हिन्दुस्तान की सबसे बड़ी मर्डर मिस्ट्री, कौन है आरुषी का असली कातिल?, तलवार दम्पति पर चलेगा मुक़दमा – ये चंद ऐसे शीर्षक हैं जो पिछले दो सालों में लगातार हमारे टीवी स्क्रीनों और अखबारों में लगभग लगातार दिखाई देते रहे हैं, मानो आरुषि कांड हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या हो. जिस देश में ना जाने कितने ही गंभीर अपराध होते रहते हैं, वहां एक दोहरे हत्याकांड को सुर्ख़ियों में ला कर उसे हमारे मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह से उतार देना आज की पत्रकारिता का एक बाजारू स्वरुप ही कहा जाएगा. कल इस मामले में सीबीआई कोर्ट का कुछ फैसला आया और उसके बाद से उसे दर्शकों तक पहुंचाने की ऐसी होड़ लगी जिसे देख कर लग रहा था कि यदि इस काण्ड के हर चीथड़े को सबों के सामने ला कर नहीं दिखा दिया गया तो वास्तव में राष्ट्र का भारी नुकसान हो जाएगा.
आरुषि की कुछ फोटोग्राफ्स, फिर उसके घर की तस्वीरें और पुराने तफ्तीश के दौरान खींची गयी गयी क्लिपिंग. दिन भर यह सिलसिला ऐसे चला जैसे यह वास्तव में हमारे देश की सबसे बड़ी घटना हो. यह एक ऐसी प्रवृति है जिसे मैं ना सिर्फ आश्चर्यजनक मानता हूँ बल्कि कई मायनों में घातक भी. इतना बड़ा देश, इतनी सारी समस्याएं, इतनी सारी घटनाएं-दुर्घटनाएं. पर सारा का सारा फोकस एक दोहरे हत्या-काण्ड पर. ठीक है, टीवी और अखबार कुछ लोगों की निजी जागीर है, सो जो चाहें सो दिखाएँ, कोई भला क्या कर सकता है. मन हुआ तो तिल का ताड़ बनाया, मन हुआ तो बड़ी से बड़ी बात को दबा दिया. यह तो “ताकत है तो उसका मनमर्जी इस्तेमाल” करने वाली बात हुई, कुछ उसी तरह से जैसे चौराहे पर खड़ा दारोगा, जब शाम में डंडा लिए अकड़ कर अपने पर आ जाता है तो फिर उसकी मर्जी ही कानून का शक्ल अख्तियार कर लेती है. सारा आईपीसी और सीआरपीसी उनकी जेब में होता है, उतना ही जितना इन बड़े-बड़े मीडिया के दारोगाओं के हाथ में किसी न्यूज़ को घटाने और बढ़ाने का अधिकार होता है.
नियम कोई नहीं है, क़ानून कोई नहीं. स्वाभाविक है मनमर्जी ही चलेगी. पर क्या कहीं ना कहीं एक आतंरिक जिम्मेदारी का भाव नहीं होना चाहिए? ख़ास कर उस समुदाय के लिए, जो अपने आप को चौथा स्तम्भ और लोकतंत्र का प्रहरी होने का दम भरता है. क्या इस तरफ के डबल मर्डर, जिसका कोई ख़ास सामजिक सारोकार नहीं है, पर जो सोची-समझी साजिश के तहत सनसनीखेज बना दिया गया दिखता है, को देश का प्रमुखतम समाचार बताना इस देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी की पूर्ण तिलांजलि नहीं है. मैं अपने पुलिस के अनुभव से शुरू से यह मानता था कि यह हत्या तलवार दंपत्ति ने ही की या कराई है और व्यक्तिगत तौर पर यह मानता रहूँगा, पर उससे कई गुना ज्यादा यह मानता हूँ कि इस घटना का यह हाइप पूरी तरह से गलत है. कई मायने में घृणित भी. बेचने की होड़ में हम कुछ भी बेच रहे हैं, कुछ ज्यादा ही. ऊपर से वे लोग भी इसमें शामिल हो जा रहे हैं जो दूसरों को दिन रात नसीहतें देने से नहीं अघाते.
यह कौन सा महान और आवश्यक निर्णय था जिससे देश हिल जाता. तलवार दंपत्ति क्या हैं? कोई बड़े नेता, समाज सेवक, राष्ट्र नायक? या ऐसे व्यक्ति जिनका देश के प्रति कोई गज़ब का योगदान रहा हो. संभव है उन्होंने हत्या की हो, संभव है नहीं भी की हो. संभव है निचली अदालत उन्हें सजा दे, ऊपर माफ़ हो जाए या यह भी हो सकता है कि यहीं छूट जाएँ. यह तो क़ानून की संभावनाएं है, दिन भर दिखती रहती हैं.
पर आश्चर्य, अचम्भा और अचरज तब होता है कि अपने आप को बड़े, ख़ास और विद्वान् मानने वाले टीवी के चुनिन्दा पत्रकार भी गला फाड़-फाड़ कर इस पर अपना आख्यान और अपने विचार ऐसे प्रकट करने लगते हैं जैसे किसी बहुत बड़े सत्य का निरूपण कर रहे हो. उस समय मुझे ये लोग इतने दयनीय, असहाय और बेचारे लग रहे होते हैं कि मन करता है पीछे से जा कर इनको कह दूँ कि भाई, हौसला रखो, पेट पालने के लिए मदारी को हर तरह के करतब दिखाने होते हैं, इसमें हिम्मत खोने वाली कोई बात नहीं है. समय आएगा जब तुम वास्तव में जरूरी बातें भी जनता के सामने लाओगे और उनके प्रति सच्ची सेवा कर पाओगे. लेकिन शायद ऐसा होने में अभी समय लगे क्योंकि अभी तो जो गलाकाट बाजारू प्रतियोगिता दिख रही है, उसमें आरुषि और ऐसी ही समस्याएं हमारे देश के केंद्र में अपना स्थान बनाए खड़ी दिख रही हैं.
लेखक अमिताभ ठाकुर आईपीएस अधिकारी हैं. लखनऊ में पदस्थ हैं. इन दिनों आईआईएम, लखनऊ में अध्ययनरत हैं.

