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आलतू-फालतू और बेफालतू

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 11 : अब आया आनंद! इस आनंद के अतिरेक में शरद जी के लिए कुछ सुझाव। शरद जी, हम पर कटे जरूर हैं – पर कटी नहीं। यह भी सही है कि हम आलतू भी हैं, फालतू भी और बेफालतू भी। अब थोड़ी देर के लिए शरद जी हम इन शब्दों की लोहियावादी व्याख्या करें। जहां तक हमें पता है कि हमने लोहिया का नाम भी नहीं पढ़ा है। आपने तो जरूर पढ़ा होगा। न पढ़ा हो तो समझने के लिए किसका नाम सुझाऊं जिसे आप समझ सकें। अच्छी बात तो यही है कि न हमने पढ़ा, न आपने पढ़ा – फिर यह शब्द आलतू – फालतू – बेफालतू किसने गढ़ा। अब यह समझना आवश्यक है कि ऐसा शब्द कौन गढ़ सकता है। इस कौन की तलाश का काम चुनाव के समय हम अगर खबरिया चैनलों पर छोड़  दें, 420 एसएमएस के बल पर सरकार बना सकते हैं। चूंकि इनका काम बकर – बकर – कचर – कचर करना होता है, इसलिए मान कर चला जा सकता है कि इन शब्दों को खबरिया चैनलों ने गढ़ा होगा। पर बेचारे न जाने कब से अपनी बात कहना भूल गए हैं। नेता की बात को ही अपनी बात बना कर बोलते हैं।

जुगनू शारदेय

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 11 : अब आया आनंद! इस आनंद के अतिरेक में शरद जी के लिए कुछ सुझाव। शरद जी, हम पर कटे जरूर हैं – पर कटी नहीं। यह भी सही है कि हम आलतू भी हैं, फालतू भी और बेफालतू भी। अब थोड़ी देर के लिए शरद जी हम इन शब्दों की लोहियावादी व्याख्या करें। जहां तक हमें पता है कि हमने लोहिया का नाम भी नहीं पढ़ा है। आपने तो जरूर पढ़ा होगा। न पढ़ा हो तो समझने के लिए किसका नाम सुझाऊं जिसे आप समझ सकें। अच्छी बात तो यही है कि न हमने पढ़ा, न आपने पढ़ा – फिर यह शब्द आलतू – फालतू – बेफालतू किसने गढ़ा। अब यह समझना आवश्यक है कि ऐसा शब्द कौन गढ़ सकता है। इस कौन की तलाश का काम चुनाव के समय हम अगर खबरिया चैनलों पर छोड़  दें, 420 एसएमएस के बल पर सरकार बना सकते हैं। चूंकि इनका काम बकर – बकर – कचर – कचर करना होता है, इसलिए मान कर चला जा सकता है कि इन शब्दों को खबरिया चैनलों ने गढ़ा होगा। पर बेचारे न जाने कब से अपनी बात कहना भूल गए हैं। नेता की बात को ही अपनी बात बना कर बोलते हैं।

आलतू – फालतू – बेफालतू बेचारा खबरिया चैनल नहीं बोल सकता। यह तो बात बनाना शुरु करेगा कि जरा सुनिए – ध्यान से सुनिए – चौंक पड़ेंगे सुनकर आप… कि यह बात शरद यादव ने कही …शरद यादव जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष हैं ..सुन लीजिए …इतनी देर में तो तीन जन सभा खत्म कर आप हेलीकॉप्टर में एक झपकी ले रहे होते। मगर सवाल जस का तस है कि किसने गढ़ा होगा यह शब्द : आलतू – फालतू – बेफालतू!

लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कभी समाजवादीनुमा लेखक ऐसे शब्द गढ़ा करते थे। अब यह प्रजाति समाप्त हो गई है। न भरोसा हो तो अपने फालतू नीतीश कुमार से ही पूछ लीजिए कि कैसे कैसे लेखक उन्होंने जमा कर रखें हैं। उन्हें तो नीतीशवाद के बारे में ही पता नहीं। फिर समाजवाद के बारे में कैसे जानेंगे। आप जानना चाहते हैं नीतीशवाद के बारे में तो आपको जरूर बता दिया जाएगा। लंबे -चौड़े -बड़े आंकड़े के साथ। नींद आ जाए तो कसूर न चुनाव आयोग का, न आचार संहिता का। बस वही गाने वाली बात कि न हमने सिगनल देखा, न तुमने सिगनल देखा – बस ऐक्सीडेंट हो गया। कुछ कुछ आप यूं समझ सकते हैं कि अवसरवाद की कड़ाही में प्रशासन का तेल डाल कर विकास की मूली को अफसरशाही के जीरा से छौंका जाता है तो वह नीतीशवाद होता है। स्वादिष्ट, मगर गरिष्ठ – पेट के लिए खतरा। यही कारण है कि आपके फालतू का पेट हमेशा खराब रहता है।

किंतु हमें पता तो लगाना ही होगा कि किसने गढ़ा शब्द आलतू – फालतू – बेफालतू। अगर यह शब्द न होता तो जबान क्यों फिसलती। पहला मुफ्त का सुझाव। इस शब्द को असंसदीय घोषित किया जाए। चुनाव आयोग से मांग की जाए कि चुनाव के दौरान इसका प्रयोग वर्जित है। क्या शब्द है आलतू – फालतू – बेफालतू! धरम पा जी ने भी अपनी जवानी में कभी नहीं बोला नहीं था यह शब्द। वह तो बस इतना बोलते थे, गांव वालों जिसने तुम्हारा विकास नहीं किया उस कुत्ते – कमीने का खून पी जाऊंगा। और आप बोल गए शरद जी आलतू – फालतू – बेफालतू!

परंतु जब बोल दिया तो बोल दिया। वीर बालक की तरह इसे स्वीकार करें। अभी याद आया सौजन्य बिहार की राजनीति के भेंड़ा भाई कि लोहियावादी जानते हैं कि इलजाम और सच्चाई के दो पाटों के बीच सच्चाई पीस जाती है। और शरद जी सच्चाई क्या है। यह तो बुनियादी तौर पर है आलतू – फालतू – बेफालतू !

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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