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चिरंजीवी की करवट का असर!

गिरीश मिश्रक्या टॉलीवुड अभिनेता और 2008 में प्रजा राज्यम पार्टी (पीआरपी) स्थापित करने वाले चिरंजीवी के दलबल सहित कांग्रेस में शामिल होने से वाकई कांग्रेस को फायदा होने वाला है? क्या इससे आंध्र की राजनीति के गणित में कोई बदलाव होगा? कांग्रेस वाइएसआर के बेटे जगनमोहन रेड्डी को जवाब देने में सफल हो पाएगी? क्या 294 सदस्यीय विधानसभा में चिरंजीवी की पार्टी के महज 16 सदस्यों के सत्ता पक्ष के साथ आ जाने से किरण रेड्डी की सरकार को लाभ हो सकता है? या फिर इस सियासी समझौते में ज्यादा फायदा चिरंजीवी को ही होने वाला है, क्योंकि सिर्फ पिछले कुछ महीनों में ही उनकी पार्टी के 22 नेता उनका साथ छोड़ कर जा चुके हैं? सियासत में धार खो रहे चिरंजीवी ने 2009 में अपने जन्मदिन के मौके पर फिर से फिल्मों में लौटने की इच्छा क्या ऐसे ही व्यक्त कर दी थी? या फिर कांग्रेस से जुड़कर वो किसी बडे़ सियासी बदलाव के कारक भी हो सकते हैं?

गिरीश मिश्र

गिरीश मिश्रक्या टॉलीवुड अभिनेता और 2008 में प्रजा राज्यम पार्टी (पीआरपी) स्थापित करने वाले चिरंजीवी के दलबल सहित कांग्रेस में शामिल होने से वाकई कांग्रेस को फायदा होने वाला है? क्या इससे आंध्र की राजनीति के गणित में कोई बदलाव होगा? कांग्रेस वाइएसआर के बेटे जगनमोहन रेड्डी को जवाब देने में सफल हो पाएगी? क्या 294 सदस्यीय विधानसभा में चिरंजीवी की पार्टी के महज 16 सदस्यों के सत्ता पक्ष के साथ आ जाने से किरण रेड्डी की सरकार को लाभ हो सकता है? या फिर इस सियासी समझौते में ज्यादा फायदा चिरंजीवी को ही होने वाला है, क्योंकि सिर्फ पिछले कुछ महीनों में ही उनकी पार्टी के 22 नेता उनका साथ छोड़ कर जा चुके हैं? सियासत में धार खो रहे चिरंजीवी ने 2009 में अपने जन्मदिन के मौके पर फिर से फिल्मों में लौटने की इच्छा क्या ऐसे ही व्यक्त कर दी थी? या फिर कांग्रेस से जुड़कर वो किसी बडे़ सियासी बदलाव के कारक भी हो सकते हैं?

दरअसल, ऐसे अनेक सवाल सियासी गलियारों में तैर रहे हैं और सभी के अपने-अपने तर्क हैं. लेकिन माना यही जा रहा है कि कांग्रेस को आंध्र के रायलसीमा और तटीय क्षेत्रों में अपने आधार को और व्यापक करने के लिए एक मजबूत सहयोगी मिल गया है, वहीं उसे तेलुगू देशम (टीडीपी) और जगन की कूटनीतिक चालों और भावनात्मक मुद्दों से निपटने के लिए जनता के बीच लोकप्रिय चेहरा भी. वैसे भी दक्षिण की राजनीति में फिल्मों के प्रभावी असर को देखते हुए चिरंजीवी को सिर्फ आंध्र के लिए ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों के लिए भी सकारात्मक माना जा रहा है. जगन के कडप्पा की सांसदी से इस्तीफा देने और कांग्रेस छोड़ने के बाद से ही चिरंजीवी के कांग्रेस से जुड़ने की खबरें सियासी हलकों में थीं, लेकिन उसके रूप को लेकर विचार जारी था. अब पीआरपी के विधायकों के चलते जहां रेड्डी सरकार के अस्तित्व पर लटक रहा खतरा टल गया प्रतीत होता है, वहीं इस गठजोड़  से नए बदलाव के भी संकेत हैं.

