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आफत : और महंगा होगा पेट्रोल

आलोक कुमार प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी रंगराजन ने देश के वित्तीय घाटे के रोकथाम के लिए पेट्रोल की कीमत में फिर इजाफा करने की सलाह दी है। रंगराजन की सलाह के साथ ही सभी पेट्रोलियम पदार्थों के कीमत का इजाफा करने के लिए सरकारी तंत्र ने कसरत करना शुरू कर दिया है। आईए, महंगाई के मूल वजहों में से एक पेट्रोल की महंगाई को एक मिसाल से समझते हैं। मुख्यमंत्री नल्लारी किरण कुमार रेड्डी के राज्य की राजधानी हैदराबाद के पेट्रोल पंप पर 70 रुपए 70 पैसे प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिल रहा है। अब कीमत कहां पहुंचेगी और आम इंसान के जीवन को कितना दूभर कर देगी कहा नहीं जा सकता।

आलोक कुमार प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन सी रंगराजन ने देश के वित्तीय घाटे के रोकथाम के लिए पेट्रोल की कीमत में फिर इजाफा करने की सलाह दी है। रंगराजन की सलाह के साथ ही सभी पेट्रोलियम पदार्थों के कीमत का इजाफा करने के लिए सरकारी तंत्र ने कसरत करना शुरू कर दिया है। आईए, महंगाई के मूल वजहों में से एक पेट्रोल की महंगाई को एक मिसाल से समझते हैं। मुख्यमंत्री नल्लारी किरण कुमार रेड्डी के राज्य की राजधानी हैदराबाद के पेट्रोल पंप पर 70 रुपए 70 पैसे प्रति लीटर की दर से पेट्रोल मिल रहा है। अब कीमत कहां पहुंचेगी और आम इंसान के जीवन को कितना दूभर कर देगी कहा नहीं जा सकता।

हैदराबाद में पेट्रोल की कीमत वाली मिसाल इसलिए कि पड़ोसी देश पाकिस्तान में भी एक हैदराबाद है। वहां के हैदराबादी लोग हमारे हैदराबाद की तुलना आधी कीमत यानी महज पैंतीस रूपए लीटर की दर से पेट्रोल भरवाते हैं। सिर्फ हैदराबाद ही नहीं करांची, एबटाबाद, लाहौर और इस्लामाबाद यानी पूरे पाकिस्तान में लोग उतनी रकम में दो लीटर पेट्रोल खरीद लेते हैं, जितने में हम भारतीय मन मसोसकर महज एक लीटर पेट्रोल अपने वाहन में भरवाते हैं। तो हमारा कसूर क्या है? एक ही बाजार से खरीदी गई पेट्रोल की कीमत हमसे ज्यादा क्यों वसूलती है सरकार? हमारा अफसोस इसलिए भी गहरा है कि हमारी अजब-गजब की दावेदारी है। हम दुनिया के सबसे बडे़ लोकतांत्रिक देश हैं, स्वस्थ लोकतंत्र के नागरिक हैं, सरकार को कल्याणकारी मुद्रा में रखने को मजबूर करने का ताकत हम में बहुतों से ज्यादा है। ये बातें हैं जिन पर हम गर्व करते रहते हैं। कहते नहीं अघाते कि जोर से विरोध पर आजादी के बाद से कई मर्तबा हमने सरकारें बदल दी हैं।

तो फिर पेट्रोल जैसी निहायत जरूरी पदार्थ की आसमान छूती कीमत पर हम चुप क्यों हैं ? क्या है हमारी मजबूरी? समाजशास्त्र से निकला इसका सीधा जवाब सिर्फ ये हो सकता है कि जब पक्ष और विपक्ष एक ही नीति पर देश को चलाए रखने पर आमादा हो। विपक्ष किसी वैकल्पिक नीति की बात नहीं कर रहा हो तो विकल्प के अभाव में जनता में विरोध का माद्दा खत्म हो जाता है। फिर पेट्रोल की कीमतों का हाल गरीब की जोरू जैसी है। जिसे जैसे आता है पेट्रोल की कीमत को लेकर अपने तरीके से मजाक कर जाता है। दरअसल देश के सभी राज्यों में पट्रोल की कीमत अलग-अलग है। विरोध के अभाव में राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी कीमतों के बीच हर प्रांत पेट्रोल पर मनमानी तरीके से टैक्स वसूलता है।

