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कुछ बात है कि हस्‍ती मिटती नहीं हमारी

गांधी जी: सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा : कल 15 अगस्त है. स्वतंत्रता दिवस. लम्बे संघर्ष के बाद तिरसठ साल पहले हासिल आजादी का यादगार दिन. उल्लास-जोश का पर्याय दिवस. हर साल जब यह दिन आता है तो अपने साथ भावनात्मक और जहनी स्तर पर ढेरों खुशियां भी लाता है. वैसे ये कहने की कम, महसूस करने की घड़ी ज्यादा होती है. याद आता है 1947 को इसी दिन की आधी रात, जब दुनिया सो रही थी और भारत आजादी की नई सुबह में जाग रहा था. जवाहरलाल नेहरू का वो ‘टिन्स्ट विद डेस्टिनी’ का ऐतिहासिक भाषण, जब लाल किले की प्राचीर से उठती इस आवाज को सारा देश  दम साधे सुन ही नहीं रहा था, गुन भी रहा था. आखिर जिस दिन का, जिस घड़ी का इंतजार था-उस जश्न को मनाने का मौका जो था. लेकिन उसी खुशी के आलम में दिल्ली से सैकड़ों मील दूर नोआखली के भयंकर सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका से अकेला, निहत्था निपटता और एक झोपड़ी में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे का शोक मनाता देश का इकलौता बुजुर्ग ‘महात्मा’ भी था, जो उस वक्त न खुल कर रो सकता था और न हंस सकता था.

गांधी जी

गांधी जी: सारे जहां से अच्छा, हिन्दोस्तां हमारा : कल 15 अगस्त है. स्वतंत्रता दिवस. लम्बे संघर्ष के बाद तिरसठ साल पहले हासिल आजादी का यादगार दिन. उल्लास-जोश का पर्याय दिवस. हर साल जब यह दिन आता है तो अपने साथ भावनात्मक और जहनी स्तर पर ढेरों खुशियां भी लाता है. वैसे ये कहने की कम, महसूस करने की घड़ी ज्यादा होती है. याद आता है 1947 को इसी दिन की आधी रात, जब दुनिया सो रही थी और भारत आजादी की नई सुबह में जाग रहा था. जवाहरलाल नेहरू का वो ‘टिन्स्ट विद डेस्टिनी’ का ऐतिहासिक भाषण, जब लाल किले की प्राचीर से उठती इस आवाज को सारा देश  दम साधे सुन ही नहीं रहा था, गुन भी रहा था. आखिर जिस दिन का, जिस घड़ी का इंतजार था-उस जश्न को मनाने का मौका जो था. लेकिन उसी खुशी के आलम में दिल्ली से सैकड़ों मील दूर नोआखली के भयंकर सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका से अकेला, निहत्था निपटता और एक झोपड़ी में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के बंटवारे का शोक मनाता देश का इकलौता बुजुर्ग ‘महात्मा’ भी था, जो उस वक्त न खुल कर रो सकता था और न हंस सकता था.

वो उस द्वंद्व को जी रहा था जो इस देश का था, समाज का था, लोगों का था. खास ये था कि ये द्वंद्व उसका निजी न होकर भी सबसे ज्‍यादा अपना था. तभी तो सेना के लिए भी बेकाबू हो चुके दंगों को नियंत्रित करने के लिए गांधी को लंबा अनशन भी करना पड़ा था और फिर जब वो नोआखली से दिल्ली के लिए टूटे दिल और टूटे शरीर के साथ रवाना हुए, तो उनकी मंजिल दिल्ली नहीं कराची थी-उनका कहना था कि कराची में रहकर फिर से भाइयों के बंटवारे को खत्म कर उन्हें एक कर सकेंगे.

स्वतंत्रता दिवस के इन ऐतिहासिक पलों के उल्लेख का मंतव्य सिर्फ ये है कि आजादी के साथ राष्‍ट्रपिता के शोक का कारण भी ऐतिहासिक था. वो दुनिया के इतिहास में इतने बडे पैमाने पर घर-बार-जड़ों से उखड़ कर नई जगह बसने की अदला-बदली या फिर किसी नए बसेरे की चाहत में जान बचाकर भागे लाखों लोगों की अभूतपूर्व दारुण कहानी थी. जगह-जगह हुए कत्लेआम में अनगिनत चल बसे. लेकिन आजादी की खुशी ने इस गरल का भी पान किया, तभी 30 जनवरी 1948 को ‘हर अंधेरे में राह दिखाने वाला’ वो महात्मा भी साथ छोड़ गया- हतप्रभ और उदास मन से नेहरू ने कहा- ‘प्रकाश चला गया, अब तो अंधेरा ही अंधेरा है.’ पर सच्चाई यही थी कि भारत ‘नीलकंठ’ हो गया था. शिव की तरह विष को गले में ही रोक लिया था.

