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मीडिया मंथन

गालियों की गली में गुलजार वेब मीडिया

आवेश तिवारी: परम्परागत माध्यमों द्वारा इंटरनेट पर मौजूद हिंदी की वेबसाइटों पर अपशब्दों और अश्लीलता को बढ़ावा देने का आरोप बार बार लगाया जा रहा है, न सिर्फ विभिन्न विषयों पर विमर्श के दौरान अपितु उन विषयों पर दी गयी टिप्पणियों में भी लगातार ऐसे शब्द सुनने और पढ़ने को मिलते हैं, जिनको आम तौर पर अश्लील माना जाता है, हालां‍कि हम सभी बातचीत के दौरान उनका प्रयोग बार-बार करते हैं. हिंदी की वेबसाइटों पर पिछले कुछ दिनों से ऐसी टिप्पणियों की भरमार आई है, जिनमें भाषा से जुड़े तथाकथित अनुशासन को छिन्न-भिन्न कर दिया गया, हालांकि ये अनुशासन काशीनाथ सिंह, फ़णीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा, जगदम्बाप्रसाद दीक्षित, अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि बहुत पहले तोड़ चुके हैं, लेकिन सर्वाधिक अंगुली उठ रही है ब्लागों और वेबसाइट्स पर.

आवेश तिवारी: परम्परागत माध्यमों द्वारा इंटरनेट पर मौजूद हिंदी की वेबसाइटों पर अपशब्दों और अश्लीलता को बढ़ावा देने का आरोप बार बार लगाया जा रहा है, न सिर्फ विभिन्न विषयों पर विमर्श के दौरान अपितु उन विषयों पर दी गयी टिप्पणियों में भी लगातार ऐसे शब्द सुनने और पढ़ने को मिलते हैं, जिनको आम तौर पर अश्लील माना जाता है, हालां‍कि हम सभी बातचीत के दौरान उनका प्रयोग बार-बार करते हैं. हिंदी की वेबसाइटों पर पिछले कुछ दिनों से ऐसी टिप्पणियों की भरमार आई है, जिनमें भाषा से जुड़े तथाकथित अनुशासन को छिन्न-भिन्न कर दिया गया, हालांकि ये अनुशासन काशीनाथ सिंह, फ़णीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा, जगदम्बाप्रसाद दीक्षित, अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि बहुत पहले तोड़ चुके हैं, लेकिन सर्वाधिक अंगुली उठ रही है ब्लागों और वेबसाइट्स पर.

लेखकों, पाठकों और बुद्धिजीवियों का एक समूह इस स्थिति को बेहद खतरनाक बताते हुए वेब पत्रिकाओं पर नकेल कसने की वकालत कर रहा है, तो कहीं मानहानि की धमकी दी जा रही है. ऐसे में ये सवाल बहुत जरूरी हो गया है कि क्या भाषाई रूप से नंगा होना, मानसिक नंगई से ज्यादा खतरनाक है? क्या गालियों का एकमात्र उद्देश्य खुद की कुंठा को शांत करते हुए दूसरों को पीड़ा देने तक ही सीमित है, या फिर इसका कोई मनोवैज्ञानिक उपयोग भी है?

मै वो दिन नहीं भूलता जब बनारस के सिगरा स्टेडियम में सचिन तेंदुलकर, अजहर, अजय जडेजा को लगभग ५० हजार की भीड़ समवेत स्वर में सचिनवा भो…..के, अजयवा भो … के  कहकर आवाज लगा रही थी और वो हाथ हिलाकर भीड़ का अभिवादन कर रहे थे. हमारे यहां बनारस में मित्रों द्वारा लम्बे बिछोह के बाद मिलने पर भी गालियां देकर एक दूसरे का स्वागत करने का रिवाज है, साथ ही बनारस में यदि कोई पुरुष किसी दूसरे पुरुष को छिनरो वाले कहता है तो वो सहर्ष स्वीकार्य होता है. इसमें अश्लीलता का कहीं से भी कोई एहसास नहीं होता. ऐसा नहीं है कि गालियों से जुड़ी ये सांस्कृतिक चेतना सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित है, महिलाओं में भी इसका व्यापक असर है, वो गालियों का इस्तेमाल कभी पुरुष की एकात्मक सत्ता के खिलाफ तो कभी खुद के अस्तित्वबोध के लिए करती हैं.

मुझे याद है कि एक बार बचपन में जब मैंने अपने पड़ोसी को एक गाय को लाठी मारने पर गरिया दिया तो उसकी शिकायत पर मेरी दादी ने कहा कि हमारे यहां इसे गाली नहीं माना जाता! ये दादी का मजाक नहीं था, वो जानती थी कि गालियां, कुंठाओं के परिमार्जन का सबसे अभिनव तरीका है, जिससे हम खुद को अलग नहीं कर सकते, अगर ये लक्ष्यविहीन है तो इनके मुकाबिल कोई अस्त्र नहीं है. किसी भी व्यक्ति के जीवन में जैसे जैसे नैतिकता आदर्श और जीवन मूल्यों की स्थापना होती है, वैसे ही अपशब्द भी जीवन का हिस्सा बनते जाते हैं.

