सन ’90 में ‘जागरण’ शुरू हुआ दिल्ली से. अगले ही साल चुनाव आ गया. मैं पंजाब, हरियाणा, हिमाचल का ब्यूरो देखता था. पिछले, ’87 के चुनाव में 90 में से 85 सीटें जीती थी ताऊ देवीलाल की पार्टी. वो कितना भी बुरा प्रदर्शन करती तो भी कितनी सीटें कम हो जाती उसकी? मगर ‘जागरण’ ने एक बड़ी भूमिका निभाई. सरकार बन गई और भजन लाल मुख्यमंत्री. मेरी उनसे पहली मुलाक़ात इस के भी कोई दो हफ्ते बाद हुई. दरअसल उन्होंने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई थी अपने आफिस में. कह गए कि छह महीने में एसवाईएल बनवा दूंगा. सब चले गए. मैं पीछे था. मैंने पूछ लिया कि मीडिया तो आज से कैलेण्डर पे टिक करना शुरू कर देगा. न बनवा पाए नहर तो बख्शेगा नहीं. उन्हें लगा बात में दम है. मेरा नाम पूछा. बताया तो गले लगा लिया. बोले, आपके नाम से खबरें पढ़ता था. बहुत मदद की आपने. अगले दिन फिर प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. कहा,छह महीने में नहर बनवा देने की बात पे कायम हूँ. मगर ये नहीं कहा कि वो छह महीने शुरू कब होंगे.
उन दिनों मंडल आन्दोलन ताज़ा ताज़ा हो के हटा था. किसी ने उनको सुझाव दिया, हरियाणा में जाट-गैरजाट का कार्ड खेल लो. सात पुश्तें राज करेंगी. मुझसे चर्चा की. बोले, राज की परवाह नहीं. पर, ये काम नहीं करूंगा. वो टिक नहीं सकता हरियाणा में जो छत्तीस बिरादरियों को साथ ले के न चले. एक दिन कृष्णमोहन जी मुझे ढूँढ़ते फिरे. मोबाइल तब थे नहीं. शाम को अपने आफिस पहुंचा तो पता चला. वे तब डीपीआर थे. हम मिले तो वे बोले कि चौधरी साहब मुझसे उनका मीडिया का काम दिखवाना चाहते हैं. मैं तब अपने सम्पादक कमलेश्वर जी से भावनात्मक रूप से बहुत जुड़ा था. मैंने उनसे बात की. उन ने समझाया कि हम पत्रकारिता में क्यों हैं. मैंने बड़ी विनम्रता से मना कर दिया. लेकिन भजन लाल जी का स्नेह हमेशा रहा. उनका मीडिया सलाहकार हुए बिना मैं उनके लिए जो कुछ बन सका करता रहा.
जल्दी ही मेरा तबादला दिल्ली हो गया. उन ने हरियाणा भवन में रहने का इंतजाम कर दिया. जब भी दिल्ली आते, बुलाते, मिलते. एक बार बुलवाया. बोले, बाबा (पंजाब के तब मुख्यमंत्री बेअंत सिंह) इराडी कमीशन की फाइल खुलवाने के चक्कर में है. (विद्याचरण) शुक्ल जी को फोन लगाता हूँ तो बात नहीं करते. कुछ करना पड़ेगा. वरना बाबा बैंड बजा देगा. अपनी निराली स्टाइल में, ऊंचे स्वर में पूछा, कुछ कर सकते हो? मैंने कहा, सुबह तक का टाइम दो. मेरे दिमाग में दो लोग थे. एक सीता राम केसरी जिनके यहाँ बिला नागा मैं रोज़ शाम को जाता था. और दूसरा मध्य प्रदेश का मेरे ब्यूरो में एक रिपोर्टर जो शुक्ल जी के साथ काफी बेतकल्लुफ था. केसरी जी थोड़ी न-नुकर के बाद मान गए. उन ने शुक्ल जी को मना लिया. इराडी कमीशन की रिपोर्ट आज 20 साल बाद भी जस की तस है. चौधरी साहब ने सीएम के डिस्क्रीशनरी कोटे से मुझे एक प्लाट दिया. वो मैं उनके बहुत समझाने के बावजूद वापिस कर आया. इसके बाद उनका स्नेह और भरोसा और बढ़ गया. उनके साथ बिताये पलों की बहुत सी यादें हैं. उनका ज़िक्र भी करेंगे. फिलहाल तो उनको, नमन!
लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.

