। शक की अंगुली उठाई जाती है। जांच की जाती है। जांच के नतीजों के आधार पर दोषी या बरी करने का फैसला लिया जाता है। लेकिन कमाल है। यूपीए के सात सालों के शासन में नहीं के बराबर सुना है कि किसी मसले पर सोनिया गांधी पर अंगुली उठाई गई हो।

खासकर चार जून की स्याह रात में रामलीला मैदान की पुलिसिया तांडव के बाद ये बात ज्यादा अखरती है। पुलिस के लपेटे में आए, चोट खाए स्वामी रामदेव से उम्मीद थी कि वो कालेधन के पूरे खेल में शामिल खिलाड़ियों के नाम का खुलासा करेंगे। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की भूमिका पर रोशनी डालेंगे। पर  साफ कहने के बजाए वो सिर्फ गुस्से के इजहार के तौर पर इतना ही कह पाए कि अगर उनके जान को कुछ होता है तो जिम्मेदार सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी होगी। खौफ से घिरे बाबा जब सोनिया गांधी का नाम ले रहे थे तो उनके जुबां की हल्कान को साफ पढ़ा जा रहा था। बडी मुश्किल से स्वामी रामदेव सच को बयां कर पा रहे थे कि दिल्ली के क्लिरेज़ होटल में कैबिनेट मंत्रियों से पांच घंटे की मुलाकात में एक फोन पर मनमोहन सिंह से तो दूसरे फोन पर सोनिया गांधी से लगातार बात हो रही थी। अनशन खत्म कराने के नतीजे के लिए मंत्रियों पर जबरदस्त दबाब था। दबाव भरे क्षण में सोनिया गांधी से कैबिनेट मंत्रियों की बात का मसला बड़ा है।

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से बातचीत का यह मसला इसलिए भी बड़ा है कि रामदेव को मनाने के तरीके को लेकर सरकार और पार्टी के बीच जबरदस्त फूट की बात सामने आ रही है। सरकार चला रहे डा. मनमोहन सिंह पर स्वामी रामदेव को जरूरत से ज्यादा तबज्जो देने का इल्जाम लगा। इल्जाम से विफर कर ही वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी ने पूरे खेल से खुद को अलग कर लिया। मामले को प्रधानमंत्री कैंप के कपिल सिब्बल हैंडल करने लगे। नतीजे को लेकर कपिल सिब्बल जबरदस्त दबाव में आ गए। उनके दबाव का अनुमान रामलीला मैदान में पुलिसिया कहर को सही ठहराने के बयान से समझा जा सकता है। लालू यादव के सहारे राजनीति में डग रखने वाले सिब्बल ने कहा है कि बाबा को सबक सिखाने के लिए ऐसी कार्रवाई जरूरी हो गया था।

घटनाक्रम के कारणों पर गौर करें तो कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के निकटस्थों ने पहली जून को चार कैबिनेट मंत्रियों के जरिए स्वामी रामदेव का रेडकार्पेट वेलकम करने के फैसले की आलोचना करते हुए खुद को सरकार अलग कर लिया। कांग्रेस के इसी फैसले ने कैबिनेट मंत्री कपिल सिब्बल और सुबोधकांत सहाय को करो या मरो की स्थिति में ढकेल दिया। इसी अप्रत्याशित दबाव ने स्वामी रामदेव मामले को सरकार के लिए जटिल बना दिया और तनावपूर्ण हालत में डा. मनमोहन सिंह के सिपहसलारों ने घड़ी में पांच जून की तारीख आते ही देश के लोकतांत्रिक इतिहास की एक और बड़ी भूल कर दी। कहते हैं कि इतिहास खुद को किसी न किसी रुप में दोहराता है। पांच जून का इतिहास एकबार फिर उलटपुलट कर सामने आया। दिल्ली की रामलीला मैदान में पांच जून की काली कार्रवाई के तारीख की साम्यता को याद करना इसलिए भी जरूरी है कि इंदिरा गांधी के अपातकाल के खिलाफ पांच जून 1974 को ही जयप्रकाश नारायण ने पटना के गांधी मैदान से संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंका था।

बहरहाल पूरे मामले में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की सक्रियता की बात सामने आती है, तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए। उनकी सक्रियता को रामदेव बाबा के सत्याग्रह की वजह के मूल मसले से जोड़कर देखना चाहिए। विदेशों में जमा काला धन का मसला स्वामी रामदेव के अभियान के केंद्र में रहा है। फायदे की शायद इस उम्मीद में कि विरोध कम होगा, स्वामी रामदेव कालेधन को लेकर स्विस बैंक खातेदारों का नाम सामने नहीं लाने और हसन अली मामले में शामिल लाभान्वित राजनेताओं का नाम उजागर करने से बच रहे सरकार को कटघरे में खड़ा करने से बच रहे थे। सिर्फ जिक्र विदेशों में जमा आंकलित कालाधन के राशि की कर रहे थे। यह चालाकी काम नहीं आई। जिनको खफा होना था वो खफा ही रहे। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने जिस तरह से अतिरिक्त पहल करते हुए स्वामी रामदेव को मनाने पर आतुरता दिखाई उस पर कांग्रेस पार्टी के अंदर ही हंगामा खड़ा हो गया। इस शक पर भी सोनिया गांधी की भूमिका का जिक्र होना चाहिए। लेकिन कोई राजनेता ऐसा नहीं कर रहा। बल्कि एकबार करने की कोशिश हुई तो विपक्ष के सबसे बडे़ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सोनिया गांधी को खत लिखकर माफी मांग ली।