हजारों साल की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए वो हमेशा की तरह आगे बढ़ा और आज छह दशक बाद अनेक कमियों के बावजूद भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है. विभिन्न धर्म-मजहब-विचार-मतों, भाषाओं, तौर-तरीकों, खान-पान, परंपराओं-रिवाजों, रंग-रूप और इसके बीच कभी-कभी उभरते विरोधों-अंतर्विरोधों के बावजूद वो एक है. वो हिन्दुस्तान है. इसीलिए नेहरू इन ढेरों विभिन्नताओं में एकता के सूत्र तलाशते हैं और सूत्र ही नहीं तलाशते, इन्हें हजारों साल की सांस्कृतिक धरोहर बताते नहीं थकते. बहुतों को यही बहुलता, उदारता, सहिष्णुता और समन्वयी  हिन्दुस्तानी धारा हमारी सांस्कृतिक थाती और अनमोल पूंजी भी प्रतीत होती है. जो सैकड़ों साल से सहज प्रवाहमान मूल्यागत सांस्कृतिक सरिता सरीखी है और जिसे आमजन ने बिना पांडित्यबोध के उदार मन से स्वीकारा ही नहीं है, संजोया है और उसमें मौके-बेमौके योगदान भी दिया है. यह सांस्कृतिक धारा राजे-रजवाड़ों से कम ऋषि-मुनियों-संतों-सूफियों-फकीरों से ज्‍यादा प्रभावित रही है. गांवों-कस्बों और सुदूर अंचलों का सहिष्णु हृदय आज भी इस अनवरत बहती धारा का मूक गवाह है.

कितना विचित्र है कि दुनिया का बहुत सा इतिहास जहां क्रूर राजाओं, बर्बर तानाशाहों और उनकी हिंसक तलवारों से निकले खून के सैलाब पर परपीडक आत्ममुग्धता का शिकार है, वहीं भारतीय समाज संतों-ऋषियों की परंपरा में बुद्ध, महावीर, कबीर, शंकराचार्य, चैतन्य, नानक, तुलसी, खुसरो  की मानवीय उदार चेतना का वाहक रहा है. उस पर राजाओं-बादशाहों का असर तुलनात्मक रूप से कम रहा. तभी तो दुनिया के सर्वोत्कृष्ट शासकों की जब-जब बात होती है तो उसमें भारत के अशोक और अकबर-दोनों महान शासकों को चमकते सितारे के रूप में याद किया जाता है. यहां गौर करने की बात ये है कि ये दोनों ही शासक भारत की सूफियाना, सहिष्णु सांस्कृतिक धारा के ही प्रतिनिधि हैं और तलवार की जगह उदारमना दृष्टि के पर्याय भी.

एक और बात, आधुनिक लोकतांत्रिक संदर्भ में दोनों ही अल्पसंख्यक तबके से हैं. इससे भी साबित होता है कि भारत ने पश्चिम से सिर्फ आयातित लोकतांत्रिक संरचनाओं को ही ग्रहण किया, जम्हूरी उदार-मानवीय और व्यापक मूल्य तो हमारी जीवन-शैली में काफी पहले से रहे हैं जो हमारी बुनियाद भी हैं. इसीलिए भारत को पश्चिमी लोकतांत्रिकढांचे को स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं हुई जबकि एशिया-अफ्रीका और अन्य महाद्वीपों के ढेरों देश ऐसा नहीं कर पाए, यहां तक कि दक्षिण एशिया के हमारे पडोसी भी इस यज्ञ में असफल होते प्रतीत होते हैं. एक और दिलचस्प पहलू ये भी है कि अंग्रेजी शासन के पहले सैकड़ों सालों तक दिल्ली और अन्य राजधानियां तो सियासत से प्रभावित रहीं, लेकिन ग्रामीण व्य्वस्था निर्विघ्न सहज रूप से चलती रही है- इसका भी उदार, सहिष्णु और बहुलवादी-लोकतांत्रिक दृष्टि के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रहा है. इसी कारण संतों-फकीरों का असर शुरू से ही समाज पर गहरा रहा, और बीसवीं शती में गांधी और उनके सत्याग्रह की अद्भुत स्वीकार्यता की ऐतिहासिक घटना भी सहज रूप में ही घटित हुई.

इन्होंने हमारे आजादी के आंदोलन के मूल्यों को भी प्रभावित किया और देश- समाज के मार्गदर्शक की भूमिका निभाने वाले नीति निर्देशक तत्वों के रूप में इनके अनेक तत्वों को संविधान  में भी जगह मिली. और आज भी लाख उतार-चढावों के बीच यही हमारी पूंजी है. ठीक है यही उदारता कई बार हमारी कमजोरी भी बनती प्रतीत होती है. कई बार हम अनिर्णय के दौर से भी गुजरते हैं और हम पर अराजक होने के आरोप भी लगते हैं. लेकिन लोकतंत्र में द्वंद्व और अंतर्विरोध को जीना कला भी है और अपरिहायर्ता भी. पक्ष-विपक्ष के बीच समन्वय, स्वीकार्य हल की तलाश और वो भी जनभावना के अनुरूप, इस बाबत प्रयास तो नितांत छोटे और स्थानीय स्तरों पर भारतीय समाज के विभिन्न घटक सदियों से करते रहे हैं. ये तो रही हमारे सांस्कृतिक कलेवर की बात.

