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आदिवासी और उनके संघर्ष : साजिशाना खामोशी!

गिरीशजी: जल-जंगल-जमीन संघर्ष को लोकतांत्रिक होना ही होगा : पिछले दिनों वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ’उग्र वामपंथञ पर दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्ठी हुई. देश के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों ने इसमें भाग लिया. चर्चा में अनेक मुद्दे बहस के विषय रहे. यहां उग्र वामपंथ से तात्पर्य नक्सलवाद से ही रहा और चिंता यही रही कि देश के 15 राज्यों के दो सौ जिलों में फैले नक्सली नेटवर्क की हिंसा बंद होनी चाहिए, और संघर्ष का रूप जम्हूरी होना चाहिए. लेकिन इस चिंता से ज्यादा नाराजगी का स्वर सरकारी हिंसा, आदिवासियों के भू-विस्थापन, उनके लगातार हो रहे शोषण पर ढुलमुल रवैये और शासन की उदासीनता, जल-जंगल-जमीन के लिए आंदोलनरत समाज की मांगों को अनसुना करके बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट तबकों को बढ़ावा देने पर था.

गिरीशजी

गिरीशजी: जल-जंगल-जमीन संघर्ष को लोकतांत्रिक होना ही होगा : पिछले दिनों वर्धा के महात्मा गांधी अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में ’उग्र वामपंथञ पर दो दिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्ठी हुई. देश के विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों ने इसमें भाग लिया. चर्चा में अनेक मुद्दे बहस के विषय रहे. यहां उग्र वामपंथ से तात्पर्य नक्सलवाद से ही रहा और चिंता यही रही कि देश के 15 राज्यों के दो सौ जिलों में फैले नक्सली नेटवर्क की हिंसा बंद होनी चाहिए, और संघर्ष का रूप जम्हूरी होना चाहिए. लेकिन इस चिंता से ज्यादा नाराजगी का स्वर सरकारी हिंसा, आदिवासियों के भू-विस्थापन, उनके लगातार हो रहे शोषण पर ढुलमुल रवैये और शासन की उदासीनता, जल-जंगल-जमीन के लिए आंदोलनरत समाज की मांगों को अनसुना करके बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों और कारपोरेट तबकों को बढ़ावा देने पर था.

विख्यात मानवशास्त्री प्रो. नदीम हसनैन ने आदिवासी इलाकों में सक्रिय नक्सलियों के रेड कोरीडोर की बात उठाते हुए कहा कि लोकतांत्रिक देश में उग्र वामपंथ अपनी शक्ति एवं वैधता शोषित-दमित आदिवासियों के नाम पर प्राप्त करता है. औपनिवेशिक ताकतें हमारे प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा कर रही हैं और दुर्भाग्य यह है कि इसे सार्वजनिक हित और विकास बताया जा रहा है. आदिवासी भू-विस्थापन की भारी समस्या से जूझ रहे हैं. भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति पी.बी. सावंत और प्रख्यात समाजविज्ञानी असगर अली इंजीनियर ने इस बात पर जोर दिया कि इन समस्याओं का समाधान लोकतंत्र में है. यह कॉर्पोरेट क्षेत्र और दूसरे निहित स्वार्थों की मंशा है कि जनता मौन रहे, ताकि ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाया जा सके. न्यायमूर्ति सावंत ने तो इसे ‘कांसपिरेसी ऑफ साइलेंस’ तक कहा यानी साजिशन खामोशी. चर्चा में प्रमुखता से यह बात भी उठी कि सारे आदिवासी इलाकों में भूमि रिकार्ड ठीक किए जाएं. आदिवासियों के विकास के लिए ‘लैंड फार लैंड’ की नीति अपनाई जाए. यह भी प्रयास किए जाएं कि बंजर भूमि को उपजाऊ बनाकर आदिवासियों को दी जाए. संक्षेप में कहें तो आदिवासी समाज के विकास के नाम पर शोषण की प्रक्रिया बंद होनी चाहिए और आदिवासियों को भी लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीके से अपनी मांगें देश-समाज-सरकार के सामने रखनी चाहिए.

चर्चा में यह प्रश्न भी प्रमुखता से उठे कि सिर्फ राजनीतिक पार्टियां ही नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं भी आदिवासियों के अस्तित्व के मुद्दों पर खामोश रही हैं. और कोई ताज्जुब नहीं कि ये ‘खामोशी अर्थपूर्ण’ हो. आखिर ऐसा कैसे होता है कि आदिवासियों के कथित प्रभावित क्षेत्र विभिन्न राज्यों में हैं और इन राज्यों में देश की वामपंथी, मध्यमार्गी और दक्षिणपंथी पार्टियों की अलग-अलग नीतियों को अपनाने वाली सरकारें हैं, लेकिन आदिवासियों, अपने अस्तित्व को लेकर उनके संघर्ष और वहां सक्रिय कथित नक्सली संगठनों को लेकर इन सभी राज्यों में विभिन्न पार्टियों और उनकी सरकारों का रुख एक जैसा है. इसके क्या अर्थ लगाए जाएं? क्या ये माना जाए कि भिन्न नीतियों-विचारों के बावजूद जल-जंगल-जमीन की बात करने वाले आदिवासियों के बारे में भी उनका रुख एक ही है? माना कि बंदूक और हिंसा में यकीन करने वाले नक्सलियों को लेकर सरकारों का रुख इसलिए एक हो सकता है कि वे लोकतांत्रिक सरकारें हैं लेकिन आदिवासियों की न्यायोचित और उनके समाज के जीवन अस्तित्व की रक्षा से जुडी मांगों पर भी इन सरकारों का रवैया प्राय: एक जैसा कैसे हो जाता है? विचित्र एवं चिंताजनक तो तब और भी हो जाता है, जब सुप्रीम कोर्ट द्वारा आदिवासियों के हित में मानवाधिकार संगठनों की गतिविधियों पर यह कहकर रोक लगाने से इनकार कर दिया जाता है कि इन्हें सहानुभूति रखने से कैसे रोका जा सकता है, और इस बाबत सरकारों को फटकार भी लगाई जाती है, लेकिन प्रायः सरकारें सबक सीखती प्रतीत हों, ऐसा नहीं लगता. ऐसे में सवाल क्या यह नहीं उठता कि संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में उल्लिखित आदिवासी हितों और कल्याणकारी राज्य की धारणा कहां है? और अगर सरकारी दलील मानी जाए कि ऐसा नहीं है और उनके कल्याण के काम हो रहे हैं, तो सवाल है कि फिर ये नक्सली कहां से आ गए?

