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कथनी और करनी में फर्क मिटाना होगा नेताजी को

बी पी गौतम: मुलायम सिंह यादव के जन्‍म दिन पर विशेष : समाजवादी विचारधारा की बात की जाती है तो वर्तमान में सबसे पहला नाम सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के रूप में ही उभर कर आता है। समर्थक उन्हें समाजवादी विचारधारा का एकमात्र नेता मानते हैं, तो मुलायम सिंह यादव भी स्वयं को कट्टर समाजवादी कहते हैं, पर हैरत की ही बात है कि मुलायम सिंह यादव स्वयं की विचारधारा व कार्यप्रणाली का संचार पूरी तरह पार्टी व कार्यकर्ताओं में नहीं कर पा रहे हैं, जिससे वर्तमान दौर के सर्वश्रेष्ठ समाजवादी नेता होने के बावजूद भी समर्थकों के अलावा कोई और उन्हें समाजवादी विचारधारा का नेता मानने को तैयार नहीं दिख रहा है। राजनीतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव के नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं, जिन्हें राजनीति के इतिहास में न चाहते हुए भी दर्ज करना ही पड़ेगा, पर कई ऐसे दाग भी हैं, जो उनके समाजवादी होने पर हमेशा सवाल उठाते रहेंगे। मुलायम सिंह यादव को उनके चाहने वाले नेताजी नाम से संबोधित करते हैं एवं जमीनी नेता होने के कारण उन्हें धरती पुत्र भी कहा जाता है। वास्तव में वह स्वयं में बेहद अच्छे इंसान भी हैं। पत्रकारों से तो वह और भी अच्छी तरह से पेश आते हैं। किसी भी सवाल पर वह निरुत्तर नहीं होते। जवाब न भी दें, तो भी वह पत्रकार को अपनी बातों से संतुष्ट कर ही देते हैं। उनकी कोई पत्रकार वार्ता ऐसी नहीं होती, जिसमें वह किसी पत्रकार को सवाल पर झिडक़ते न हों, पर उनके झिडक़ने का भी अंदाज इतना सरल व मजाकिया होता है कि वह पत्रकार उनका मुरीद हो जाता है।

बी पी गौतम

बी पी गौतम: मुलायम सिंह यादव के जन्‍म दिन पर विशेष : समाजवादी विचारधारा की बात की जाती है तो वर्तमान में सबसे पहला नाम सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के रूप में ही उभर कर आता है। समर्थक उन्हें समाजवादी विचारधारा का एकमात्र नेता मानते हैं, तो मुलायम सिंह यादव भी स्वयं को कट्टर समाजवादी कहते हैं, पर हैरत की ही बात है कि मुलायम सिंह यादव स्वयं की विचारधारा व कार्यप्रणाली का संचार पूरी तरह पार्टी व कार्यकर्ताओं में नहीं कर पा रहे हैं, जिससे वर्तमान दौर के सर्वश्रेष्ठ समाजवादी नेता होने के बावजूद भी समर्थकों के अलावा कोई और उन्हें समाजवादी विचारधारा का नेता मानने को तैयार नहीं दिख रहा है। राजनीतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव के नाम कई उपलब्धियां दर्ज हैं, जिन्हें राजनीति के इतिहास में न चाहते हुए भी दर्ज करना ही पड़ेगा, पर कई ऐसे दाग भी हैं, जो उनके समाजवादी होने पर हमेशा सवाल उठाते रहेंगे। मुलायम सिंह यादव को उनके चाहने वाले नेताजी नाम से संबोधित करते हैं एवं जमीनी नेता होने के कारण उन्हें धरती पुत्र भी कहा जाता है। वास्तव में वह स्वयं में बेहद अच्छे इंसान भी हैं। पत्रकारों से तो वह और भी अच्छी तरह से पेश आते हैं। किसी भी सवाल पर वह निरुत्तर नहीं होते। जवाब न भी दें, तो भी वह पत्रकार को अपनी बातों से संतुष्ट कर ही देते हैं। उनकी कोई पत्रकार वार्ता ऐसी नहीं होती, जिसमें वह किसी पत्रकार को सवाल पर झिडक़ते न हों, पर उनके झिडक़ने का भी अंदाज इतना सरल व मजाकिया होता है कि वह पत्रकार उनका मुरीद हो जाता है।