लेकिन सच ये भी है कि पहले की तरह ही इस बार का 15 अगस्त भी स्वाभाविक भावनात्मक खुशी के अलावा अनेक समस्याओं के साथ उपस्थित हुआ है. आखिर कश्मीर में स्वायत्तता की उठती आवाज और बढती बेकाबू हिंसा, हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार का जबरदस्त फैलाव और सबसे ज्यादा कॉमनवेल्थ खेलों की तैयारी के दरमियान  आए दिन दांतों तले उंगली दबाने वाले खुलासे और बढ़ती नक्सल हिंसा, ऐसे अनेक सवाल बताते हैं कि हमारी चुनौतियां कम नहीं हैं.

गुजरात के 2002 के सांप्रदायिक दंगों की सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हो रही सीबीआई जांच और उससे संबंधित ढेरों रपटें भी चौंकाने वाली हैं, उन शर्मनाक खबरों और सैकड़ों की जान लेने वाली हिंसक मारकाट के बीच एक ही सवाल बार-बार उठता है, क्या ये सब साबरमती आश्रम वाले और गांधी के गुजरात में हुआ? लेकिन बात गांधी के गुजरात की ही क्यों, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के अयोध्‍या की क्यों नहीं, जहां 1992 में बाबरी विध्वंस होता है और राममंदिर  के नाम पर पूरे देश में अनेक जगह हिंसा होती है, लेकिन खुद अयोध्‍या हिंसा को नकार देता है. वहां हिन्दू-मुसलमान आपसी सद्भाव की मिसाल दुनिया के सामने पेश करते हैं और पुश्तों से मंदिरों में चढ़ रहे वही फूल आगे भी चढ़ते हैं, जिन्हें अयोध्‍या का मुसलमान अपने खेतों में पैदा करता रहा है. और सांप्रदायिक वैमनस्य पैदा करने के बाद भी राम की नगरी अयोध्‍या में मंदिरों में पूजा और मस्जिदों में नमाज साथ-साथ पहले की तरह होती रही.

बात अमरनाथ यात्रा की क्यों नहीं, जहां आतंकी हमलों के अंदेशे के बाद भी हिन्दू तीर्थयात्रियों की सुरक्षा और उनकी सुविधा का पूरा ध्यान रास्ते के मुस्लिम तबके के लोग ही रखते हैं. वे ही आपने टट्टुओं-घोडों पर जोखिम भरे पथरीले रास्तों से होकर दर्शनार्थियों को उनकी मंजिल तक पहुंचाते हैं. बात कश्मीर की हिंसा के बीच उस शिव मंदिर की क्यों नहीं, जहां से पंडितों के हट जाने के बाद आज भी बरसों से स्थानीय मुसलमान मंदिर में दीया इस आस से जलाते हैं कि एक दिन उनके हिन्दू भाई फिर से वापस लौटेंगे. बात उन अनगिनत मजारों, दरगाहों और इबादत स्थलों की क्यों नहीं, जहां हर रोज सभी धर्मों-मजहबों-पंथों-विचारों के लोग जाने-अनजाने उसी सहिष्णु सांस्कृतिक बोध से शीश नवाते दिखते हैं, जो हमारी धरोहर है. वहां कोई अलगाव नहीं, दुराव नहीं.

बात उन राष्‍ट्रपतियों और प्रधानमंत्री की क्यों नहीं जो सिर्फ कहने को अल्पसंख्यक तबके से रहे हैं, लेकिन पूरा भारत हर क्षण, हर सांस में उनके साथ रहा है. बात उस महिला की क्यों नहीं, जो विदेश में जन्मी, पली बढी, लेकिन भारतीयता ऐसी रुचि कि संसद में बहुमत के बाद भी प्रधानमंत्री की कुर्सी को नकारने का नायाब उदाहरण दुनिया के सामने पेश किया. तो ये है हिन्दुस्तानियत. हमारी ताकत. और, इसी के जरिए हम उन कमजोरियों से भी जूझने का माद्दा रखते हैं, जिनसे अक्सर दूसरे शिकस्त खाते हैं. विरोध-अंतर्विरोध- अंतर्द्वन्द्वों के बीच संतुलन की तलाश हमारी प्रकृति रही है और यही था बुद्ध का मध्यम मार्ग भी. अशोक का बुद्धम् शरणम् गच्छामि का संदेश रहा हो, अकबर का दीन-ए-इलाही का रास्ता या फिर गांधी का सर्वोदय-प्रकृति एक है. तो आज हमें इन्हीं संदर्भों में फिर से संकल्पबद्ध होने की जरूरत है. नई चुनौतियों से निपटने के लिए उस ऊर्जाभरी आस के साथ, जिसे अल्लामा इकबाल ने महसूस किया था-

‘ यूनान, मिस्र, रोमां

गिरीश मिश्र

गिरीश मिश्र


सब मिट गए जहां से
कुछ बात है कि
हस्ती मिटती नहीं हमारी.’

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका यह लिखा ‘लोकमत समाचार’ से साभार लेकर यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीशजी से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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