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संगीत-सिनेमा

आवाज की फिल्‍मी दुनिया और बीएन का जादू

प्रमोद पांडेय सिनेमा पर्दे पर यथार्थ का मंचन है। फिल्मी पर्दे पर उभरती आवाजें हमारी अपनी ही आवाजें होती हैं। हमारे संवाद कला बनकर कलाकारों की भाषा बन जाते हैं। फिल्में हमारी बातों को औरों तक पहुँचाती हैं, औरों की बातों को हम तक पहुँचाती हैं। बातों ही बातों में हम दुनियाभर की बातें जान जाते हैं। दुनियाभर की बातें और आवाजें हमारे अंदर संवेदना का संचार करती हैं। सिनेमा की आवाजें यथार्थ का भ्रम कराती हैं। कभी-कभी सिनेमाई ध्वनियां सच से भी अधिक प्रबल हो जाती हैं। इस प्रबलता में हम बिंध से जाते हैं। ढिशूम-ढिशूम की आवाज सुन दर्शक उतावले हो जाते हैं। अपनी-अपनी सीटों से खड़े हो जाते हैं। शहनाई की आवाज आँखों में आँसू दे जाती है। दहशत भरी डरावनी आवाजें भूतों का अहसास दिला हमें कंपा जाती हैं। फिल्मों में हम सब सुन सकते हैं- सांय-सांय करती तेज हवा, नदी का कलरव, चिडिय़ों की चह-चह और पायल की मधुर मद्धिम छमकती ध्वनि। सच! फिल्मी कलाकारों और दृश्यों की सुरीली, रोबिली, सुंदर, छमकती, खनकती, गीत गातीं, रोती और हँसती ध्वनियां हमें यथार्थ और यथार्थ से भी परे ले जाती हैं। साउंड रिकॉर्डिस्ट ऐसा ही जादू करते हैं। उनके करिश्मे से हम बूटों की खटखट, थप्पड़ की झन्नाहट और कान-बालियों के घुंघरुओं की मद्धिम खनक तक सुन सकते हैं.

प्रमोद पांडेय

प्रमोद पांडेय सिनेमा पर्दे पर यथार्थ का मंचन है। फिल्मी पर्दे पर उभरती आवाजें हमारी अपनी ही आवाजें होती हैं। हमारे संवाद कला बनकर कलाकारों की भाषा बन जाते हैं। फिल्में हमारी बातों को औरों तक पहुँचाती हैं, औरों की बातों को हम तक पहुँचाती हैं। बातों ही बातों में हम दुनियाभर की बातें जान जाते हैं। दुनियाभर की बातें और आवाजें हमारे अंदर संवेदना का संचार करती हैं। सिनेमा की आवाजें यथार्थ का भ्रम कराती हैं। कभी-कभी सिनेमाई ध्वनियां सच से भी अधिक प्रबल हो जाती हैं। इस प्रबलता में हम बिंध से जाते हैं। ढिशूम-ढिशूम की आवाज सुन दर्शक उतावले हो जाते हैं। अपनी-अपनी सीटों से खड़े हो जाते हैं। शहनाई की आवाज आँखों में आँसू दे जाती है। दहशत भरी डरावनी आवाजें भूतों का अहसास दिला हमें कंपा जाती हैं। फिल्मों में हम सब सुन सकते हैं- सांय-सांय करती तेज हवा, नदी का कलरव, चिडिय़ों की चह-चह और पायल की मधुर मद्धिम छमकती ध्वनि। सच! फिल्मी कलाकारों और दृश्यों की सुरीली, रोबिली, सुंदर, छमकती, खनकती, गीत गातीं, रोती और हँसती ध्वनियां हमें यथार्थ और यथार्थ से भी परे ले जाती हैं। साउंड रिकॉर्डिस्ट ऐसा ही जादू करते हैं। उनके करिश्मे से हम बूटों की खटखट, थप्पड़ की झन्नाहट और कान-बालियों के घुंघरुओं की मद्धिम खनक तक सुन सकते हैं.

बद्रीनाथ शर्मा ऐसे ही साउंड रिकॉर्डिस्ट थे। जिन्होंने जाने-माने फिल्म निर्माताओं के साथ काम किया। बी. एन. शर्मा का मूल जन्‍म स्थान भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित अटारी था। वहाँ से वे दिल्ली आये, उनके पिता एक डॉक्टर थे। उनके पिता चाहते थे कि बद्रीनाथ शर्मा आगे पढ़ाई करें और कोई सम्मानजनक काम करें। लेकिन ऐक्ट्रेस लीला चिटनिस के सम्मोहन में बिंधे जवां बद्रीनाथ को कुछ और ही मंजूर था। वे फिल्मों में अपना भाग्य आजमाने बंबई चले गये। बंबई में बद्रीनाथ शर्मा को पहला काम रिकॉर्डिंग के सामानों को साफ करने का मिला। इस काम से इंजीनियरिंग का एक कोर्स किया और कोर्स की समाप्ति तक एक रिकॉर्डिस्ट के साथ सहायक का काम भी करने लगे। 1940 के मध्य तक बद्रीनाथ शर्मा एक स्वतंत्र साउंड रिकॉर्डिस्ट की तरह काम करने लगे।

अपने करियर में आगे बढ़ते हुये बी.एन.शर्मा ने साउंड मिक्सिंग और रिकॉर्डिंग की दुनिया में एक अलग पहचान बना ली। सुंदर साउंड ट्यूनिंग की उनकी क्षमता के कारण ही उन्होंने के. आसिफ, बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी, गुलजार और ओ.पी. रलहान जैसे दिग्गज फिल्म-निर्माताओं के साथ काम किया। उन्होंने दादा कोंडके और सी. रामचंद्र जैसे निर्माताओं की क्षेत्रीय फिल्मों में भी काम किया। बी.एन. शर्मा की कला में पगी फिल्में अविस्मरणीय हैं। ‘मुगले-आजम’, ‘मधुमति’, ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ जैसी फिल्मों की आवाजें आज भी हमारे दिलों पर राज करती हैं। इन फिल्मों से बी.एन. शर्मा की बहुआयामी प्रतिभा को भी आंका जा सकता है। हाँ, राजसी शानो-शौकत की धमक और साधारण भारतीय परिवेश की शांत आवाज सब इनकी कला में समाहित है।

बद्रीनाथ शर्मा साउंड रिकॉर्डिंग का काम 1991 में अपनी मृत्यु तक करते रहे। सच्चे कलाकार ऐसे ही होते हैं। ऐसे ही उनकी कला और उनका जीवन गुत्थम-गुत्था हो चलते रहते हैं। तभी तो सुन सकते हैं हम बद्रीनाथ शर्मा के दिलो-दिमाग, उनके जीवन, उनकी कल्पना और प्रकृति की आवाजें उनकी फिल्मों में। हर वह आवाज जो उन्होंने सुनी होगी उसे जादू के रेशमी धागों में पिरोकर अपनी फिल्मों में टाँक दिया और हम हो गये उनकी फिल्मों के कायल। उनके कायल। बार-बार उनकी कला में डूबी फिल्में देखने को मजबूर!! उनके गानें गाने को बेबस। भला देशभक्ति के रस में पगा उनका गाना ‘ऐ मेरे वतन के लोगों…’ किसने नहीं सुना होगा, साथ-साथ नहीं गाया होगा? रोया नहीं होगा?

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

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