: किसी की मां, बेटी, पत्नी और बहन भी है मुन्नी : निर्माता अरबाज खान, निर्देशक अभिनव कश्यप, गीतकार जलीस अहमद, संगीत निर्देशक साजिद अली-वाजिद अली के साथ चर्चित कलाकार सलमान खान, नई कलाकार सोनाक्षी सिन्हा, सोनू सूद, माही गिल, विनोद खन्ना, डिंपल कपाडिय़ा, ओमपुरी, अनुपम खेर, टीनू आनंद और महेश मांजेरकर के अलावा फिल्म से जुड़े अन्य तमाम छोटे-बड़े कलाकर बेहद खुश हैं कि उनकी फिल्म दबंग ने आमदनी का एक नया रिकार्ड कायम कर दिया है। फिल्म से जुड़े लोगों से कम खुश दर्शक भी नजर नहीं आ रहे हैं, तभी सिनेमा घरों में एडवांस बुकिंग चल रही है। बात है भी खुशी और आनंद की, लेकिन इन सबको यह दु:ख कतई नहीं होगा कि अपनी आमदनी को लेकर उन्होंने देश की आम और गरीब तबके की एक महिला को उपहास का पात्र बना दिया है, जिससे वह घर से बाहर निकलने में सकुचाने लगी है।
गरीब तबके की इस आम महिला की मनोदशा महसूस करने की कोशिश की जाये तो वह अंदर ही अंदर घुटती भी नजर आ रही है। हालांकि मीडिया की तरह ही बॉलीवुड भी आम आदमी की आवाज बुलंद करने का महत्वपूर्ण कार्य करता रहा है। शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने को लेकर बनी फिल्मों ने लोगों की सोच में व्यापक परिवर्तन करने का काम किया है। लोगों के मर चुके आत्मविश्वास को फिल्मों ने पुनर्जीवित करने का भी काम किया है, पर दु:ख के साथ आश्चर्य की ही बात कही जायेगी कि उसी बॉलीवुड की हाल ही में रिलीज हुई फिल्म दबंग ने गरीब तबके की एक आम औरत को दुनिया में एक बार फिर रुसवा कर दिया है। पुरुष प्रधान समाज में जीना मुश्किल कर दिया है। यह बॉलीवुड के लोगों के मन में गरीबों को लेकर घर कर गई मानसिकता का ही परिणाम नजर आ रहा है, वरना सोनिया, प्रियंका, माधुरी, रेखा, जया, दीपिका, करीना, करिश्मा, शिल्पा, काजोल, जरीन, फराह वगैरह बदनाम क्यों नहीं हो सकतीं, देश की आम और गरीब तबके की मुन्नी ही बदनाम क्यों हुई?
जी, हां! बात साधारण जरुर नजर आ रही है, पर पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण सवाल दिखाई दे रहा है, जिसका जवाब उस मुन्नी के लिए चाहिए, जो खता किये बगैर दुनिया में बदनाम हो चुकी है। मूंछों वाले मर्द को देख कर मुंह ढक लेने वाली मुन्नी की दशा आज बगैर कुछ किये ही ऐसी हो गयी है, जैसे उसने दुनिया का सबसे बड़ा अपराध कर दिया है। वह अगर (मुन्नी बदनाम हुई…) गाने को नजरअंदाज करना भी चाहती है तो मनचले और तेज आवाज में उसका चारित्रिक शोषण करने से नहीं चूकते। ऐसे में वह खुद को असहाय महसूस कर रही है और नाम के कारण अपने जीवन पर भी रो रही है। साथ ही अंदर ही अंदर माता-पिता और उस पुरोहित को भी कोसती नजर आ रही है, जिसने उसे मुन्नी नाम दिया था।
माना पूरे देश पर पश्चिमी संस्कृति का या फिल्मों का असर हुआ है, पर आज भी गांवों की अपनी अलग संस्कृति है। रहन-सहन, खान-पान, चाल-ढाल के साथ कुछ भी शहरों से मेल नहीं खाता। गांव के लोग आज भी अपनी प्रतिष्ठा को सर्वोपरि रखते हैं और मान-सम्मान, मर्यादा के लिए ही पूरा जीवन गुजार देते हैं, इसीलिए परिवर्तन के बाद भी गांव आज भी गांव ही नजर आते हैं। गांवों में आज भी लड़कियों के मुन्नी, कमला या कलावती जैसे नाम ही रखे जाते हैं, जिनको मुम्बई वाले आये दिन भुनाते रहते हैं।
पैसे के लिए गांव की गरीब महिला का उपहास पहले भी उड़ाया जाता रहा है। कमला या कलावती की तरह ही इस बार मुन्नी पर हमला किया गया है, लेकिन बेचारी मुन्नी कुछ कर नहीं सकती, क्योंकि उसी के अपने मुम्बई वालों के रंग में ही रंगे नजर आ रहे हैं, जिससे वह सिर्फ अंदर ही अंदर घुटने से ज्यादा कुछ नहीं कर सकती। इसके अलावा उस बेचारी को यह कौन समझाये कि उसका कसूर आम महिला होने का है और इस देश में किसी भी मुद्दे पर आम महिला-पुरुष को कुछ भी कहने का कोई अधिकार नहीं है। आम महिला-पुरुष की हैसियत यह फिल्म बनाने वाले भी अच्छी तरह जानते हैं, तभी उनके निशाने पर हर बार गांव की आम महिला ही आती है और भविष्य में भी आती रहेंगी, क्योंकि गांव के लोगों का सबसे बड़ा दोष गरीबी है, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि यह मुन्नी भी किसी की बेटी है, किसी की पत्नी है, किसी की बहन है और किसी की मां भी है।
लेखक बीपी गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं.