पहले जातीय संदर्भ पर विचार करें. आंध्र का गणित दिलचस्प है. रेड्डी और कम्मा प्रदेश की लगभग आठ करोड़ आबादी के क्रमशः सात और दस फीसदी हैं लेकिन इन्हीं तबकों में से अब तक 16 में से 14 मुख्यमंत्री बने हैं. इनमें भी रेड्डी तबके से नौ रहे हैं. मौजूदा मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की विशेषता भी उनका रेड्डी होना और जगन रेड्डी का खतरा ही रहा है. 1983 में आंध्र की सियासत में एन.टी. रामाराव के आने से कम्मा तबके को महत्व मिला जो तब तक रेड्डी प्रभावी था. लेकिन मजे की बात यह है कि आंध्र में सबसे बड़ा तबका जातीय संदर्भ में वही कापू समुदाय है, जिससे चिरंजीवी आते हैं. इसकी आबादी करीब बीस फीसदी है. इसीलिए चिरंजीवी ने जब पीआरपी का गठन किया और सामाजिक न्याय की बात उठाई तो राजनीतिक हलकों में एक खलबली सी मची थी, क्योंकि कापू, ओबीसी, अनु. जाति, अनु. जनजाति और अल्पसंख्यकों की जिस एकजुटता पर जोर दिया गया था – वो राज्य की कुल आबादी का 80 फीसदी था. ये अलग बात है कि पीआरपी अपनी मुहिम में पिछले चुनाव में सफल नहीं हो पाई, बल्कि ज्यादातर जगहों पर उसने कांग्रेस के पारंपरिक वोट काटे, जिसका फायदा टीडीपी को मिला. पहले कापू समुदाय पारंपरिक रूप से कांग्रेस के साथ था. पीआरपी का दुर्भाग्य ये भी रहा कि वो ओबीसी जातियों को एकजुट नहीं कर सकी. वैसे कापू समुदाय सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से मजबूत है – इसकी कई उपजातियां भी हैं. लेकिन इनका अन्य पिछड़ी जातियों से असली विरोध ही पीआरपी की एकजुटता में मुख्य अंतर्विरोध है.

वैसे चिरंजीवी की पार्टी के कांग्रेस में विलय से न केवल कांग्रेस का जनाधार बढे़गा बल्कि यह आशंका भी दूर होगी कि आंध्र दक्षिण का यूपी, बिहार हो सकता है, जहां कांग्रेस को अपनी खोई जमीन वापस पाने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ रही है. माना यही जा रहा है कि चिरंजीवी के चलते कापू समुदाय का छिटका वोट भारी संख्या में फिर कांग्रेस की ओर मुड़ सकता है. इस समुदाय की बहुतायत रायलसीमा और तटीय आंध्र के क्षेत्रों में है.  समीक्षक ये भी मानते हैं कि कापू तबके का वोट एकजुट नहीं है, वो बंटता रहा है. दूसरा यह कि चिरंजीवी की अगुवाई में कापू के कांग्रेस से जुड़ने पर प्रतिक्रिया में दूसरे समुदाय छिटक सकते हैं. लेकिन मानने वाले यह भी कहते हैं कि कांग्रेस के सामाजिक-राजनीतिक जनाधार को बिना प्रभावित किए यदि कापू तबका जुड़ता है तो एक ओर पार्टी को फायदा होगा तो दूसरी ओर टीडीपी को नुकसान.

