
प्रमोद
संसद जनप्रतिनिधियों से बनती है। लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर है संसद। लेकिन संसद पिछले 60 सालों से अधिक के सफर में एक अजीब सी स्थिति में गुजरता रहा है। जो पिछले 60 सालों से आम तौर पर संसद और विधायक बनते हैं, उनमें आम आदमी अथवा आम जनता कहां है? लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में पिछले कुछ समय से सता पक्ष और प्रतिपक्ष की आवाजाही चल रही है। संसद के भीतर नहीं, बल्कि बाहर धरना-प्रदर्शन, बहस बाजी और आम आदमी की लड़ाई चल रही है। मंगलवार 27 जुलाई को एकजुट प्रतिपक्ष ने जोरदार हंगामा मचाया। संसदीय कार्यवाही अगले दिन बुधवार तक स्थगित कर दी गई। प्रतिपक्ष की मांग थी की भीषण महंगाई के मुद्दे पर लोकतंत्र में कार्य स्थगन प्रस्ताव और उच्च सदन राज्यसभा में नियम 168 के तहत बहस करायी जाए। नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज जबर्दस्त आत्मविश्वास में आकर लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष काम रोको प्रस्ताव रखते हुए कहा कि पूरा विपक्ष इस मुद्दे पर एक जुट है और सारा काम रोककर आम जनता के पक्ष में महंगाई पर चर्चा होनी चाहिए। दूसरे अन्य दलों की भी राय थी कि संसद के दोनों सदन में कार्य स्थगन प्रस्ताव के तहत चर्चा हो, जिससे कि पता चल सके कि जनता की रोजमर्रा की समस्या पर कौन कहां खड़ा है?
संसद का मानसून सत्र तीसरे दिन भी काम रोको प्रस्ताव नामंजूर होने के बाद चौथे दिन भी संसद हगामें की जद में रहा; लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार का कहना है कि नियम के मुताबिक कार्य स्थगन प्रस्ताव में उसी मुद्दे पर चर्चा की जा सकती है, जिसे कर पाने में सरकार पर नाकामी का आरोप हो। महंगाई का मुद्दा उस श्रेणी में नहीं आता। लेकिन कई सवाल ऐसे है जिसको सत्ता पक्ष और विपक्ष को राजनीतिक बढ़त लेने के बजाए उस सवाल को हल करने की कोशिश करनी चाहिए, जिससे रोजाना आम आदमी जूझ रहा है। संसद को चलाने मे जो खर्च आता है वह देश का है। देश की जनता उस खर्च का बोझ उठाती है। हमारे जनप्रतिनिधियों को चाहे वे पक्ष के हो या विपक्ष के उन्हें उस जनता के दर्द से क्या वास्ता है। उसके लिए दुख को समझना होगा और लोकतंत्र के मंदिर में एक सार्थक चर्चा करनी होगी। आवश्यक चीजों और पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की जिम्मेदारी से सरकार बच नहीं सकती।
किसानों की आत्महत्या हो, भूख या गरीबी हो, बेरोजगारी हो उससे सरकार अपना पल्ला झाड़ नहीं सकती। ऐसा क्यों है कि अनाज का इतना अधिक उत्पादन होने के बाद जबकि वह गोदामों में न अट पा रहा हो, बाहर पड़े सड़ रहा हो, और दूसरी तरफ लोग बेकाबू महंगाई से त्रस्त हों। ऐसे में कोई भी सरकार इससे अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। तभी तो धूमिल ने अरसे पहले लिखा-’गोदाम अनाज से भरे पड़े थे/ और लोग भूखे मर रहे थे।’ मंहगाई की समस्या लगातार बनी हुई है। और सरकार का रूख कुछ ऐसा है कि हम क्या करें ? कारण कि दिसम्बर 2009 से अब तक सरकार की ओर से न कोई प्रयास नजर आ रहा हे और न ही कोई गंभीरता। और ऐसा क्यों न हो, जब महंगाई, भोपाल त्रासदी के गुनहगार एंडरसन की फरारी, नक्सलवाद, विदेशी मोर्चे पर अपरिपक्वता-असफलता के बावजूद विपक्ष की स्थिति पतली हो। पुलिस की गोली से नक्सली के नाम पर गरीब आदिवासी मारा जाए या नक्सलियों के गोली से सरकार और वर्ग युद्ध के नाम पर आम आदमी मारा जाए, सरकार की सबलता पर क्या फर्क पड़ता है। नक्सलवाद पर बहस उलझकर रह गयी है। सरकार और बुद्धिजीवी और आम आदमी की राजनीति करने वाले नेता बस रोग बता रहे है और इलाज क्या हो इस पर खतरनाक सघन चुप्पी है। अगर आजादी से अब तक भीषण गरीबी और बेवजह की मौतें हुई हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं?
