आज से ठीक 34 साल पहले 24 मार्च 1977 के दिन मोरारजी देसाई ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी. कांग्रेस की स्थापित सत्ता के खिलाफ जनता ने फैसला सुना दिया था. अजीब इत्तेफाक है कि देश के राजनीतिक इतिहास में इतने बड़े परिवर्तन के बाद सत्ता के शीर्ष पर जो आदमी स्थापित किया गया, वह पूरी तरह से परिवर्तन का विरोधी था. मोरारजी देसाई तो इंदिरा गाँधी की कसौटी पर भी दकियानूसी विचारधारा के राजनेता थे, लेकिन इंदिरा गाँधी की इमरजेंसी की सत्ता से मुक्ति की अभिलाषा ही आम आदमी का लक्ष्य बन चुकी थी, इसलिए जो भी मिला उसे स्वीकार कर लिया.
कांग्रेस के खिलाफ जनता इतने बड़े पैमाने पर हो गयी थी कि जो भी कांग्रेस के खिलाफ खड़ा हुआ उसको ही नेता मान लिया. कांग्रेस को हराने के बाद जिस जनता पार्टी के नेता के रूप में मोरारजी देसाई ने सत्ता संभाली थी, चुनाव के दौरान उसका गठन तक नहीं हुआ था. सत्ता मिल जाने के बाद औपचारिक रूप से पहली मई 1977 के दिन जनता पार्टी का गठन किया गया. कांग्रेस को सत्ता से बेदखल करने की फौरी कारण तो इमरजेंसी की ज्यादतियां थीं. इमरजेंसी में तानाशाही निजाम कायम करके इंदिरा गाँधी ने अपने एक बेरोजगार बेटे को सत्ता थमाने की कोशिश की थी. वह लड़का भी क्या था. दिल्ली में कुछ लफंगा टाइप लोगों से उसने दोस्ती कर रखी थी और इंदिरा गाँधी के शासन काल के में वह पूरी तरह से मनमानी कर रहा था. इमरजेंसी लागू होने के बाद तो वह और भी बेकाबू हो गया. कुछ चापलूस टाइप नेताओं और अफसरों को काबू में करके उसने पूरे देश में मनमानी का राज कायम कर रखा था.
इमरजेंसी लगने के पहले तक आमतौर पर माना जाता था कि कांग्रेस पार्टी मुसलमानों और दलितों की भलाई के लिए काम करती थी. हालांकि यह सच्चाई नहीं थी क्योंकि इन वर्गों को बेवक़ूफ़ बनाकर सत्ता में बने रहने का यह एक बहाना मात्र था. इमरजेंसी में दलितों और मुसलमानों के प्रति कांग्रेस का असली रुख सामने आ गया. दोनों ही वर्गों पर खूब अत्याचार हुए. देहरादून के दून स्कूल में कुछ साल बिता चुके इंदिरा गाँधी के उसी बिगडै़ल बेटे ने पुराने राजा महराजाओं के बेटों को कांग्रेस की मुख्य धारा में ला दिया था, जिसकी वजह से कांग्रेस का पुराना स्वरुप पूरी तरह से बदल दिया गया था. अब कांग्रेस ऐलानियाँ सामंतों और उच्च वर्गों की पार्टी बन चुकी थी. ऐसी हालत में दलितों और मुसलमानों ने उत्तर भारत में कांग्रेस से किनारा कर लिया. नतीजा दुनिया जानती है. कांग्रेस उत्तर भारत में पूरी तरह से हार गयी और केंद्र में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार स्थापित हुई. लेकिन सत्ता में आने के पहले ही कांग्रेस के खिलाफ जीत कर आई पार्टियों ने अपनी दलित विरोधी मानसिकता का परिचय दे दिया.
जनता पार्टी की जीत के बाद जो नेता चुनाव जीतकर आये उनमें सबसे बुलंद व्यक्तित्व बाबू जगजीवन राम का था. आम तौर पर माना जा रहा था कि प्रधानमंत्री पद पर उनको ही बैठाया जाएगा, लेकिन जयप्रकाश नारायण के साथ कई दौर की बैठकों के बाद यह तय हो गया कि जगजीवन राम को जनता पार्टी ने किनारे कर दिया है, जो सीट उन्हें मिलनी चाहिए थी वह यथास्थितिवादी राजनेता मोरारजी देसाई को दी गयी. इसे उस वक़्त के प्रगतिशील वर्गों ने धोखा माना था. आम तौर पर माना जा रहा था कि एक दलित और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को प्रधानमंत्री पद पर देख कर सामाजिक परिवर्तन की शक्तियां और सक्रिय हो जायेंगी. जिसका नतीजा यह होता कि सामाजिक परिवर्तन का तूफ़ान चल पड़ता और राजनीतिक आज़ादी का वास्तविक लक्ष्य हासिल कर लिया गया होता.
