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राजनीति-सरकार

आगे बढ़ने के लिए सामने वाले को गिराना ही पड़ता है

जगमोहन फुटेला अखबारों में एक खबर है कि रिश्वत और दलाली काण्ड में फंसे संसदीय सचिव राज खुराना का इस्तीफ़ा लेने के लिए बादल ने बीजेपी को मना लिया. अपन को निदा फाज़ली साहब का एक शे’र याद आता है. फिर इस खबर के सुर भी समझेंगे.पर,पहले शे’र…

“यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम,
संभल सको तो चलो.
सफ़र में धूप तो होगी,
जो चल सको तो चलो.”

जगमोहन फुटेला अखबारों में एक खबर है कि रिश्वत और दलाली काण्ड में फंसे संसदीय सचिव राज खुराना का इस्तीफ़ा लेने के लिए बादल ने बीजेपी को मना लिया. अपन को निदा फाज़ली साहब का एक शे’र याद आता है. फिर इस खबर के सुर भी समझेंगे.पर,पहले शे’र…

“यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम,
संभल सको तो चलो.
सफ़र में धूप तो होगी,
जो चल सको तो चलो.”

ये मोहब्बत में कुर्बानी की इन्तहा है,सियासत में इंतकाम का उसूल भी. मेरे दोस्त वसीम बरेलवी साहब फरमाते हैं कि होता है कभी कभी ऐसा भी. जो देखने में बहुत ही करीब लगता हो, उसी के बारे में सोचो तो फासला निकलता है. हम सोचते थे कि बादल साहब सीबीआई संकट से उबारने में बीजेपी के राज खुरानाओं की मदद करेंगे. उनके इस छापेमारी को राजनीति से प्रेरित बताने के बयान से ऐसा लगा भी. लेकिन अब ये खबर भी वहीं कहीं से आई है कि राज खुराना का इस्तीफ़ा खुद बीजेपी ने नहीं, बादल साहब ने कराया है.

सवाल इमेज का है. है तो वो खुद बादल साहब की भी कोई बहुत पाक साफ़ नहीं. उनके खिलाफ कभी भ्रष्टाचार की जांच करने वाले मुकरे हैं और आज खुद मुलजिम की तरह कचहरी में खड़े हैं. मगर फिर भी.. इमेज बीजेपी की भी जाए तो क्या बुरा है. प्लीज़ कोई इस ग़लतफ़हमी में न रहना कि बीजेपी की छवि धूमिल कर के बादल साहब अपने ही सहयोगी दल का और फिर उस से अपना नुक्सान क्यों करेंगे. अपना ये मानना है कि खुद आगे निकलने के लिए आगे वाले के सर पे पैर रखना पड़ता है तो फिर रखा ही जाता है. कुछ मिसालें हैं भी ऐसी. पंजाब की बात करें तो ऐसे हालात भी.पर पहले कुछ उदाहरण…

पिछली बार ( 2007 ) में कुंवर नटवर सिंह वाला मामला ताज़ा था. कुछ और भी वजहें थीं. अमरेंदर सिंह को लगा वे नहीं बन सकेंगे मुख्यमंत्री. जोर नहीं लगाया. नहीं आया कांग्रेस का बहुमत (अपना मानना है वे जोर लगाते तो आ भी सकता था). नहीं बन पाई कांग्रेस की सरकार. अमरेंदर को खुद अपनी ही पार्टी को सत्ता से वंचित रखना था. रखा. सहयोगी पार्टी की बात भी कर लें. कम्युनिस्ट पूरे देश में कांग्रेस के गठबंधनीय सहयोगी रहे. ज़रूरत पड़ी तो पंजाब में उनके दोनों विधायक निगल गई कांग्रेस और बंगाल में कभी बगावत कर के जाने वाली ममता के साथ मिल के उन्हें अब उनके गढ़ से भी भगाने में जुटी है कांग्रेस.

पड़ोस के हरियाणा को देखो. जब जब भी कोई गैर कांग्रेसी सरकार बनी है हरियाणा में, बीजेपी के साथ गठबंधन से बनी है. बीजेपी के साथ गठबंधन के बिना चौधरी देवी लाल की ’87 वाली आंधी भी ’91 तक हवा का महज़ एक झोंका बन के रह जाती है. सत्ता की उस सबसे ज़रूरी शर्त, बीजेपी को हमेशा लगा है कि देवी लाल की पार्टी उनके वर्कर को मान नहीं देती, काम नहीं करती और पार्टी का प्रसार नहीं होने देती. इसी लिए वो ’96 बंसीलाल के साथ जाती है और वो ही बंसीलाल जीत के आए बीजेपी के ग्यारह विधायकों में से दस के खिलाफ विजिलेंस की जांच बिठा देते हैं. बीजेपी की नाक में दम कर के रखते हैं वो बीजेपी के समर्थन वापिस लेने तक.