सत्ता में होने पर वह समाज के हर वर्ग के लिए बेहतर काम करते दिखाई देते हैं, फिर भी समाज के सभी वर्गों के वह चहेते नहीं हैं, मतलब व्यक्तिगत तौर पर वह सभी के चहेते हैं, लेकिन समाजवादी नेता के रूप में उनकी व्यापक तौर पर आलोचना की जाती है, क्योंकि वह अपने व्यक्तित्व और विचारधारा को पार्टी और कार्यकर्ताओं में नहीं ढाल पा रहे हैं। इसलिए उनसे जुड़ीं पुरानी घटनायें हमेशा ताजा रहती हैं। अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद उन्होंने कहा कि घटना भाजपा की सोची-समझी साजिश का नतीजा है और कांग्रेस ने इस साजिश में भाजपा का पूरा साथ दिया है। भाजपा और कांग्रेस के खिलाफ आग उगल कर ही वह उत्तर प्रदेश और अब देश की अह्म राजनीतिक हस्ती बने थे। बाबरी विध्वंस के समय मुलायम सिंह यादव की भूमिका से मुसलमान उनके मुरीद हो गये, लेकिन भाजपा को सांप्रदायिक पार्टी बताने वाले मुलायम सिंह यादव भाजपा का भी सहारा ले चुके हैं। इसी तरह कांग्रेस को कोसने वाले मुलायम सिंह यादव कांग्रेस की गोद में भी बैठ चुके हैं।

कारण वह चाहे जो बतायें, पर इन प्रश्रों का सटीक उत्तर वह कभी नहीं दे पायेंगे। सीधी सी बात है कि उन्होंने निजी स्वार्थ को ऊपर रखते हुए भाजपा और कांग्रेस से भी दोस्ती करने में कोई गुरेज नहीं किया। इससे भी बड़ी हैरत की बात यह है कि सत्ता के लिए उन्होंने बाबरी विध्वंस के सबसे प्रमुख व्यक्ति कल्याण सिंह से भी दोस्ती कर ली। यह बात अलग है कि राजनीतिक लाभ की जगह हानि होने पर उन्होंने कल्याण सिंह से किनारा भी कर लिया। उनकी दलील थी कि भाजपा को मिटाने के लिए उन्होंने कल्याण सिंह का साथ लिया। इस दलील से कल्याण सिंह की छवि नहीं सुधर सकती, क्योंकि वह बाबरी विध्वंस की घटना के सेनापति थे। इतना ही नहीं उनके शासनकाल में उत्तराखंड के आंदोलनकारियों पर भी कहर बरपाया गया। पुलिस के तांडव के शिकार हुए परिवार उम्र भर वह दिन नहीं भूल सकते, जब कि वह जिन डा. राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह की विचारधारा पर चलने का दावा करते हैं, वह दोनों नेता छोटे राज्यों के पक्षधर थे। वह विकास के लिए छोटे राज्यों को जरुरी मानते थे, पर मुलायम सिंह यादव छोटे राज्यों के धुर-विरोधी हैं। इसके अलावा मायावती भले ही उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंदी हैं, पर वह एक महिला भी हैं।

मायावती के साथ गेस्ट हाउस में जो घटना घटित हुई, वह सिर्फ राजनीतिक प्रतिद्वंदी पर नहीं, बल्कि एक महिला की लाज पर भी हमला था। मायावती की राजनीति या विचारधारा सही है या गलत। यह प्रश्र अलग है। यहां सवाल एक महिला की लाज और अस्मिता का है, लेकिन इस घटना पर मुलायम सिंह यादव ने आज तक अफसोस भी नहीं जताया है। उन्होंने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर भी हल्ला बोला था, जिसको लेकर उन्होंने आज तक दु:ख नहीं जताया है। इतने गंभीर दाग पहले से ही उनके दामन पर लगे हुए हैं। इन सब दागों को धोने का प्रयास करने की बजाय, उन्होंने अपने दामन पर पिछले दिनों एक और दाग लगा लिया। महिला आरक्षण का पुरजोर विरोध करने के साथ यह कह दिया कि आरक्षण के चलते उद्योगपतियों और पूंजीपतियों की ऐसी लड़कियां सदन में आयेंगी, जिन्हें देख कर युवा सीटी बजायेंगे।

