गंगा के नाम पर धंधा चलाने वालो का क्या कहना। गंगा के नाम पर एक भी मौका नहीं चूकते खाने कमाने का। काशी में गंगा का क्या महत्व है इस पर चर्चा करना उनको खूब भाता है जो गंगा के नाम पर अपनी दुकानदारी चला रहे है। ऐसे लोगों और संस्थाओं की कमी नहीं है जो दिन के उजाले में मीडिया के कैमरों के सामने मां गंगा का दुग्धाभिषेक करते है और दूसरे दिन अलसुबह अखबारों में अपनी तस्वीरें देख कर खुश होते हैं। क्या गंगा और क्या गंगा के घाट, यहां तो सबकुछ बेचा जा रहा है। अगर गंगा काशी में प्रदूषित है और उसका जल आचमन योग्य नहीं रह गया है तो गंगा किनारे के ऐतिहासिक घाट भी अतिक्रमण के चपेट में है। टिहरी में कैद मां गंगा के अविरल धारा को छोड़ने के साल भर यहां खूब नाटक होता रहता है। लेकिन शायद ही कभी कोई प्रयास स्थानीय स्तर पर गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने के लिए होता है। गंगा सफाई का हर अभियान बिना मीडिया की भीड़ को एकत्र किए शुरू ही नहीं होता इसीलिए इधर कैमरे हटते हैं, उधर सफाई अभियान चलाने वाले दूर-दूर तक नजर नहीं आते।
अभी देव दीपावली का पर्व घाटों पर मनाया गया। वीवीआईपी से लेकर सात संमदर पार से आने वाले पयर्टक और स्थानीय लोगों का हुजूम घाटों पर नजर आया। रविवार की शाम से लेकर देर रात तक अगर घाटों पर देवलोक का नजारा दिखा तो सोमवार को नरक लोक के भी साक्षात दर्शन
हो ही गए। एक ही रात या यूं कह ले कुछ ही घंटो में देवलोक के पीछे का वो नरक लोक नजर आ गया जो यहां की असलियत है। सोमवार की सुबह घाटों पर घूमते हुए एक पुराना फिल्मी गीत याद आ गया, ‘कल चमन था आज एक सेहरा हुआ.’ उन लोगो को शायद यकीन नहीं होगा जिन्होंने देव दीपावली का सीधा प्रसारण अपने- अपने टेलीवजन सेटों पर बैठकर देखा होगा या उन लोगों को जो देव दिपावली देखने गंगा किनारे पहुंचे थे। पर कुछ ऐसा ही हुआ है मोक्ष दायिनी गंगा के साथ।
रविवार की शाम जिस देव दीपावली के मौके पर जिस मां गंगा की महाआरती कर दूध से उसका दुग्धाभिषेक किया गया। गंगा को निर्मल और स्वच्छ बनाने के लिए कसमें खाने से लेकर उसकी शान में कसीदें पढ़े गए। सोमवार को उसी मां गंगा का दामन गंदगी से सना हुआ नजर आया। घाटों से लेकर मां गंगा के पवित्र जल पर कूड़े और गन्दगी का अम्बार नजर आया। शायद ही कोई ऐसा घाट रहा हो जहां गंदगी न दिखी हो। रविवार की रात अगर घाटों पर देवलोक का नजारा देखने को मिला तो सोमवार को इन्हीं घाटों पर शाश्वत नरक के भी दर्शन हो ही गए। एक ही रात में रात या यूं कहे कि कुछ ही घंटों में सारा नजारा बदल गया। मां गंगा की जय जयकार कर उसे महिमामंडित करने वालों ने इस बात की जहमत नहीं उठायी की कम से कार्यक्रम के बात गंदगी का ढेर तो घाटों पर न लगे।
प्राचीन और ऐतिहासिक घाट जहां रोज मां गंगा की आरती का आयोजन किया जाता है। दोपहर तक उस पर कूड़े का ढेर लगा हुआ था। दूसरे घाटों का नजारा भी कुछ ऐसा ही थी। वहां भी गंदगी घाटों की शोभा बढ़ा रही थी। जहां-तहां जले हुए दीपक, प्लास्टिक के ग्लास, थैलियां बिखरी पड़ी थी। दूसरी तरफ सड़े हुए फूल-मालाओं का ढेर सहित गंदगी मां गंगा की छाती पर पसरी हुई नजर आई। देव दिपावली के मौके पर मां गंगा को प्रदूषण से मुक्त करने की सारी घोषनाएं घंटों में ही दम तोड़ बैठी। आयोजक हमेशा की तरह ये मानते हुए कि गंगा तो कभी प्रदूषित हो ही नहीं सकती धीरे से निकल लिए। अगर कुछ बचा था तो वह अर्धचन्द्रकार घाटों पर गंदगी का ग्रहण जो आहिस्ते- आहिस्ते यहां काशी में गंगा को निगलता जा रहा है। घाट का हाल देख चकाचक बनारसी की कविता की याद दिला गई-
किस्मत से उनके भयल पानी गंदा,
शुरू हउवै खाये कमाये क धंधा,
विदेशन से खूब आ रहल हउवै चंदा
पड़ी नाहीं कब्बों ई रोजगार मंदा
जे-जे जुड़ल हौ काटत हौ चांदी
कहां गंगा जल कहां गंदा पानी
प्रदूषण हौ ओम्मन भी उत्सव मनत हौ
गंगै में गंगा महोत्सव मनत हौ
अधिकारियन क चौतल्ला तनत हौ
मंत्रियन क राजा भितरै छनत हौ
ई बड़का प्रदूषण के रोका त जानी!
मंत्री से लेकर संतरी अधिकारी से लेकर धर्मगुरू सब लगे है मां गंगा को प्रदूषण से मुक्त करवाने के लिए, करोड़ो खर्च हो चुके है करोड़ों का बजट अभी भी बाकी है। लेकिन गंगा के हालात क्यों नही बदलते इसका जवाब किसी के पास नहीं है।
लेखक भास्कर गुहा नियोगी वाराणसी के निवासी हैं तथा हिन्दी दैनिक युनाइटेड भारत से जुड़े हुए हैं.