राजनीति के इस उल्टे खेल को देखकर हैरत होती है। विपक्ष की चुप्पी पर हैरत इसलिए भी होती है कि बड़ी साफगोई से बोफोर्स कांड से सोनिया गांधी के रिश्तेदार ओट्टावियो क्वात्रोची का नाम साफ कर दिया गया। कहीं कोई चू चपड़ नहीं हुई। कोई चुनावी मसला नहीं बना। बोफोर्स कांड में क्वात्रोची से रिश्ते को लेकर सोनिया गांधी तक से पूछताछ करने वाली सीबीआई के जांचकर्ता अब इस महत्वपूर्ण दलाली सौदे की जांच बंद करने को मजबूर हो गए हैं। समाजशास्त्रियों का एक शोध कहता है कि बोफोर्स सौदे के बाद से ही भारतीय समाज में भ्रष्टाचारियों के लिए दुराग्रह का भाव खत्म हुआ है। यानी उसके बाद से ही भ्रष्टाचारी समाजिक व्यवस्था में सम्मानजनक हालत में पहुंच गए हैं। इतना ही नहीं हाल के दिनों में कर्नाटक में बीएस येदुरप्पा की सरकार को उलटने की जो कोशिश हुई है उसमें कभी भी कहीं से इस बात का जिक्र नहीं किया गया कि क्वात्रोची का पुत्र बेंगलुरू में सक्रिय रहा है। कर्नाटक की कुर्सी पर मनमाफिक मुख्यमंत्री को बैठाए रखने में सोनिया गांधी का निजी स्वार्थ रहा है। ये तो आम नागरिक के आंखों के आगे तैर रही बात है। इसके अलावा न जाने कितनी गुपचुप बातें रही होंगी जिसकी वजह से देश के चोर-चोर मौसेरा भाई वाली व्यवस्था के बने होने का बोध होता है।

खुद कांग्रेस की रिपोर्टिंग के वक्त कई मौकों पर दस जनपथ के बाहर तैनात रहा हूं। कई महत्वपूर्ण मसलों के फैसले के वक्त कैबिनेट मंत्रियों की गाड़ियां सोनिया गांधी के दो दशकों से बने अधिकारिक आवास दस जनपथ में दनादन प्रवेश करते देखा है लेकिन फैसले के असर के खिलाफ उठने वाली आवाज में कभी सोनिया गांधी का नाम लेते विपक्ष को नहीं सुना है। इसलिए भी सोनिया का नाम लेने में राजनेताओं की हिचक की बात कचोटती रहती है। कई बार मिले जवाब से लगता है कि यह 2004 में सोनिया गांधी का विदेशी मुद्दा राजनीति में कारगर नहीं सकने की वजह से है। तब सिर्फ विदेशी बताकर सोनिया को घेरने में लगी ताकतों को मुंह की खानी पड़ी। फिर मान लिया गया कि देश की बहु के किसी अपराध में शामिल होने की बात जनता को कतई मंजूर नहीं। इसलिए सब देखते हुए भी सोनिया गांधी का नाम नहीं लिया जाता। लेकिन अब आप भी समझ गए होंगे कि वजह इतनी आसान भी नहीं है।

अगर जनता के मंजूरी या नामंजूरी के डर का ख्याल होता तो राजनीति के पुरोधा नैतिकता से जुड़ी और भी अनगिनत बातें का ख्याल रखते। जिसे जनता कभी पसंद नहीं करती है। न जाने क्यों अक्सर लगता है कि सोनिया गांधी के नाम को लेकर नेताओं में कोई अदृश्य भय काम कर रहा है। ये अदृश्य भय क्या है? इसका संतोषजनक, सीधा और सटीक जवाब तलाशे नहीं मिल रहा। राजनेताओं की पौध में खुद की प्रतिभा की वजह से गौण से हो गए सुब्रमणयम स्वामी को छोड़कर कोई दिखता ही नही जिसने कभी राष्ट्रीय राजनीति पर अदृश्य भय के इस दाग को समझने और मुकाबला करने की कोई कोशिश की हो। सुब्रमणयम स्वामी का यह प्रयास सोनिया गांधी की नागरिकता से जुड़े एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद काफूर हो गया है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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