जहां संघर्ष होगा, जहां प्रतिरोध होगा, जहां शारीरिक, मानसिक, आर्थिक दुर्बलता होगी, वहां गाली होगी, जहां  निराशा होगी वहां गाली होगी और जहाँ प्रेम होगा वहां भी गाली होगी. लेकिन जब कभी इन प्रतीकों के बिना गाली का प्रयोग होता है तो वहां गालियां  अस्वीकृति झेलती हैं. विभूति का छिनार कहना इसलिए अस्वीकार्य है, क्यूंकि वो इस शब्द का इस्तेमाल उस एक वक़्त के बाद करते हैं, जब वो  लेखिकाओं को अलग-अलग पुरुषों की अंकशायनी बनने की कल्पनाएं कर चुके होते हैं. वहां विभूति का कोई प्रतिरोध या व्यक्तिगत दौर्बल्य नहीं है, वहां एक कुलपति और एक पूर्व पुलिस अधिकारी होने से जुड़ा दु:साहस भी है. ये कुछ इस तरह है- जैसे थाने का दरोगा गालियां देते हुए लाठी के जोर पर किसी भी निर्दोष से कोई बात मनवाने की कोशिश करे.

जहां तक वेब मीडिया का सवाल है, यहां पर शायद ही कोई ऐसा बिरला हो जिसे गाली न पड़ी हो, नामी -बेनामी टिप्पणियों से ही नहीं बाकायदे पोस्ट या ब्लाग लिखकर अपने कलेजे को ठंडक पहुंचाई जा रही है. क्या प्रतिरोध की ये शैली टेलीविजन चैनलों के दफ्तर में घुसकर शीशों और कुर्सियों को तोड़ने या फिर किसी गरीब हाकर को मारपीट कर उसका अखबार जला देने से बेहतर नहीं है? सच कहूं तो यही एक मात्र लोकतान्त्रिक और व्यवहारिक तरीका है, जो पसंद न आये गरियाओ, टीपो और चलते बनो, सीधे शब्दों में कहें तो ये उस एक समूची पीढ़ी की कुंठा को निकाल फेंकने का जरिया है, जो वैचारिक तौर पर जबरिया गुलाम बनाये जाने के खिलाफ संघर्ष करते करते थक हारकर मृत्युशय्या पर जा बैठी थी. वेब पर अश्लीलता का विरोध करने वालों को जो कुछ भी अश्लील नजर आ रहा है, उनमे से ज्यादातर रंग, लिंग या फिर नस्ल के आधार पर नहीं है, वो सिर्फ खुद को अभिव्यक्त करने का अतिसाधारण और सहज तरीका है, जिसका इस्तेमाल अन्य किसी माध्यम में कभी नहीं हुआ.

तमाम वेबसाइट ऐसी हैं, जिन पर अश्लील टिप्पणियां करने वाले नियमित तौर पर उस वेबसाइट्स के पाठक हैं. मैं ऐसे लोगों को भी जनता हूं, जो कोई रिपोर्ट या पोस्ट पसंद आने पर अपने नाम से टिप्पणियां करते हैं और नापसंद होने पर या विषय से असहमत होने पर नाम बदलकर गाली भी देते हैं, आश्चर्यजनक तथ्य ये है कि गालियों के इस्तेमाल में महिलायें पुरुषों से कहीं पीछे नहीं है, ये गालियां लक्ष्यविहीन होती हैं, और इनका एकमात्र उद्देश्य अपनी असहमति को पुरजोर तरीके से व्यक्त करना होता है.

हाँ, ये भी जरुर है कि किसी व्यक्ति विशेष को लक्ष्य करके जबरिया अपनी भड़ास निकालने का भी चलन बहुत तेजी से बढ़ा है, लेकिन वैसे लोग बहुत जल्दी बेनकाब हो जाते हैं और खारिज कर दिए जाते हैं. इस पूरे मामले में एक बड़ा तथ्य ये भी है कि इंटरनेट पर हिंदी लेखन की बागडोर पूरी तौर से आदिवासी या फिर ठेठ गंवईं लोगों के हाथ में आ गयी है. ये वो वर्ग है जो वैचारिक लोकतंत्र का सबसे बड़ा हिमायती है. वो बंद से कमरों में मुंह में सिगरेट दबाये ब्लॉग नहीं लिख रहा. उसके लिए अभिव्यक्ति की प्रायोगिक स्वतंत्रता जिंदगी जीने का सलीका है, हमारे लिए यही लोकतंत्र है, यही समाजवाद है और यही भविष्य है.

लेखक आवेश तिवारी प्रतिभाशाली जर्नलिस्ट हैं. सोनभद्र में डेली न्यूज एक्टिविस्ट के ब्यूरो चीफ हैं. वेब व ब्लागों पर अति सक्रिय रहने वाले आवेश की लेखनी जनपक्षधरता की हिमायती है.

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