भारत मां को डायन कहा जाता है, तो कभी राष्ट्रपिता को शैतान की औलाद बता कर भारतीयों का अपमान किया जाता है, पर सरकार अपेक्षित कार्रवाई नहीं कर पाती, तभी अब देश के विरुद्ध ही खुलेआम जहर उगलना शुरु हो गया है, क्या यह सब अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में आता है? अगर, हां, तो अजमल कसाब या अफजल गुरु जैसों पर भी मुकदमा नहीं चलना चाहिए, उनका भी वही मकसद है, जो अफसर शाह गिलानी व अरुंधति राय कह रहे हैं, क्योंकि भारत के प्रति इन सब के विचार एक जैसे ही हैं। बस, देश को तोडऩे या नुकसान पहुंचाने के तरीके अलग-अलग हैं। हुर्रियत के कटटरपंथी नेता गिलानी के जहर उगलते भाषण सुन कर आश्चर्य नहीं होता, क्योंकि गिलानी नेता हैं और उनकी राजनीति का आधार देशद्रोही नीति ही रही है, पर यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह अभिव्यक्ति की आजादी में और देशद्रोही गतिविधियों में फर्क समझते हुए तत्काल कड़ी कार्रवाई सुनिश्चित कराये, ताकि देश की एकता व अखंडता के मुद्दे पर प्रहार करने का कोई और भी दुस्साहस न कर सके।
मामले को गंभीरता से लेते हुए सरकार गिलानी के आग उगलते भाषणों पर शुरू में ही लगाम लगाने का प्रयास करती तो वर्तमान में ऐसे हालात नहीं बने होते, पर सरकार ने इस ओर जरा भी ध्यान नहीं दिया, तभी गिलानी का हौसला इतना बढ़ गया कि वह कश्मीर से निकल कर दिल्ली में भी देश द्रोही गतिविधियों का जाल फैलाने का दुस्साहस कर बैठे। अरुंधति या गिलानी का एक मंच पर आकर आग उगलना संयोग नहीं कहा जा सकता। इसके पीछे किसका शातिर दिमाग काम कर रहा है, इसकी गहनता से जांच होनी बेहद जरुरी है, ताकि देश के सामने सच आ सके। वैसे यह आश्चर्य की ही बात कही जायेगी कि दुनिया में चर्चित बुकर पुरस्कार विजेता लेखिका अरुंधति राय ऐसा देश द्रोही बयान दे रही हैं, जबकि उन्हें अच्छी तरह ज्ञात होगा कि भारत ने कश्मीर हथियारों के बल पर नहीं झपटा था।
कश्मीरियों की राय के अनुसार ही कश्मीर भारत का अंग बना और तब से लगातार देशद्रोही ताकतें कश्मीर को लेकर तरह-तरह के षणयंत्र रचती आ रही हैं। इसके अलावा अरुंधति को यह जानकारी भी होगी कि कश्मीर में जब-जब चुनाव हुए हैं, तब-तब कश्मीर की जनता ने देश के बाकी भागों में बसे लोगों की तरह ही हिस्सा लिया है और अपने पसंद ही सरकारें चुनी हैं। यह बात अलग है कि जनता की अपेक्षाओं पर सरकारें खरी नहीं उतर पा रही हैं, तो यह समस्या सिर्फ कश्मीर की नहीं, बल्कि देश के बाकी राज्यों की भी है, इसका मतलब यह तो नहीं हो सकता कि जनता हथियार उठा ले या अलग राष्ट्र की मांग करने लगे। दुनिया में सिर्फ भारत ही ऐसा देश है, जहां नागरिकों को सरकार चुनने के साथ अन्य व्यापक अधिकार भी दिये गये हैं, जिनका उपयोग कर आक्रोशित नागरिक अपना गुस्सा जाहिर कर सकते हैं। माओवादियों की भी बात की जाये तो कुछ मुद्दों पर वह भी सही नजर आते हैं, पर देश के विरुद्ध हथियार उठाने की आजादी नहीं दी जा सकती, जनतंत्र में मिले अधिकारों के तहत ही आक्रोश व्यक्त करना चाहिए, साथ ही जनतंत्र में गन तंत्र का कोई स्थान नहीं होना चाहिए।
इसलिए अरुंधति या गिलानी के भाषणों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इन दोनों के बयानों से देशवासियों की भावनाओं को गहरी चोट पहुंची है, तभी देश के अंदर इन दोनों के प्रति स्वयं ही माहौल बन गया है और नागरिक दोनों के विरुद्ध बयान दे रहे हैं व जगह-जगह धरना-प्रदर्शन तक करते नजर आ रहे हैं। इन दोनों की भूमिका को भाजपा, कांग्रेस, वामदल या समाजवादी चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। देश की एकता व अखंडता के साथ खिलवाड़ करने वालों को सिर्फ देशद्रोही वाले कठघरे में खड़ा कर ही देखा जाना चाहिए, साथ ही इस मुददे पर राजनीति भी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि राजनीति करने के लिए देश के अंदर अन्य बहुत मुद्दे हैं, इसलिए सरकार को सिर्फ कार्रवाई करने पर ही जोर देना चाहिए अन्यथा सरकार ने अगर इस बार इन दोनों के अपराध को नजरअंदाज कर दिया, तो इन दोनों के अलावा इतने अरुंधति व गिलानी पैदा हो जायेंगे, जिसकी कल्पना करने से भी दिल कांप सकता है।
अरुंधति या गिलानी की हरकतें अभिव्यक्ति की आजादी के दायरे में कतई नहीं आतीं, यह बात यह अरुंधति व गिलानी भी जानते हैं, साथ ही वह यह भी जानते हैं कि दलीय राजनीति में फंसे भारत में उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं हो सकती, इसलिए यह बात इन दोनों के साथ बाकी के मन से भी निकालनी बेहद जरुरी है कि दलीय राजनीति में बंटा भारत देश की एकता व अखंडता के मुददे पर एकमत है। देश विरोधी गतिविधियों में शामिल अरुंधति या गिलानी अकेले नहीं हैं। सरकार या जनता की नजरों से बचे हुए और भी लोग हैं, जिन पर शिकंजा कसने के साथ कश्मीर के बारे में भी गंभीरता से सोचने का समय आ गया है। दलीय राजनीति से दूर यूपीए सरकार को अनुच्छेद 370 को समाप्त करने के बारे में भी पहल शुरु कर देनी चाहिए अन्यथा देश विरोधी ताकतें मुंह की खाने के बाद भी सिर उठाती रहेंगी।
लेखक बी पी गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं.

