: खेलमंत्री ने नहीं पहचाना द्रोणाचार्य सतपाल को : आधी रात को सत्ता का हस्तांतरण हुआ था। छाया था घनघोर अंधकार और छाए थे सावन-भादो के बादल। अर्धरात्रि में मिली आजादी के चलते जो प्रभुसत्ता हमने हासिल की थी, वो आज तक लोक-सत्ता नहीं बन पाई। वह सिर्फ राज-सत्ता बनकर रह गई। भौगोलिक दृष्टि से महाभारत युगीन इंद्रप्रस्थ जहां था, वर्तमान भारत की राजधानी भी वहीं है। माटी का असर दस हजार साल में बदलता है। स्वाभाविक है, इंद्रप्रस्थीय असर कभी न कभी फूटकर बाहर आ ही जाता है। कोई धृतराष्ट्र जैसा आचरण करता दिखाई पड़ता है, तो कोई दुर्योधन जैसा। महाभारत में राजा के नमक (नौकरी) के नाम पर गुरु द्रोणाचार्य ने पैसे खाए, तो पूरी जिंदगी जलालत झेलनी पड़ी और अंत में मिली ज़लालत की मौत।
इतिहास खुद को दोहराता है। भारत सरकार के मंत्री ने वर्तमान के एक खेल गुरु द्रोणाचार्य अलंकरण प्राप्त शख्स को पल भर में चित कर दिया। और जमाना मूक बनकर देखता रहा। बताने की जरूरत नहीं कि विश्व कुश्ती में दुर्लभ स्वर्ण पदक जीतने का करिश्मा दिखाने वाले सुशील कुमार जो पिछले ओलम्पिक में मिली सफलता के पश्चात भारतीय कुश्ती के न केवल ध्वजवाहक बन चुके हैं, बल्कि वे भारतीय कुश्ती में एक तरह से ‘ब्रांड अम्बेस्डर’ की तरह हैं। यह भी बताने की जरूरत नहीं कि कुश्ती का यह संस्थापक देश गुरु-शिष्य परम्परा के आधार पर ही सदियों से आगे बढ़ता आया है। कुश्ती में पहलवानों की प्रतिभा को निखारने और तराशने का काम सिर्फ और सिर्फ उसका उस्ताद या गुरु करता है।
जब देश की राजसत्ता का एक मंत्री उस गुरु को ही न पहचाने तो बात समझ में नहीं आती है। किसी अन्य मंत्री ने भी अगर यह काम किया होता, तो निंदनीय था, लेकिन जो काम स्वयं भारतीय खेलों के अधिकृत शुभचिंतक यानी केन्द्रीय खेल मंत्री ने किया है, उससे खेल प्रेमियों में निराशा का माहौल है। कई मौकों पर बतौर खेल मंत्री गिल ने अपनी सक्रिय ओजस्विता का परिचय दिया है, उनसे खेल प्रेमियों को उम्मीदें हैं। जब गिल ने खेल संघों के खिलाफ आवाज बुलंद की, तो उनका यह कदम खुशबूदार ताजा बयार की तरह लगा, लेकिन गिल साहब शायद भूल गए कि भारतीय खेलों के संघ में जिन शख्सियतों की वे आमद चाहते हैं, वो सतपाल जैसे द्रोणाचार्य ही तो हैं।
गिल साहब ने भारत सरकार के पुराने विधेयक को पेश किया और उसे लागू करने के लिए वे चेष्टारत हैं, उसमें कल की घटना एक बहुत बड़ा अवरोध बनकर खड़ी हो गई है और फिजाओं में एक सवाल तिर रहा है कि जब खेल मंत्री ही किसी खेल के द्रोणाचार्य गुरु को नहीं पहचानता, तो आम खिलाड़ी के साथ उसका सुलूक कैसा होगा? सतपाल कोई मामूली हस्ती नहीं हैं, बीते वर्षों में एशियाई पटल पर चंदगी राम, करतार और सतपाल ये तीन महाबली ही ऐसे हैं, जिन्होंने हैवीवेट कुश्ती में देश का नाम स्वर्ण पदक के साथ रोशन किया है। ज्यादा दिन की
बात नहीं है, 1982 के एशियाड में सतपाल ने स्वर्णपदक जीतकर भारत का मान बढ़ाया था। हमें खेल मंत्री के इरादों पर कोई संदेह नहीं। उन्होंने रटा-रटाया अंदाजा दिखाया कि भाई, जो कोच मास्को गया था, उसको बुलाओ, उसके साथ फोटो खिंचवाऊंगा। यह कोई गलत बात नहीं है, लेकिन फोटो खिंचवाने की इस रस्म अदायगी में अगर उस सम्मानित गुरु को धकिया दिया जाता है, जिसकी वजह से सारा मजमा है, तो क्या यह नाकाबिले बर्दाश्त नहीं होगा? शिष्य को सम्मानित करते हुए गुरु को अपमानित करना कदापि शिष्टाचार नहीं है। खेल प्रेमियों की पीड़ा यही तो है।
कुछ ही दिन पहले बैंडमिंटन सनसनी सायना नेहवाल को सम्मानित करने के दौरान भी खेल मंत्री ने वहां मौजूद गुरु-उस्ताद ऑल इंग्लैंड चैंपियन पुलेला गोपीचंद के बारे में पूछा था कि ये कौन हैं? और उसके बाद गुरु सतपाल को धकियाना वाकई शर्मनाक है। सतपाल पुराने हो गए, लेकिन गोपीचंद तो अभी पुराने नहीं हुए हैं। गुरु सतपाल को धकियाया जाना भारतीय खेलों की दशा और दिशा को भी दर्शाता है और बताता है कि खेल हो या समाज का कोई अन्य अंग, अधिकारी और राजनेता, इन्हीं दोनों के हाथों में लड्डू है, खिलाड़ी हो या खिलाड़ियों का उस्ताद, दोनों ही पहले भी हाशिये पर थे, आज भी वहीं हैं। देश के खिलाड़ी गिल साहब की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं, वर्तमान सरकार के पास पर्याप्त समय है।
खेल संघों के खिलाफ खेल मंत्री ने जो जंग छेड़ी है, उसकी सुखद परिणति सतपाल, अशोक ध्यानचंद, उड़न सिख मिल्खा सिंह, ग्रैंड मास्टर विश्वनाथन आनंद, बैंडमिंटन गुरु प्रकाश पादुकोण, सुनील गावस्कर, माइकल फरेरा, रामनाथन कृष्णन जैसों को खेल संघों की जिम्मेदारी सौंपने में होनी चाहिए। अगर ऐसे गुरुओं के हाथों में खेल संघों की कमान सौंपी जाती है, तो देश में खेल संस्कृति का सूर्योदय होगा। लेकिन ऐसे सूर्योदय के पहले आपको इन गुरुओं के चेहरों को अच्छी तरह से पहचानना भी होगा। अंत में मैं एक सवाल पूछना चाहूंगा। प्रभुसत्ता की समाप्ति के कुछ लक्षण महान कूटनीतिज्ञ चाणक्य ने लिखे थे। उसमें पहला था, यदि राजा दंभी या अभिमानी हो गया हो, तो सत्ता को खतरा है, राजा अगर मूर्ख है, तो देश को खतरा है और यदि राजा अविवेकी है, तो मानवता को खतरा है। फिलहाल खतरा किस तरह का है, इसका अंतिम फैसला कृपालु पाठकों आपको करना है।
लेखक पदमपति शर्मा देश के जाने-माने खेल पत्रकार हैं.

