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आनंद के साथ ये कैसा मजाक!

पदमपति शर्मा: एक खिलाड़ी के साथ ऐसा रवैया शर्मनाक : इधर काफी जोर-शोर से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने का अभियान छेड़ा गया, इसमें आशा भोंसले जैसी हस्तियां भी शामिल हैं। चर्चा कपिल देव और सुनील गावस्कर को भी भारत रत्न देने की उठी, लेकिन एक ध्रुव सत्य यह है कि अगर कोई भारत रत्न का सबसे ज्यादा सुपात्र है, तो वे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर जबरदस्त प्रदर्शन किया है। सचिन को भारत रत्न निश्चित रूप से मिलना चाहिए। निस्संदेह इस मास्टर-ब्लास्टर ने देश के खेल प्रेमियों को आनंद के असंख्य क्षण पिछले 20 वर्षो में प्रदान किए हैं, लेकिन मेरी नजर में दो ऐसे शख्स हैं, जो वाकई में खेल की दुनिया में भारत रत्न हैं।

पदमपति शर्मा

पदमपति शर्मा: एक खिलाड़ी के साथ ऐसा रवैया शर्मनाक : इधर काफी जोर-शोर से सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने का अभियान छेड़ा गया, इसमें आशा भोंसले जैसी हस्तियां भी शामिल हैं। चर्चा कपिल देव और सुनील गावस्कर को भी भारत रत्न देने की उठी, लेकिन एक ध्रुव सत्य यह है कि अगर कोई भारत रत्न का सबसे ज्यादा सुपात्र है, तो वे खिलाड़ी हैं, जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर जबरदस्त प्रदर्शन किया है। सचिन को भारत रत्न निश्चित रूप से मिलना चाहिए। निस्संदेह इस मास्टर-ब्लास्टर ने देश के खेल प्रेमियों को आनंद के असंख्य क्षण पिछले 20 वर्षो में प्रदान किए हैं, लेकिन मेरी नजर में दो ऐसे शख्स हैं, जो वाकई में खेल की दुनिया में भारत रत्न हैं।

नंबर एक-1980 के दशक में बैडमिंटन में धूमकेतु की तरह चमके प्रकाश पादुकोण, जिन्हें बैडमिंटन का शायद ही कोई अंतरराष्ट्रीय तमगा न मिला हो। मुझे याद है 1980 मे प्रकाश खाली झोली के साथ देश के बाहर निकले थे और जब लौटे, तो झोली में तिल धरने की जगह नहीं थी, वह उपाधियों से भरी पड़ी थी। मुंबईवासियों ने उनका जो स्वागत किया था, उसे कौन भूल सकता है, किसी खिलाड़ी विशेष का ऐसा स्वागत पहली और अंतिम बार हुआ था।

लेकिन लोगों की याददाश्त बहुत कमजोर होती है। बहुतेरे लोग आज प्रकाश को अभिनेत्री दीपिका पादुकोण के पिता के रूप में ज्यादा जानते हैं और शायद यही हमारे खेलों की सबसे बड़ी विडंबना भी है। दूसरी शख्सियत वह है, जिसने भारतीय शतरंज जगत में मौन क्रांति की। अगर हरित क्रांति के लिए स्वामीनाथन, दुग्ध क्रांति के लिए कुरियन और शतरंज क्रांति के लिए अगर हम किसी एक व्यक्ति को श्रेय देंगे, तो वह विश्वनाथन आनंद हैं। जी हां, वही आनंद जिनके बारे में मानव संसाधन विकास मंत्रालय पूछता है कि आनंद कहां रहते हैं, इनकी नागरिकता क्या है? यह कितना शर्मनाक रवैया है नौकरशाहों की, यह बताने की जरूरत नहीं है।

आजादी मिले 63 साल हुए, जमाना कहां से कहां पहुंच गया। तमाम तब्दीलियां आईं, लेकिन भारतीय नौकरशाही में कोई फर्क नहीं पड़ा, जैसी वह 1947 में थी, वैसी ही 2010 में भी है। सवाल नागरिकता के नाम पर आनंद को डॉक्टरेट देने से रोकने का नहीं है। सवाल तो देश की शासन या प्रशासन की शैली का है, उसमें तब्दीलियों का है। हम वैश्वीकरण की बात करते हैं। हम सूचना प्रौद्योगिकी में गुरू होने का दम भरते हैं, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि सरकारी तंत्र की कछुआ चाल मे कोई फर्क नहीं आया है। सूचना तकनीक की सुविधा विदेशियों को देने के लिए है, सरकार को अपने काम के लिए शायद इसकी कोई जरूरत नहीं है। यही कारण है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने आनंद की फाइल को रोक दिया।