बात सही है, पर मुलायम सिंह यादव यह भूल जाते हैं कि उद्योगपति या पूंजीपति सिर्फ सवर्ण ही नहीं हैं। अब धनपति पिछड़े और अनुसूचित तबके के लोग भी हैं। उनकी महिलायें या लड़कियां भी राजनीति में हैं एवं आरक्षण के बाद और भी आयेंगी। इसके अलावा अगर उन्हें धनपतियों और पूंजीपतियों से नफरत थी तो सभी पिछड़ों, सभी अनुसूचितों और सभी अल्पसंख्यकों की जगह गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले पिछड़ों, अनुसूचितों और अल्पसंख्यकों को ही आरक्षण मांगना चाहिए। वह ऐसा नहीं कर सकते। ऐसा करने से अपने विधायकों या सांसदों की पत्नियों या उनके परिवार की अन्य महिलाओं को भी टिकट नहीं दे पायेंगे। अपने परिवार की महिलाओं को भी आरक्षित क्षेत्र से सदन नहीं पहुंचा पायेंगे, क्योंकि यह सब बीपीएल श्रेणी में आते ही नहीं हैं। इससे साफ जाहिर हो रहा है कि जातियों के नाम पर वह सिर्फ राजनीति ही कर रहे हैं। उन्हें भी पिछड़ी या गरीब तबके की आम महिलाओं की कोई चिंता नहीं है। इसके अलावा उनके इस बयान से उनकी स्वयं की छवि पर भी प्रश्र चिन्ह लग गया है। लोग खास कर विरोधी चर्चा करने लगे हैं कि उनकी पार्टी में अब तक जो महिलायें पदाधिकारी, सांसद या विधायक हैं, वह सिर्फ सीटी बजाने के लिए ही रखी गयी हैं, अर्थात मनोरंजन का साधन भर हैं। कम से कम उनकी सोच से तो ऐसा ही उजागर होता दिख रहा है।
मुलायम सिंह यादव निजी जीवन में जितने सहज व सरल हैं, उतने सहज व सरल राजनीतिक जीवन में नहीं बने रहना चाहते, तभी आलोचकों के निशाने पर रहते हैं, इसीलिए कथनी व करनी में फर्क हो जाता है और इसीलिए कार्यकर्ता भी समाज सुधार की जगह सत्ता के लिए राजनीति करने लगते हैं, जबकि समाजवादियों का उद्देश्य सिर्फ सत्ता पाना नहीं होना चाहिए।

डा.राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह का सानिध्य पा चुके और उनकी विचारधारा को आगे बढ़ाने का दंभ भरने वाले मुलायम सिंह यादव को अपनी नीतियों और क्रिया-कलापों को लेकर एक बार मंथन करना चाहिए। स्वस्थ मन से विचार करने पर उन्हें स्वत: ही अहसास हो जायेगा कि वह समाजवादी विचारधारा से कहीं न कहीं वह भटक गये हैं या अपनी विचारधारा को कर्म में परिवर्तित नहीं कर पा रहे हैं, तभी उनकी स्थिति हास्यापद हो जाती है। अगर वह ऐसा ही करते रहे तो एक दिन उनका समाजवादी चोला भी पूरी तरह उतर सकता है। ऐसा हुआ तो उनकी स्वयं की छवि धूमिल होने के साथ प्रदेश व देश की राजनीति के लिए भी सही नहीं होगा। वे भूल गये हैं या फिर उन्होंने डा. राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह के विचारों को जीवन में ही नहीं उतारा है। अगर उतारा होता तो आज ऐसी स्थिति नहीं होती, क्योंकि वह जिन-जिन बिंदुओं पर विरोध जता रहे हैं या जता चुके हैं, उस सबके वह लोग पक्षधर थे। इसलिए मुलायम सिंह यादव को इस जन्म दिन पर यही निर्णय लेना चाहिए कि अपना व्यक्तित्व व समाजवादी विचारधारा स्वयं के कर्म में उतारने के साथ पार्टी व कार्यकर्ताओं में भी उतारेंगे, ऐसा हो गया तो समाजवादी पार्टी सत्ता में आये या न आये, पर वह समाजवादी नेता के तौर पर और अधिक मजबूत होंगे एवं इस देश में हमेशा याद किये जायेंगे।

लेखक बी पी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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