जिन लोगों ने इमरजेंसी के दौरान देश की राजनीतिक स्थिति देखी है, उन्हें मालूम है कि बाबू जगजीवन राम के शामिल होने के पहले सभी गैर-कांग्रेसी नेता मानकर चल रहे थे कि समय से पहले चुनाव की घोषणा इंदिरा गाँधी ने इस लिए की थी कि उन्हें अपनी जीत का पूरा भरोसा था. विपक्ष की मौजूदगी कहीं थी ही नहीं. जेलों से जो नेता छूट कर आ रहे थे वे आराम की बात ही कर रहे थे. सबकी हिम्मत खस्ता थी, लेकिन 6 फरवरी 1977 के दिन सब कुछ बदल गया. जब इंदिरा गाँधी की सरकार के मंत्री बाबू जगजीवन राम ने बगावत कर दी. सरकार से इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस फार डेमोक्रेसी बना डाली. उनके साथ हेमवती नन्दन बहुगुणा और नंदिनी सत्पथी भी थे. उसके बाद तो राजनीतिक तूफ़ान आ गया. इंदिरा गाँधी के खिलाफ आंधी चलने लगी और वे रायबरेली से खुद चुनाव हार गयीं.
सबको मालूम था कि 1977 के चुनाव में दलितों ने पूरी तरह से कांग्रेस के खिलाफ वोट दिया, लेकिन जब बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनाने की बात आई तो सबने कहना शुरू कर दिया कि अभी देश एक दलित को प्रधानमंत्री स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है. मीडिया में भी ऐसे ही लोगों का वर्चस्व था, जो यही बात करते रहते थे. और इस तरह एक बड़ी संभावित क्रान्ति को कुचल दिया गया. जनाकांक्षाओं पर मोरारजी देसाई का यथास्थितिवादी बुलडोज़र चल गया. उसके बाद शासक वर्गों के हितों के रक्षक जनहित की बातें भूल कर अपने हितों की साधना में लग गए. जनता पार्टी में आरएसएस के लोग भी भारी संख्या में मौजूद थे. ज़ाहिर है उनकी ज़्यादातर नीतियों का मकसद सामंती सोच वाली सत्ता को स्थापित करना था. जिसकी वजह से जनता पार्टी राजनीतिक विरोधाभासों का पुलिंदा बन गयी और इंदिरा गाँधी की राजनीतिक कुशलता के सामने धराशायी हो गयी.
जो सरकार पांच साल के लिए बनाई गयी थी वह दो साल में ही तहस-नहस हो गयी. लेकिन जनता पार्टी की दलित और मुसलमान विरोधी मानसिकता को एक भावी राजनीतिक विचारक ने भांप लिया था. और इन वर्गों को एकजुट करने के काम में जुट गए थे. 1971 में ही वंचितों के हक के सबसे बड़े पैरोकार कांशीराम ने दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक सरकारी कर्मचारियों के हित के लिए काम करना शुरू कर दिया था. सवर्णों के प्रभाव वाली राजनीतिक पार्टियों से किसी को कोई उम्मीद नहीं थी, लेकिन जनता पार्टी का जो जनादेश था, उस से उम्मीद बंधी थी कि शायद उसकी सरकार आम आदमी की पक्षधर सरकार के रूप में काम करे. लेकिन जब उसकी कोई उम्मीद नहीं रह गयी तो डॉ. अंबेडकर के महापरिनिर्वाण दिवस 6 दिसंबर के दिन 1978 में दिल्ली के बोट क्लब पर दलित-पिछड़े और अल्पसंख्यक कर्मचारियों के फेडरेशन का बहुत ही जोर-शोर से आयोजन किया गया. बामसेफ नाम का यह संगठन वंचित तबक़ों के कर्मचारियों में बहुत ही लोकप्रिय हो गया था. शुरू में तो यह इन वर्गों के कर्मचारियों के शोषण के खिलाफ एक मोर्चे के रूप में काम करता रहा लेकिन बाद में इसी संगठन के अगले क़दम के रूप में दलित शोषित समाज संघर्ष समिति यानी डीएसफोर नाम के संगठन की स्थापना की गई. इस तरह जनता पार्टी के जन्म से जो उम्मीद बंधी उसके निराशा में बदल जाने के बाद दलितों के अधिकारों के संघर्ष का यह मंच सामाजिक बराबरी के इतिहास में मील का एक पत्थर बना.
जनता पार्टी जब यथास्थिवाद की बलि चढ़ गयी तो कांशी राम ने सामाजिक बराबरी और वंचित वर्गों के हितों के संघर्ष के लिए एक राजनीतिक मंच की स्थापना की और उसे बहुजन समाज पार्टी का नाम दिया. बाद में यही पार्टी पूरे देश में पुरातनपंथी राजनीतिक और समाजिक सोच को चुनौती देने के एक मंच में रूप में स्थापित हो गयी. इस तरह हम देखते हैं कि हालांकि मोरारजी देसाई का आज से ठीक 34 साल पहले सत्ता पर काबिज़ होना देश के राजनीतिक इतिहास में एक कामा की हैसियत भी नहीं रखता, लेकिन उनका सत्ता में आना सामाजिक बराबरी के संघर्ष के इतिहास में एक अहम मुकाम रखता है.
लेखक शेष नारायण सिंह देश में हिंदी के जाने-माने स्तंभकार, पत्रकार और टिप्पणीकार हैं.