आज हम क्रिकेट की चर्चा ज्यादा करते हैं और इसको लेकर कोई ईष्‍या भी नहीं है, इसलिए नहीं है कि टेलीविजन पर दिनभर क्रिकेट मैचों का प्रसारण होता है, विज्ञापन मिलता है। यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है कि देश में शतरंज को टीवी का खेल बनाने की कोशिश नहीं की गई है। परन्‍तु टीवी पर शतरंज के न छाए होने से उसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई है और ना ही उसकी लोकप्रियता क्रिकेट से कम नहीं है। हमारा देश क्रिकेट प्रतिभाओं की खान है या नहीं, यह एक लंबी बहस या विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन भारत जिसे शतरंज का जन्मदाता भी कहा जाता है, यह शतरंज की बेशकीमती खान है और इसका कोई प्रमाण देने की जरूरत नहीं है।

यह भी सच है कि शतरंज की दुनिया में आनंद के आने के पहले कौन-कहां की सूची में हम कहीं नहीं थे। ग्रैंडमास्‍टर की तो बात दरकिनार, वह तो तब एक कभी न पूरा होने वाला ख्वाब था। मास्टर भी एक-दो ही थे, शतरंज में एक ही मास्टर का नाम सुना जाता था- मेनुएल आरोन, वे अभी भी हैं। बीते सालों में हर स्तर पर भारतीय विश्व शतरंज में छाए हुए हैं और ग्रैंडमास्टर इतने हो गए हैं कि हम उन्हें अंगुलियों पर नहीं गिन सकते। इस विकास या शतरंज क्रांति का श्रेय अगर किसी एक को दिया जा सकता है, तो वह सिर्फ विश्वनाथन आनंद हैं।

विवाद की जड़ कहां है? जड़ है आनंद का स्पेन में कई वर्षो से रहते हुए वहां अपना दूसरा ठिकाना बना लेना और भारत सरकार ने शायद इसे आनंद की सबसे बड़ी भूल मान लिया है। आखिर तभी तो उनकी नागरिकता पर प्रश्नचिन्ह लगा। जबकि सच यह है कि आनंद ने रियाज की सुविधाएं और एकाग्रचित्त होने में सहायक माहौल को देखते हुए विदेश में रहना स्वीकार किया है। इससे वे विदेशी नहीं हो गए हैं, वे भारत का ही नाम रोशन कर रहे हैं। इस संसार में ईश्वर ने अगर कुछ कम्प्यूटर-तुल्य मस्तिष्क दिए हैं, तो उनमे आनंद भी एक हैं। सुपर कम्प्यूटर को इंसानी दिमाग ने ही बनाया है, लेकिन सुपर कम्प्यूटर से जीता नहीं जा सकता। आनंद इस “मिथ” को भी तोड़ चुके हैं और न जाने कितने मौकों पर उन्होंने शतरंज की चालों में कम्प्यूटरों को भी मात दी है। आनंद इस दौर के एक बड़े जीनियस हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सौजन्य से जो अप्रिय विवाद खड़ा हुआ, वह आनंद की मनोदशा को तोड़कर रख देता, लेकिन इस विवाद से निर्लिप्त आनंद का दिमागी कम्प्यूटर अपना काम पहले की तरह ही कर रहा था और इसका सबसे बड़ा प्रमाण यही है कि जब देश में आनंद के अपमान की चर्चा हो रही थी, तब वे हैदराबाद में एक साथ 40 शतरंज खिलाडियों का सामना कर रहे थे। गणितज्ञों की कॉन्फ्रेन्स मे उनके खिलाफ 35 गणितज्ञ और इन्फोसिस के पांच चुने हुए शतरंज खिलाड़ी खेल रहे थे। मात्र एक खिलाड़ी 14 वर्षीय श्रीकर ही भाग्यशाली थे कि बाजी में आनंद के साथ बराबरी कर सके।

यह घटना वास्तव मे आनंद का बड़प्पन दिखाती है। जब उनसे पूछा गया, तो उन्होंने जवाब दिया, “इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।” गनीमत है बुद्धिमान मंत्री कपिल सिब्बल ने बिना किसी आडंबर या हिचक के इस शतरंज जीनियस से माफी मांग कर विवाद को खत्म करने की कोशिश की। लेकिन यह यक्ष प्रश्न आज भी मुंह बाए खड़ा है कि देश की व्यवस्था कब सुधरेगी। कब वह समय आएगा, जब देश चलाने वालों के पास देश से संबंधित पूरी जानकारी होगी, और शायद तभी हम विकसित राष्ट्र बन पाएंगे।

लेखक पदमपति शर्मा देश के जाने-माने खेल पत्रकार हैं.

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