ऐसा लिखने का तात्पर्य यह कतई नहीं है कि हिंसा में लिप्त नक्सलियों या किसी अन्य तबके की गतिविधियों को उचित ठहराया जा सके. किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक-संवैधानिक देश-समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है. यह बात न्याय के लिए खुद को प्रतिबद्ध बताने वाले नक्सलवादी संगठनों को भी समझनी चाहिए, साथ ही सरकारी स्तर पर भी इस तथ्य को व्यवहार में परिणित होते हुए दिखना चाहिए. आज नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सबसे बड़ी जरूरत खाई की तरह हर रोज बढ़ते ‘अविश्वास’ को पाटने की है. किसी का किसी पर विश्वास नहीं है. इस स्थिति को बदलने के लिए समाज के जागृत होने की आवश्यकता है. हमारी सिविल सोसाइटी, सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाएं, नया उभरता मध्य वर्ग और बौद्धिक समाज- यह उनके खामोश और मूकदर्शक बने रहने का भी नतीजा है. यहां सवाल यही उठता है कि स्वभाव और प्रकृति से ही शांत आदिवासियों के लोकतांत्रिक समाज में हिंसा का प्रवेश आखिर हो कैसे जाता है? क्या यह हमारे पूरे लोकतांत्रिक परिदृश्य, ताने-बाने और समाज की कमजोरी नहीं? क्या यह हमारी जम्हूरियत की कमजोरी से पैदा हुई रिक्तता को भरने के लिए तो हिंसा का प्रवेश नहीं? जो भी हो, लेकिन कोई दो राय नहीं कि जम्हूरी प्रक्रिया में सिर्फ यही काफी नहीं कि वहां हिंसा के किसी स्थान की बात न हो, बल्कि ऐसी हर गतिविधि, संशय या विचार का एकमात्र जवाब भी लोकतंत्र ही है. यह भी समझा जाना चाहिए कि हर हिंसा दूसरी हिंसा को, कटुता दूसरी कटुता को, घृणा दूसरी घृणा को ही जन्म देती है. दुनिया का इतिहास भी गवाह है कि हिंसा से हासिल कथित लक्ष्य न तो कभी मुकम्मल होता है और न ही दीर्घजीवी. वो चाहे कोई भी क्रांति, बदलाव या मुहिम हो.

आज अगर नक्सलवादियों के प्रति प्रख्यात लेखिका महाश्वेतादेवी खुली सहानुभूति व्यक्त करती हैं. अरुंधती राय उन्हें ‘गांधियंस विद गन्स’ कहती हैं, स्वामी अग्निवेश उनसे वार्ता के लिए मध्यस्थता के लिए तैयार होते हैं और अनेक बुद्धिजीवी उनसे वार्ता के जरिए मध्यमार्गी रास्ता निकालने की मांग करते हैं, तो सरकार को भी रुख में परिवर्तन करना होगा. सरकार को भी समझना होगा कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ है. एकांगी दृष्टि को त्याग कर नई समग्र बहुआयामी दृष्टि अपनानी होगी. नक्सलियों को देश का सबसे बड़ा आंतरिक खतरा बताना या उनसे प्रभावित इलाकों में बमबारी की बात करना समस्या का निदान नहीं है. विकास की अवधारणा को भी कारपोरेट जगत के चश्मे से ही देखने के अलावा आदिवासी कल्याण की दृष्टि से भी देखने-समझने की आवश्यकता है. दूसरी ओर नक्सलियों को भी देश के लोकतांत्रिक कलेवर और सांस्कृतिक संदर्भ को समझने की जरूरत है, जिसमें हिंसा और बंदूक के लिए जगह नहीं है.

हिंसा-अहिंसा और लोकतांत्रिक संघर्ष की बात जितनी महत्वपूर्ण है, उतना ही अहम यह भी है कि आदिवासियों के बीच से ही नया जम्हूरी नेतृत्व भी पैदा होना चाहिए – जो उनके समाज की लोकतांत्रिक संरचना, आकांक्षा, आंदोलन और न्यायपूर्ण संघर्ष की चाहत के बीच से स्वतःस्फूर्त निकले, तो ही बेहतर है. जाहिर है कि यदि हम लोकतांत्रिक समाज, न्यायपूर्ण-कल्याणकारी समाज चाहते हैं तो हमारे तरीके भी लोकतांत्रिक ही होने चाहिए और आज जब दुनिया भर में नई जम्हूरी हवा बह रही है तो सरकार के साथ-साथ आदिवासी समाज और उन्हें न्याय दिलाने की बात करने वालों के साथ ही सरकार को भी नई सीख और संकल्प लेने की जरूरत है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ में रविवार को प्रकाशित होने जा रहा है. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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