आंकड़ें उठा कर देख लीजिए या दिमाग पर ही थोड़ी जोर डालिए तो याद होगा कि 1999 में गेंहू सात रूपये प्रति किलो की दर से बिक रहा था। आज 17-18 रूपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। आम आदमी का साधारण चावल इन्हीं दिनों आठ रूपये किलो था, पर आज 16-20 रूपये प्रति किलो बिक रहा है। खान-पान की सामग्री की कीमत एक साल में 20 फीसदी के लगभग बढ़ गई है। संसद के सदनों मे जब महंगाई, गरीबी, भुखमरी पर चर्चा हो तब सांसदों की उपस्थिति कम देखी जाती रही है। इसका क्या कारण है? जब बात मंत्रियों और हमारे माननीय सांसदों की सुविधाएं और वेतन भत्तों की बढ़ोतरी का होता है तो मामला सर्वसम्मति से फिट हो जाता है।
जहां लोकसभा में करोड़पति सांसदों की संख्या 316 हो और राज्यसभा में हारे हुए नेता, उद्योगपति और नामी वकील हों, जो धन और एश्वर्य से परिपूर्ण हैं, तो वे क्यों और कैसे हमारी समस्याओं के प्रति गंभीर होंगे। यहां 84 करोड़ उन लोगों की बात हो रही है जो रोजाना अपने जिंदगी से जूझती और बुझती है। ये 84 करोड़ भारत में रहते है, जो समृद्ध और खुशहाल इडिया को अपनी बेबसी से चिढ़ाते रहते हैं। कभी हिंदू-हिंदू और अराजकता का राग अलापने वाले वर्तमान सेकुलर सांसद संजय निरूपम की अंतर्रात्मा यह स्वीकार ही नहीं कर पाती कि यहां इतने लोग है, जो रोजाना 20 रूपये पर अपना गुजारा करते हैं। उन्हें अर्थशास्त्री अर्जुन सेनगुप्त एवं अन्य जानकारों के यह कहने से क्या फर्क पड़ता है कि हमारे देश में 84 करोड़ लोगों की प्रतिदिन औसत आय बीस रूपये है।
अतुल्य भारत का सपना दिखाने वाले लोग इसे कैसे समझेंगे। महान लेखक प्रेमचंद्र ने एक बार सामाजिक असमानता और इन्हीं आम लोगों तथा खास लोगों की तुलना करते हुए कहा था कि लगता है ईश्वर नहीं है, अगर वह होता तो इस तरह की खाई क्यों होती? स्थिति देखकर यही लगता है कि कोई सरकार नहीं और जो है उसे हमसे कोई मतलब नहीं। और खेत-खलिहान वाले कवि धूमिल की तरह कहने का मन करता है- जनाब इस दुनिया में/भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क/रोटी है। और जब संसद में बहस चलती और नहीं चलती है तो जन कवि गोरख पाण्डेय याद आते है- सावधान !संसद है बहस चल रही है /भीतर कुछ कुर्सिया मंगाओं /बाहर जेलें नई बनाओ /बॉधों लपटे झोपड़ियों की /महलों की रौनकें बचाओ।
लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