राजनीति है ये. यहाँ कोई किसी को नहीं बख्शता. एक मिनट को मान लीजिए कि इस बार (2012 ) के चुनाव में (जैसा कि लग भी रहा है) अकाली दल नहीं जीतता, बादल साहब का स्वास्थ्य अगले पांच साल और संघर्ष करने में साथ नहीं देता, लोग सुखबीर को उन जैसा लीडर नहीं मानते. तो क्या ऐसे में वे चाहेंगे कि बीजेपी पंजाब में कभी कांग्रेस का विकल्प बन के उभरे? देख ही रहे हैं हम. मनप्रीत तो अभी कल का सियासतदान है. बादल साहब सही सलामत हैं और वही नज़रें तरेरे बैठा है. कल बड़े अकाली सुखबीर को आँखें नहीं दिखाएँगे, कौन जानता है. अकाली दल कल किस हालत में हो किस को मालूम. किसी भी हालत में आज बड़े और छोटे बादल नहीं चाहेंगे कि उनके अकाली दल की किसी भी वजह से छोटे हो सकने की संभावनाओं के बीच भाजपा बड़ी हो सकती हो. इस लिए उस तरह की किस भी संभावना को आज ही समाप्त करते चलो. छवि-मर्दन इसका सबसे बेहतर उपाय है. वही किया गया है.

ये समझाने की कोशिश कि भाजपा तो करती न करती अकाली दल ने भ्रष्टाचार के आरोपी राज खुराना का इस्तीफ़ा करा दिया है. बात इमेज बनाने, मिटाने की न होती तो इस इस्तीफे की खबर बीजेपी के बयान से भी जारी हो सकती थी. तुक भी यही थी. बंदा बीजेपी का. बीजेपी निकाले, न निकाले. बयान जारी करे, न करे. किसी भी एथिक्स या उसूल से बीजेपी के बन्दे के बारे में बयान अकाली दल ही क्यों जारी कर रहा है. क्या इस लिए कि संसदीय सचिव वो सरकार का है और उसके इस्तीफे की खबर देने का हक़ भी सरकार का ही था? अगर ये यूं भी है तो फिर साथ में इस का क्या मतलब कि बादल साहब ने बीजेपी को खुराना के इस्तीफे के लिए मना लिया है. क्या बीजेपी नहीं मान रही थी?

चलो बहरहाल, अकाली दल ने इस्तीफ़ा ले लिया. आज जब ये पंक्तियाँ लिखी जा रहीं हैं तो बीजेपी की तरफ से सरकार में वरिष्ठतम मंत्री मनोरंजन कालिया की सीबीआई दफ्तर में रगड़ाई हो रही है. उनसे पूछा जा रहा है कि विभाग उनका, पैसे उनके नाम से लिए गए. कैसे वे कसूरवार नहीं हैं. कैसे तकनीकी शिक्षा मंत्री ने उन्हें लिखा कि उस ज़मीन पे मोटर मार्केट न बने, वगैरह वगैरह. उनका नाम कोर्ट में ले चुकी है, सीबीआई हर तकनीकी पहलू से अभियुक्त न सही, सहभियुक्त तो हैं ही कालिया.

तो सवाल है कि क्या उनका भी इस्तीफ़ा होगा.बयान कौन जारी करेगा. इस से भी बड़ा सवाल कि जब आपकी नज़र में सीबीआई का छापा है ही ‘राजनीति से प्रेरित’ तो फिर राजनीति की लड़ाई राजनीतिक तरीके से क्यों नहीं लड़ रहे आप. शहीद क्यों कर रहे हो. वो भी करो. पर, साथ में ये भी क्यों कह रहे हो कि इस्तीफ़ा आपने बीजेपी से कहा तो आया. इस्तीफ़ा लेने के मामले में बीजेपी के ही बन्दे भ्रष्टाचार में डूबे क्यों दिखाई देते हैं आपको? आपके जिन बन्दों पे चार्जशीटें तक लग गईं वो क्यों नहीं लगते आपको इस्तीफ़ा ले लेने लायक? सच कहते हैं निदा फाज़ली साहब, यहाँ सच में ही कोई किसी को रास्ता नहीं देता. आगे बढ़ने के लिए सामने वाले को गिराना ही पड़ता है.गिरा रहे हैं.

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.

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