न्‍यायपालिका की गरिमा से खिलवाड़ मत करो

जगमोहनमैं जज नहीं हूँ. वकील भी नहीं. महज़ पत्रकार हूँ आप ही की तरह. अभी भी सीख ही रहा हूँ तीस साल से. जो सीख पाया हूँ वो ये कि हम न होते तो लोगों में दम न होते. हमारे जैसी न्यापालिका न होती तो हम पे भी रहम न होते. हम सब के सब पता नहीं कब के जे डे हो गए होते. पहले राजनीति शास्त्र, फिर संवैधानिक विधि का छात्र और फिर एक पत्रकार के नाते मैंने पाया है कि हमारे संविधान में इस जैसी न्यायपालिका की परिकल्पना हमारी व्यवस्था के स्थायित्व की एक महत्वपूर्ण शर्त है. हमें इसकी गरिमा बचा ही नहीं, बढ़ा के रखनी चाहिए. अकेले पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने पिछले एक साल में कोई आधा दर्जन जजों को नौकरी से निकाला है तो ज़रूर कुछ कमियाँ होंगी ज़िम्मेवारियों के निर्वहन में. लेकिन यही अपने आप में इसका प्रमाण है कि इस न्याय व्यवस्था में स्वयं अपने परिमार्जन का गुण और क्षमता है.

उन्‍होंने ऊंचे स्‍वर में पूछा, ‘कुछ कर सकते हो?’

जगमोहनसन ’90 में ‘जागरण’ शुरू हुआ दिल्ली से. अगले ही साल चुनाव आ गया. मैं पंजाब, हरियाणा, हिमाचल का ब्यूरो देखता था. पिछले, ’87 के चुनाव में 90 में से 85 सीटें जीती थी ताऊ देवीलाल की पार्टी. वो कितना भी बुरा प्रदर्शन करती तो भी कितनी सीटें कम हो जाती उसकी? मगर ‘जागरण’ ने एक बड़ी भूमिका निभाई. सरकार बन गई और भजन लाल मुख्यमंत्री. मेरी उनसे पहली मुलाक़ात इस के भी कोई दो हफ्ते बाद हुई. दरअसल उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी अपने आफिस में. कह गए कि छह महीने में एसवाईएल बनवा दूंगा. सब चले गए. मैं पीछे था. मैंने पूछ लिया कि मीडिया तो आज से कैलेण्डर पे टिक करना शुरू कर देगा. न बनवा पाए नहर तो बख्शेगा नहीं. उन्हें लगा बात में दम है. मेरा नाम पूछा. बताया तो गले लगा लिया. बोले, आपके नाम से खबरें पढ़ता था. बहुत मदद की आपने. अगले दिन फिर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. कहा,छह महीने में नहर बनवा देने की बात पे कायम हूँ. मगर ये नहीं कहा कि वो छह महीने शुरू कब होंगे.

आगे बढ़ने के लिए सामने वाले को गिराना ही पड़ता है

जगमोहन फुटेला अखबारों में एक खबर है कि रिश्वत और दलाली काण्ड में फंसे संसदीय सचिव राज खुराना का इस्तीफ़ा लेने के लिए बादल ने बीजेपी को मना लिया. अपन को निदा फाज़ली साहब का एक शे’र याद आता है. फिर इस खबर के सुर भी समझेंगे.पर,पहले शे’र…

“यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता,
मुझे गिरा के अगर तुम,
संभल सको तो चलो.
सफ़र में धूप तो होगी,
जो चल सको तो चलो.”

इसलिए पल्ला झाड़ता है पाकिस्तान…!

जगमोहन फुटेला कोताही करे कोई, पर इतना भी काफूर ना हो/खुदगर्जी के हाथों, इतना भी मजबूर ना हो जितना कि आज पाकिस्तान है. फ्रांस में सरफ़रोश होते प्रधानमन्त्री गिलानी हों या इस्लामाबाद में मीडिया से रूबरू होते विदेश सचिव सलमान बशीर. चेहरे उड़े हैं. आखों के अक्स चेहरे के भावों से मेल नहीं खाते. थोड़ी सी बेवफाई फिल्म के एक गीत का वो शे’र शायद इसी सीन के लिए लिखा गया हो-कौन ढूंढे सवाल दर्दों के,लोग तो बस सवाल करते हैं. सवाल समस्या हो गए हैं.शक्लें दोनों की देखी नहीं जातीं.ओसामा दुश्मन दोनों का था. मारा भी दोनों ने मिल के होगा. घर के भेदी के बिना तो भगवान राम भी रावण को नहीं मार पाए थे.पर पाकिस्तान है कि मानने को तैयार नहीं है.मान लेता तो नाम नेकी मिलती. अब बदनामी ज्यादा है. पढ़िए, पाकिस्तान के विदेश सचिव ने प्रेस कांफ्रेंस में क्या क्या कहा.

घोड़े और गधे का फर्क समझिये धोनी जी..!

जगमोहनजीप्रभाष जी अगर जिंदा होते तो 12 मार्च के नागपुर वनडे पर कागद नहीं मुंह कारे करते. ज़रूर पूछते गौतम गंभीर और अपने चहेते सचिन से कि 25 ओवरों में पूरे सात की औसत से 175 रन बन चुकने के बाद वे अपने ही ड्रेसिंग रूम में किसी एक के आउट होने की प्रार्थनाएं क्यूं करवाने लग गए थे. क्यूं टीम चाहने लग गयी थी कि कोई एक तो आउट हो और कोई नया जा के बताए कि टुक टुक नहीं आज तो दो टूक करना है. सच पूछिए तो कप्तान धोनी, कोच गैरी और मैदान में आए बैठे चीफ सलेक्टर श्रीकांत ही नहीं पूरे स्टेडियम ने सुख की सांस ली थी जब तेंदुलकर के आउट होते ही यूसुफ पठान को भीतर भेजने का मौका मिला.

