हर बच्‍चे के हाथ में लैपटाप होना चाहिए

शेषजीदिल्ली में नौंवें प्रवासी भारतीय दिवस का उदघाटन हुआ. इस अवसर पर भारत की ताक़त की हनक नज़र आई. शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल ने साफ़ कहा कि अब उद्योग और व्यापार और उस से जुड़ी चीज़ों के अवसर भारत में ही हैं, इसलिए भारतीय मूल के लोगों को नयी हालात में अपनी बात कहने की आदत डालनी पड़ेगी. उन्होंने कहा कि भारत में जो लोग भी आ रहे हैं वे यहाँ बेहतर अवसर की तलाश में आ रहे हैं. इस अवसर पर शिक्षा के क्षेत्र में निवेश की संभावनाओं पर भी एक सेमिनार का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य वक्तव्य प्रधानमंत्री के सलाहकार सैम पित्रोदा ने दिया. उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में नयी टेक्नालॉजी का रोल बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन शिक्षा का महत्व सही अर्थों में समझना होगा. ज़रूरत इस बात की है कि शिक्षा में सुधार को एक राष्ट्रीय आन्दोलन के रूप में विकसित किया जाए. कोशिश की जानी चाहिए कि भारतीय मूल के साढ़े बारह करोड़ लोग जो विदेशों में बसे हैं, उन्हें भारत में काम करने के लिए प्रेरणा दी जा सके.

उन्होंने जोर देकर कहा कि भारतीय मूल के विदेशियों का धन हमें नहीं चाहिए उनके पास जो ज्ञान का ज़खीरा है वह भारत के विकास में इस्तेमाल हो सकता है. उसके बदले में उन्हें भी काम करने के बड़े मौके मिलेगें. श्री पित्रोदा ने दावा किया कि मौजूदा सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता शिक्षा है. लेकिन शिक्षा के बारे में जो पुरानी समझ है उसे ख़त्म करना होगा. शिक्षा के बारे में नयी समझ को आगे लाना पड़ेगा और भारत को शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी देश बनाना होगा.

इस अवसर पर सैम पित्रोदा ने कहा कि अपने देश में करीब 50 करोड़ ऐसे लोग हैं, जिनकी उम्र 25 साल से कम है. उनकी काम करने की क्षमता का विकास किया जाना चाहिए. अगर शिक्षा के क्षेत्र में विकास की दर करीब 10 प्रतिशत नहीं रही तो देश पिछड़ जाएगा. शिक्षा की मांग बहुत ज्यादा है लेकिन मौजूदा तरीके के बुनियादी ढाँचे के विकास के सहारे उस मांग को पूरा नहीं किया जा सकता है. इसके लिए ज़रूरी है कि कुशल कारीगरों और अन्य तरह के काम करने वालों की शिक्षा को कंट्रोल की व्यवस्था से बाहर किया जाए. इस दिशा में मनमोहन सिंह की सरकार ने ज़रूरी पहल कर दी है. नालेज कमीशन उसी आधुनिक सोच का नतीजा था. हमने तीन साल मेहनत करके रिपोर्ट तैयार की जिसमें 27 मुद्दे पहचाने गए और उन पर काम करने की ज़रुरत थी, लेकिन शिक्षा मंत्रालय ने वह काम मुस्तैदी ने नहीं किया.

अब सरकार ने तय किया है कि दो अरब डालर खर्च करके एक सूचनातंत्र बनाया जाएगा अगले डेढ़ साल में देश की ढाई लाख पंचायतों को ब्राडबैंड से जोड़ दिया जाएगा. शिक्षा में मास्टर के ज़रुरत को ख़त्म करने की दिशा में काम चल रहा है. इतनी बड़ी संख्या में लोगों को शिक्षित करने के ज़रुरत है कि पुराने तरीके के बुनियादी ढाँचे से काम नहीं चलने वाला है. आज की तारीख में हमें नए आविष्कार करके ही समस्या का समाधान तलाशने की ज़रुरत है. प्रधानमंत्री ने इस दिशा में शुरुआत कर दी है. सरकारी खर्च पर एक राष्टीय आविष्कार परिषद की स्थापना कर दी गयी है. जिसका शुरुआती बजट एक अरब डालर का है. और भी पैसा उपलब्ध करवाया जा सकता है. इस सरकार ने शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा है और कोशिश की जा रही है कि देश भर में 14 ऐसे विश्वविद्यालय बनाए जाएँ जहां केवल आविष्कार से सम्बंधित काम हो.

इस अवसर पर हर बच्चे के लिए एक लैपटाप के व्यवस्था करने वाले मिशन के अध्यक्ष सतीश झा ने भी भाषण दिया. उन्होंने कहा कि मौजूदा समय को नेशनल इमरजेंसी इन एजूकेशन का नाम दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इस देश में 640 हज़ार गांव हैं. गांवों में शिक्षा का जो स्तर है वह बिलकुल आदिम है. उसको ठीक करने की ज़रुरत है. लेकिन यह हमारी मौजूदा शिक्षा व्यवस्था के बूते के बात नहीं है कि उसको बदला जा सके. उसके लिए कुछ नया करना होगा. श्री झा ने बताया कि बहुत सोच विचार और शोध के बाद एक ऐसा कम्प्यूटर तैयार किया जा सका है, जिसकी  देखभाल गाँव का बच्चा भी कर लेगा. उसको ज्यादा गर्मी से कोई नुकसान नहीं होता, उसको पटक देने से टूटता नहीं और उसलैप टाप की मदद से बिना टीचर की मदद के भी बच्चे अपनी पढाई कर सकते हैं. उसमें बच्चों के स्तर का इंटरनेट, उनकी अपनी भाषा में उपलब्ध करवाया जा सकता है.

बाद में सैम पित्रोदा ने भी कहा कि अपने देश की शिक्षा की ज़रुरत को पूरा करने के लिए सतीश झा के प्रोजेक्ट की तरह काम करने की ज़रूरत है लेकिन इस तरकीब में भी लगातार विकास करते रहना चाहिए.

लेखक शेष नारायण सिंह देश में हिंदी के जाने-माने स्तंभकार, पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

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