वैकल्पिक व्यवस्था या नीति की कमी में हम मंहगाई पर अर्थशास्त्रियों के उल्टे सीधे दलीलों के झांसे में फंस जाते हैं। विरोध की ताकत को नहीं अजमाते। सोचने वाली बात है कि क्या दुनिया में कथित तौर पर सबसे तेज रफ्तार में तरक्की करते अर्थव्यवस्था का अंग बनकर हम बेजान और बेसुध हो गए हैं। हमें परवाह ही नहीं है कि हमारी गाढ़ी कमाई को अर्थशास्त्री सरकारें महंगाई का पलीता लगाकर फूंक रही हैं और इसका मुंहतोड़ जवाब देने की बजाय हम आर्थिक तरक्की के झुनझुने की आवाज में बच्चों की तरह दर्द के अहसास को भूले जा रहे हैं। अफीमची की तरह हम शिथिल पडे़ हैं। मंहगाई जैसे बावास्ता भरे मुद्दे की खिलाफत करने से अब तो हिचकने भी लगे हैं।

पेट्रोल से दिनचर्या चलाने वाले भारतीयों की संख्या पचास करोड़ से ज्यादा है। अमेरिका के बाद दुनिया में यह दूसरी सबसे बड़ी मध्य वर्गीय आबादी है जो प्रतिदिन की कमाई पर अपना जीवन चलाती है। पेट्रोल की महंगी कीमत से सबसे ज्यादा प्रभावित यही आबादी है। इस विशाल आबादी को देखकर सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि अब लोकतंत्र में लोक कल्याण के फलसफे का कोई मतलब नहीं बचा। सच्चाई है कि 1991 से नई अर्थ नीति लागू होने के दो दशकों में बाइस बार पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमत बढ़ चुकी है। हम कभी कारगर विरोध दर्ज नहीं करा पाए हैं। जिससे सरकार में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में इजाफे और इजाफे से आम उपभोग की वस्तुओं की कीमत बढ़ जाने के खतरे का कोई खौफ पैदा हो। सिर्फ पेट्रोल की बात करें तो इसकी कीमत 1991 में नौ रूपए से बढ़कर अब सत्तर रुपए प्रति लीटर तक पहुंचा दी गई है।

अर्थशास्त्रियों का तर्क है कि तेल कंपनियों के घाटे को देखते हुए कीमतों में इजाफा जरूरी हो जाता है। अब सरकार ये भी कहती है कि पेट्रोल की कीमत बाजार के हवाले कर दिया गया है। जाहिर है इससे पेट्रोल के आसरे दिनचर्या चला रहे लोग भी बाजार के हवाले कर दिए गए हैं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ी तो पेट्रोल महंगी दर महंगी होती जाएगी। लेकिन इसी तर्क के सहारे कभी तेल का दाम कम होते नहीं सुना है। आंकडों की भाषा बोलने वालों के सामने तथ्य मौजूद है कि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में पिछले साल कई बार तेल की कीमत धम्म से गिरी लेकिन पेट्रोल की कीमत हमारे यहां कम नहीं हुई। सस्ती का अहसास कभी होगा भी यह हसरत बस हसरत बनी रही।

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत गिरने की वजह से सस्ती खरीद का लाभ उपभोक्ताओं को मिलना चाहिए। लेकिन सीधे सरल तरीके से समझ आने वाली इस तर्क को अक्सर यह कहकर काट दिया जाता है कि किरासन तेल, डीजल और रसोई गैस पर सब्सिडी की वजह से सरकार और तेल कंपनियों को काफी नुकसान होता रहता है,  इस नुकसान की भरपाई के लिए ही अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत के उतार का लाभ भारतीय उपभोक्ताओं को नहीं मिल पाता है। चित भी मेरी पट भी मेरी के कुतर्क का यह शानदार मिसाल है।