वाह रे डाट कॉम…!!

जगमोहन फुटेलाकोई बीस साल पुरानी बात है. बजाज ने एक ऐड निकाली थी. देश के सभी अखबारों में प्रमुखता से छपवाई. इसमें करीब एक क्विंटल वज़न वाली काया के मालिक और जनसत्ता रिपोर्टर विद्यासागर जी का बजाज स्कूटर पे बैठे हुए का फोटू था. नीचे लिखा था-चंडीगढ़ के विद्यासागर जी ने साढ़े सत्रह साल तक बजाज स्कूटर चलाया और इतने सालों बाद भी वो बिकने की हालत में था. एलएमएल के तब के जीएम भंडारी के मुताबिक़ बजाज की उस एक ऐड ने एलएमएल का बैंड बजा दिया. मैंने उनसे कहा कि अगर आपके डीलरों या आपकी कंपनी के लोगों ने उसके बाद कभी विद्यासागर जी को देखने की ज़हमत उठाई होती तो एलएमएल का बैंड बजने से बच भी सकता था. बल्कि बैंड तो शायद बजाज का बज गया होता. भंडारी बोले कैसे? मैंने बताया कि साढ़े सत्रह साल बजाज चलाने और बेचने के बाद विद्यासागर जी स्कूटर तो दरअसल एलएमएल ही खरीदा था. भंडारी के काटो तो खून नहीं था.

मुझे आज के दीपक चौरसियाओं से कोई गिला नहीं है!

जगमोहन फुटेला: नहीं ला सके दिल्‍ली में टीवी वाले बाढ़ : शायद केन्‍द्र सरकार के दबाव में हरियाणा ने समेट लिया बाढ़ : वृहस्पतिवार की सुबह से दीपक चौरसिया और उनके साथी देश को दिल्ली में बाढ़ और दुनिया को कामनवेल्थ खेल न हो सकने से डरा रहे हैं. बाढ़ नहीं आई. आनी ही नहीं थी. आएगी भी नहीं. खेल भी हो के रहेंगे. लेकिन चौरसिया चौकड़ी का चेहरा ज़रूर बेनकाब हो गया. ये भी पहली बार नहीं हुआ है. आप को याद दिला दें कि चौरसिया साहब की ये पहली सनक नहीं है, न उनकी तरफ से पत्रकारिता के साथ हुआ ये पहला मज़ाक….संसद पे हुआ हमला याद है आपको? दीपक चौरसिया तब सबसे तेज़ खबरें देने का दावा करने वाले एक चैनल में महज़ रिपोर्टर हुआ करते थे. उस दिन संसद वे भी पहुंचे थे. उस दिन की उस चैनल की फुटेज इस बात की गवाह है कि भाई साहब कोई डेढ़ घंटे तक संसद परिसर में बम फटने, उसका ज़ोरदार धमाका होने, वहां बम निरोधी दस्ता पहुंचने, भगदड़ मचने से लेकर ऐसे ही और बमों की तलाश तक पे ‘लाइव’ करते रहे.

….तो सिर्फ जाट ही बदनाम क्यों हैं?

मैंने बुजुर्गों को बचपन ही से शादी ब्याह के वक्त गोत्र, उसमें भी उपजाति, परिवार के मूल स्थान और रीति रिवाज से लेकर वधु की चूड़ियों के रंग तक का अता पता करते देखा है. ये तय करने के लिए कि शादी मिलते जुलते खानदान के साथ तो हो लेकिन गलती से भी अपनी ही उपजाति के लड़के या लड़की से न हो जाए. खासकर पंजाबियों में ये मान कर चला गया है कि खुराना, कक्कड़, मक्कड़, सलूजा, सुखीजा, कपूर या चावला लड़का और लड़की कभी कोई पुरानी जान पहचान न हो तो भी आपस में भाई-बहन होते हैं.

जो प्रभाष जी पंजाब न आए होते!

प्रभाष जोशी के लिए लिखना जितना आसान था, उनके बारे में लिख पाना उतना ही मुश्किल। उनकी उपलब्धियों को आंक पाना शोधकर्ताओं के लिए भी आसान नहीं होगा। इसलिए कि उनके आयाम कई थे। मैं उनके सिर्फ एक आयाम, ‘जनसत्ता’ को पंजाब लाने का जिक्र करुंगा। पर उससे पहले एक छोटी सी घटना। ‘जनसत्ता’ के लिए रिपोर्टिंग के दौरान मुझे चंडीगढ़ के 22 सेक्टर में अखबार का सब आफिस ढूढंते तीन चार सरदार मिले। वे सब के सब संगरूर से आए थे। शुक्रिया अदा करने। उनने बताया कि ‘जनसत्ता’ की चौदह कापियां वे तब भी खरीदते थे जब की अखबार दिल्ली से छपता था। उन्हें अखबार अगले दिन मिलता था। वे सभी चौदह लोग मित्र थे। हर कोई अपनी अलग कापी मंगाता था। चंडीगढ़ से संगरूर तक अखबार पहुंचने का प्रबंध उन लोगों ने खुद किया था। मोहाली में रहने वाले अपने एक दोस्त के जरिये। जुनून पाठकों को था तो इसलिए कि जुनून जोशी जी में था। दिल्ली से आम आदमी के लिए आम बोलचाल वाली भाषा में बेखौफ अखबार निकाल कर तब तक हो रही पत्रकारिता को एक नई पहचान वे दे ही चुके थे।