गालियों की गली में गुलजार वेब मीडिया

आवेश तिवारी: परम्परागत माध्यमों द्वारा इंटरनेट पर मौजूद हिंदी की वेबसाइटों पर अपशब्दों और अश्लीलता को बढ़ावा देने का आरोप बार बार लगाया जा रहा है, न सिर्फ विभिन्न विषयों पर विमर्श के दौरान अपितु उन विषयों पर दी गयी टिप्पणियों में भी लगातार ऐसे शब्द सुनने और पढ़ने को मिलते हैं, जिनको आम तौर पर अश्लील माना जाता है, हालां‍कि हम सभी बातचीत के दौरान उनका प्रयोग बार-बार करते हैं. हिंदी की वेबसाइटों पर पिछले कुछ दिनों से ऐसी टिप्पणियों की भरमार आई है, जिनमें भाषा से जुड़े तथाकथित अनुशासन को छिन्न-भिन्न कर दिया गया, हालांकि ये अनुशासन काशीनाथ सिंह, फ़णीश्वरनाथ रेणु, राही मासूम रज़ा, जगदम्बाप्रसाद दीक्षित, अब्दुल बिस्मिल्लाह आदि बहुत पहले तोड़ चुके हैं, लेकिन सर्वाधिक अंगुली उठ रही है ब्लागों और वेबसाइट्स पर.

क्या आप फिर माफी मांगेंगे पुण्य प्रसून?

आवेश तिवारीदेश में हिंदी अख़बारों और पत्रकारों का कुनबा हमेशा से लचीला रहा है, खेद प्रकाश की परम्परा इसी लचीलेपन का प्रतीक है. मायावती को जाति सूचक शब्दों से संबोधित करने से लेकर राजशेखर रेड्डी की मौत के किस्सागोई पर अख़बारों ने माफ़ी मांगी, लेकिन अब तक जिस माफ़ी की चर्चा सबसे ज्यादा रही वो थी पुण्य प्रसून वाजपेयी की माफ़ी. उन्होंने इशरत के इनकाउंटर के मामले में मीडिया की तरफ से मांगी थी. एक मजिस्ट्रेट की जाँच रिपोर्ट और नरेन्द्र मोदी के अति हिंदूवादी चरित्र को पार्श्व में रखकर पुण्य प्रसून ने हम सब की तरफ से माफ़ी मांग ली. अपने माफीनामे में पुण्य प्रसून ने कहा था “अगर मजिस्ट्रेट जांच सही है, तो उस दौर में पत्रकारों और मीडिया की भूमिका को किस तरह देखा जाए। खासकर कई रिपोर्ट तो मुबंई के बाहरी क्षेत्र में, जहां इसरत रहती थी, उन इलाकों को भी संदेह के घेरे में लाने वाली बनी”.

‘हमें नाम नहीं चाहिए, बस अपमानित न करो’

[caption id="attachment_2177" align="alignleft"]आवेश तिवारीआवेश तिवारी[/caption]आपने संजय यादव का नाम नहीं सुना होगा। उनकी लिखी खबरें अक्सर सुर्खियाँ बनती रही हैं। आप उनका नाम कभी सुन भी नहीं पाएंगे! संजय की कहानी उन जैसे उन हजारों नवयुवकों की कहानी है जिन्हें न सिर्फ बिग बिजनेस कर रहे मीडिया हाउस बल्कि खुद को मीडिया का प्रतीक मानने वाला तथाकथित पत्रकारों का एक वर्ग न सिर्फ लगातार इस्तेमाल करता है बल्कि उनकी अंगुलियों का एक एक बूंद खून चूस कर उनकी संवेदनशीलता का निरंतर रेप कर रहा है। अखबारों को इनका नाम छापने से गुरेज तो है ही, वे इन्हें अपना हिस्सा भी नहीं मानते।