ऐसा नहीं है कि जिस पाकिस्तान को मृत होते मुल्क की संज्ञा दी जाती है सिर्फ उसी पाकिस्तान में लोग भारत की तुलना में आधी कीमत में पेट्रोल का उपभोग कर रहे हैं। बल्कि पड़ोसी श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में भी दिल्ली से सत्रह फीसदी कम कीमत पर यानी महज 47 रुपए प्रति लीटर की दर से पेट्रोल बिक रहा है। पड़ोसी बंग्लादेश की राजधानी ढाका में 46 रुपए 20 पैसे की कीमत में प्रति लीटर पेट्रोल मिल रहा है। नेपाल की राजधानी काठमांडू और भूटान के थिम्पू के लोगों को भारतीय उपमहाद्वीप की बाकी देशों की तरह सस्ता पेट्रोल इसलिए नहीं मिल पा रहा है कि इन दो देशों में पेट्रोलियम पदार्थों के निर्यात का नियंत्रण भारतीय तेल कंपनियों के पास है।

अगर कथित अर्थिक तरक्की के प्रतिद्वंदी चीन की बात करें तो दिल्ली की तुलना बिजिंग में पेट्रोल 34 फीसदी कम लागत में मिलता है। भारतीय मुद्रा में साढे़ सैतीस रुपए में आम चीनी प्रति लीटर पेट्रोल भराता है। अमेरिका में भारत से 36 फीसदी सस्ती कीमत में पेट्रोल मिल रहा है। ये सभी अंतर्राष्ट्रीय बाजार से भारत के समान कीमत पर ही तेल उठाते हैं और आम उपभोक्ताओं का ख्याल करते हुए भारत से बेहद सस्ती कीमत पर पेट्रोल बेचते हैं। सरकार का तर्क है कि पेट्रोल की बढ़ी कीमत की आड़ में वह किरोसीन पर बने भारी सब्सिडी का हिसाब चुकता करती है। यह आम आदमी की जेब पर डाका वाला गणित है। सब्सिडी की रकम टैक्स के दूसरे रास्तों से इकट्ठा किया जाना चाहिए। न कि एक तरफ तो कार कंपनियों को दिन दुनी रात चौगुनी रफ्तार से उत्पादन करने की छूट दी जाए। कार की खरीद के लिए भांति भांति से प्रोत्साहन दिया जाए और फिर कार के इंधन के नाम पर लोगों से गाढ़ी कमाई पर डाका डाला जाए।

पेट्रोल की कीमत बढ़ाकर घाटा पूरा करने की सरकारी नियत का एक और दुष्परिणाम है। बाजार में डीजल से चलने वाले वाहनों की धूम मची है। डीजल पर किसानों की मदद की आड़ में सब्सिडी दी जाती है। देश में मिलने वाली सब्सिडाईज डीजल का सबसे ज्यादा फायदा कार और टैक्सी चलाने वाली आबादी उठा रही है। डीजल से प्रदूषण होने को रोकने के लिए दिल्ली, मुंबई जैसे महानगरों में सीएनजी को बढ़ावा देने की बात आई थी। सीएनजी का देशी उत्पादन ज्यादा है। इससे गाडियों को सस्ता ईंधन उपलब्‍ध कराने की बात थी। लेकिन उस्तादों ने धीरे-धीरे सीएनजी का भाव में मोटी आमद के खाते में जोड़ दिया है।

लेखक आलोक कुमार ने कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. उन्होंने ‘आज’, ‘देशप्राण’, ‘स्पेक्टिक्स इंडिया’, ‘करंट न्यूज’, होम टीवी, ‘माया’, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज, आजतक, सहारा समय, न्यूज़ 24, दैनिक भास्कर, नेपाल वन टीवी में अपनी सेवाएं दी हैं.  झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह नौकरियां करने के बाद आलोक इन दिनों मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं.

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