अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता क्या विकराल और अनियंत्रित स्वरुप ले सकती है, यह इन्टरनेट के आने से सभी जगह देखा जा सकता है. इन दिनों फेसबुक पर एक ग्रुप दिख रहा है “आई हेट गाँधी”. वर्तमान में 2484 लोग इसके समर्थक के रूप में जुड़े दिखते हैं. इसमें चार ऐसे भी लोग हैं जो फेसबुक पर मेरे साथी हैं. इस ग्रुप के इन्फोर्मेशन पेज पर कुछ भी नहीं लिखा हुआ है. इस ग्रुप को देखने से दिख जाता है कि इसमें वे लोग हैं जो सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, महाराणा प्रताप, शिवाजी, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल जैसे लोगों को पसंद करने वाले लोगों का समूह है. साथ ही ये सारे लोग तीव्रता से महात्मा गाँधी के प्रति नफरत और घृणा का भाव रखते हैं. पेज देखने से दिखता है कि इन लोगों के अनुसार महात्मा गाँधी खिलाफत आन्दोलन की गड़बडि़यों, मोप्ला दंगों, सुभाष बोस को कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने, पंडित नेहरु को प्रधानमन्त्री बनाने, सरदार पटेल को उनके रास्ते से हटाने, भगत सिंह की फांसी की सजा के प्रति गलत प्रतिक्रिया करने, देश के बंटवारे, पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये दिलवाने जैसे सभी कार्यों के लिए व्यक्तिगत तौर पर दोषी हैं.
साथ ही इस ग्रुप के लोग यह भी दावा करते हैं कि गाँधी ने छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप गुरु गोविन्द सिंह जैसे महान देशभक्तों के योगदानों को कमतर आँका था, सरदार उधम सिंह जिन्होंने जनरल ओ’डायर को मारा था, के कृत्य की निंदा की थी, दिल्ली में स्वाधीनता के बाद पक्षपातपूर्ण आचरण किया, देश में छद्म-धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा दिया और क्रांतिकारियों के योगदान को समुचित महत्व नहीं दिया.
वैसे तो इन सारे विषयों पर लोगों के अपने मत-मंतव्य हो सकते हैं, पर जो बात वास्तव में बहुत गंभीर है वह यह कि इनमें से कई लोगों ने खुले आम महात्मा गाँधी के लिए अशोभनीय शब्दों का प्रयोग किया है, जो स्पष्टतया अत्यंत निंदनीय और अग्राह्य हैं. इनमे सार्वजनिक तौर पर गाली-ग्लौज भी शामिल है. गाँधी जी से घृणा रखने वालों का समूह होने के नाते वैसे तो लगभग सभी लोगों की टिप्पणियां ही महात्मा गाँधी के प्रति कटु हैं, पर कई लोगों ने समस्त मर्यादाएं पार कर ली हैं. मैंने इन सभी लोगों के विषय में अकादमिक दृष्टिकोण से थोड़ी गहरे में अध्ययन करने का प्रयास किया तो कई सारी महत्वपूर्ण बातें सामने आयीं. पहली बात तो यह कि दर्ज़न भर लोगों ने जो गलत शब्द प्रयुक्त किये इनमे से नौ लोगों के फेसबुक अकाउंट में उनकी असली तस्वीरें थीं, यद्यपि तीन-चार लोगों ने नकली तस्वीरें भी लगा रखी हैं. दूसरी बात यह कि इनमें से एक लड़का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलोजी, कुरुक्षेत्र जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ रहा है, कई अन्य भी इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कर रहे हैं. तीसरी बात यह कि इनमें से दो के तो फोन नंबर सहित सारे डिटेल फेसबुक पर दिए हुए हैं. हाँ, लगभग आधे ऐसे जरूर हैं जिनके विषय में मात्र फेसबुक के सहारे पता लगाना संभव नहीं दिखता.
यह सही है कि जिन लोगों की इस समूह के लोगों ने प्रशंसा की हैं, वे सभी अपने-अपने रूप में इस देश की महान विभूतियाँ हैं, पर एक महान व्यक्ति का प्रशंसक होने का यह अर्थ कदापि नहीं है कि हम दूसरे बड़े लोगों के प्रति इस प्रकार के निंदनीय आचरण करें, वह भी देश के राष्ट्रपिता के रूप में सम्मानित महानुभाव का. असली प्रश्न यह है कि हमें इस तरह की बातों को किस तरह से लेना चाहिए. देखिये, इसमें लोगों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं, पर सभ्यता का तकाजा और किसी भी व्यवस्था का निर्वहन यह कहता दिखता है कि लोग हमेशा इस बात का ख़याल रखें कि वे ऐसी बातों का प्रयोग नहीं करें जो दूसरों के लिए कष्टप्रद हों, असंसदीय हों अथवा सीमाओं का उल्लंघन कर रही हों. किसी भी महापुरुष को गन्दी गालियाँ देना कहीं से भी, किसी भी सभ्यता का तकाजा नहीं दिखता और ना ही यह क्षम्य होना चाहिए. यदि हममे से हर व्यक्ति इन बातों का पालन नहीं करेगा तो समाजी में निश्चित तौर पर ऐसी स्थितियां उत्पन्न होती रहेंगी जो शुद्धतया अराजक और विध्वंसक कहलाएंगी. निंदा करना, आलोचना करना, भर्त्सना करना, पोल खोलना, सच्चाई सामने लाना दूसरी बात है, पर किसी भी आदमी को खुलेआम गाली देना, ये कहाँ की रीति है, कहाँ की अच्छाई है, किस रूप में अच्छा है. वह भी एक मृत व्यक्ति के नाम से, जो अब इन बातों का अच्छे-बुरे किसी भी तौर पर उत्तर नहीं दे सकता.
इस प्रकार के समस्त प्रयासों पर हमेशा कड़ाई से कार्यवाही होनी चाहिए और इनके खिलाफ कोई भी रियायत अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर नहीं होनी चाहिए. हो सकता है जिसे मैं गाली दे रहा हूँ वह किसी दूसरे की गहन आस्था का केंद्र हों. फिर तो टकराव ही होना, हिंसा, गंदगी और शत्रुता का भाव सार्वजनिक तौर पर बढता ही जाएगा. इसीलिए मात्र इस आधार पर कि गांधीजी अहिंसा के पुजारी थे, लिहाजा उनके समर्थक भी उसी रीती-नीति के होंगे और उन्हें आराम से गाली दिया जा सकता है, कत्तई उचित नहीं है. और यही बात हर महापुरुष तथा यहाँ तक कि आम इंसान के लिए भी लागू होनी चाहिए.
लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.

