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‘काबुलीवाला’ पर दिल कुर्बान

प्रमोद बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, ‘काबुलीवाला।’ तब काबुलीवाला किताब के पन्नों से निकलकर हमारे नन्हें मन पर छा गया था। अपनी नन्ही बच्ची को याद करता काबुलीवाला। उसकी धुंधली छवि जो हमने मन ही मन रची थी फिल्म ‘काबुलीवाला’ को देखकर साकार हो उठी। हाँ ऐसा ही रहा होगा दूर देश से आया वह आदमी! बलराज साहनी ऐसे ही अभिनेता थे, हर तरह के रोल के सांचे में फिट बैठने वाले। साम्यवादी विचारधारा के पक्के समर्थक, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को कई सशक्त रोल देकर गरिमा प्रदान की। बलराज साहनी सही अर्थों में जनमानस के अभिनेता थे। एक साधारण भारतीय और आम आदमी उनके दिल में बैठा था जो अभिनेता बनकर उनकी फिल्मों में उतर जाता। बलराज साहनी हिंदी सिनेमा के गरीब और आम आदमी थे। रिक्शा चालक थे, मजदूर थे। ‘दो बीघा जमीन’ में काम करने वाले शंभु महतो थे। बलराज साहनी एक लेखक थे, पत्रकार थे, रेडियो उद्घोषक थे, निर्देशक थे।

प्रमोद

प्रमोद बचपन में एक कहानी पढ़ी थी, ‘काबुलीवाला।’ तब काबुलीवाला किताब के पन्नों से निकलकर हमारे नन्हें मन पर छा गया था। अपनी नन्ही बच्ची को याद करता काबुलीवाला। उसकी धुंधली छवि जो हमने मन ही मन रची थी फिल्म ‘काबुलीवाला’ को देखकर साकार हो उठी। हाँ ऐसा ही रहा होगा दूर देश से आया वह आदमी! बलराज साहनी ऐसे ही अभिनेता थे, हर तरह के रोल के सांचे में फिट बैठने वाले। साम्यवादी विचारधारा के पक्के समर्थक, जिन्होंने हिंदी सिनेमा को कई सशक्त रोल देकर गरिमा प्रदान की। बलराज साहनी सही अर्थों में जनमानस के अभिनेता थे। एक साधारण भारतीय और आम आदमी उनके दिल में बैठा था जो अभिनेता बनकर उनकी फिल्मों में उतर जाता। बलराज साहनी हिंदी सिनेमा के गरीब और आम आदमी थे। रिक्शा चालक थे, मजदूर थे। ‘दो बीघा जमीन’ में काम करने वाले शंभु महतो थे। बलराज साहनी एक लेखक थे, पत्रकार थे, रेडियो उद्घोषक थे, निर्देशक थे।

बलराज साहनी का जन्म रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुआ था। इन्होंने गवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से साहित्य में स्नातक किया। बलराज साहनी एक लेखक भी थे, जिन्होंने उस समय अंग्रेजी में कविताएं लिखनी शुरू कीं, जब वह बहुत कम उम्र के थे। कभी-कभी शांति निकेतन में हिंदी और अंग्रेजी भी पढ़ाया करते थे। जर्नलिस्ट की तरह काम करते हुए इन्होंने एक अंग्रेजी साप्ताहिक ‘मंडे मॉर्निंग’ भी निकाला। बलराज साहनी ने बीबीसी की हिंदी सर्विस के लिए एक रेडियो उद्घोषक का भी काम किया।बलराज

साहनी ने अपना ऐक्टिंग करियर थियेटर से प्रारंभ किया। इन्होंने ‘इंडियन पिपुल्स थियेटर एसोसिएशन- इप्टा’ को ज्वाइन किया और ‘जुबेदा’ तथा ‘द इंस्पेक्टर जनरल’ को अपनी भूमिका दी। साहनी का सिनेमा में करियर फनी मजूमदार की फिल्म ‘इंसाफ’ में एक छोटे से रोल से आरंभ हुआ। पहला बडा रोल उन्हें केए अब्बास की ‘धरती का लाल’ में मिला। विमल रॉय की ‘दो बीघा जमीन’ ने इनके प्रभाव को चिरकालीन बना दिया। इसके बाद सहनी ‘गरम कोट’, ‘सोने की चिडिया’ और ‘काबुलीवाला’ में जीवंत और अद्वितीय भूमिकाएं निभाते हैं। इन्होंने गुरू दत्त की फिल्म ‘बाजी’ की कहानी और संवाद लिखे। 1957 में फिल्म ‘लाल बत्ती’ निर्देशित की। इसके बाद बलराज साहनी ने चरित्र प्रधान रोलों को किया। इनके परफॉरर्मेंस हमेशा सहज, स्वाभाविक और सशक्त रहें। साहनी ने अपनी जीवनी लिखी। साथ ही साथ कई नॉवेल और कहानियां भी लिखीं। उनकी पहली हिंदी कहानी ‘शहजादों का ड्रिंक’ 1936 में प्रकाशित हुई। साहनी के लेख और वक्तव्य ‘बलराज साहनी : एन इंटिमेंट पोट्रेट (1974) के नाम से आये।

हिन्दी सिनेमा के महान कलाकार बलराज साहनी का अभिनेता बनना भी एक संयोग था। ‘हंस’ पत्रिका को उन्होंने एक कहानी लिखकर भेजी तो वह वापस आ गयी। उनके स्वाभिमान को गहरी चोट लगी। उन्हीं के शब्दों में- ‘‘इस चोट का घाव कितना गहरा था, इसका अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके बाद मैंने कोई कहानी नहीं लिखी। चेतन की फिल्मों में काम करने के लिए जैसे इस चोट पर मरहम का काम किया। फिल्मों का मार्ग अपनाने का कारण यह अस्वीकृत कहानी भी रही।’’ अच्छा है कि उनकी कहानी अस्वीकृत हुई और हिन्दी फिल्मों को एक स्वाभाविक अभिनेता मिल गया, जिसकी फिल्में मील का पत्थर साबित हुईं।

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

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