वैसे पिछले समय में चिरंजीवी के सहयोगियों में डॉ. पी. मित्रा रेड्डी, परकाला प्रभाकर और टी. देवेंद्र के साथ छोड़ कर दूसरी पार्टियों में जाने से पीआरपी में खुद भगदड़ जैसी स्थिति थी. अनेक विधानसभा उपचुनावों और स्थानीय निकाय चुनावों में भी पीआरपी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा और जिला कार्यालयों समेत राज्य कार्यालय में भी सन्नाटा ही पसरा रहता था, ऐसे में चिरंजीवी के लिए भी सियासी अस्तित्व-रक्षा के लिए जरूरी था कि वो कांग्रेस के साथ आ जाएं. अब चिरंजीवी के साथ वो जनमाहौल भी नहीं रहा था, जैसा कि 2008 में पार्टी गठन के समय था, जब बड़ी तादाद में आईएएस-आईपीएस अधिकारी, पूर्व प्रशासनिक अफसर, सामाजिक कार्यकर्ता, न्यायिक अधिकारी और राजनीतिक लोग उनके सिद्धांतों-विचारों से आकर्षित हो रहे थे. जनसभाओं में भारी भीड़ उमड़ती थी. दरअसल, चिरंजीवी का दुर्भाग्य यही रहा कि भीड़ की संख्या वोटों में तब्दील नहीं हो पाई और 2009 में उन्हें सिर्फ 18 प्रतिशत वोट ही मिल पाए. खुद चिरंजीवी तिरुपति से तो चुनाव जीत गए लेकिन अपने ही गृहनगर में पश्चिम गोदावरी के पालाकोल से हार गए. विचित्र यह है कि ऐसा तब हुआ, जबकि उस इलाके में कापू समुदाय प्रभावी है. इसी आधार पर यह आशंका जताई जा रही है कि चिरंजीवी कापू तबके को कितने हद तक कांग्रेस से जोड़ पाएंगे. वैसे पीआरपी को जिस तरह से कांग्रेस में शामिल किया गया है और उसकी सार्वजनिक अभिव्यक्ति जिस रूप में हुई है, उससे कांग्रेस के राज्यस्तरीय वरिष्ठ नेताओं को भी संतुष्ट करने का ही प्रयास किया गया है. तात्कालिक रूप से चिरंजीवी और उनके समर्थकों को कोई फायदा नहीं दिया गया है, इससे पुराने लोगों को नाराज होने का कोई मौका न देना सियासी चतुराई का ही संकेत है. लेकिन संकेत यही है कि चिरंजीवी के समर्थक विधायकों को जहां राज्य मंत्रिपरिषद में जगह मिलेगी, वहीं चिरंजीवी को राज्यसभा में भेजने की तैयारी है.

कांग्रेस चिरंजीवी के द्वारा सबसे ज्यादा जगनमोहन को सियासी जवाब देने की तैयारी में है. इसके पहले कि जगन भविष्य में वाइएसआर समर्थक कांग्रेसियों को लेकर पार्टी में कोई बड़ी या निर्णायक टूट की ओर कदम बढ़ाते, चिरंजीवी की इस नई छवि से निपटना भी जगन की जरूरत होगी. ठीक है चिरंजीवी पीआरपी नेता के तौर पर बहुत सफल न रहे हों, लेकिन यदि कांग्रेस का जनाधार मिला तो भावनात्मक रूप से जनता को प्रभावित कर सकते हैं, जो जगन को माकूल जवाब हो सकता है. यही संभवतः आज कांग्रेस की जरूरत भी है. ये जरूर है कि चिरंजीवी के कांग्रेस के साथ जाने से बुद्धिजीवियों और जनता का एक जागरूक तबका निराश भी हुआ है, क्योंकि चिरंजीवी ने सामाजिक न्याय, बदलाव और वैकल्पिक राजनीति के नाम पर न केवल लोगों की आशाएं जगाई थीं, बल्कि उन्हें एकजुट भी किया था. पीआरपी-कांग्रेस विलय से उसे आघात पहुंचा है. सच यही है कि आने वाले समय में लोग जल्दी फिर से ऐसी किसी पहल पर शायद भरोसा न करें. लेकिन यदि चिरंजीवी ने सधे कदमों से नई शुरुआत की तो आंध्र की सियासत में बडे़ बदलाव की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता है.

लेखक गिरीश मिश्र वरिष्ठ पत्रकार हैं. इन दिनों वे लोकमत समाचार, नागपुर के संपादक हैं. उनका ये लिखा आज लोकमत में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है. गिरीश से संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

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