: कुछ बातें बेमतलब 7 : इंडिया राष्ट्र मंडल खेल में अभी तो भारतीय खेल कुश्ती में आगे चल रहा है। शूटिंग में भी सही निशानेबाजी हो रही है। पता नहीं इंडिया वाले खेलों में भारत का हाल क्या होगा। एक बात तो माननी पड़ेगी कि हम कुश्ती में महाकुश्ती बाज हैं। अपना-अपना नजरिया है। हमें क्रिकेट को भी कुश्ती मान लेना चाहिए। राष्ट्र को कुश्तीबाजों के स्वर्ण पदक से ज्यादा इस बात पर खुशी हो रही है कि हमने किसी को क्रिकेट में हरा दिया। खबरिया चैनल इस खुशी से झूम रहे थे और बेचारा दूरदर्शन कह रहा था कि जाइए राष्ट्र मंडल खेल भी देख आइए। बहरहाल लाखों करोड़ के खेल के बाद कुछ सोना, कुछ चांदी के साथ देश कहेगा, देखा खेल की ताकत। और देखना चाहते हो तो चलो भारत के असली राष्ट्र बिहार चलो। असली महाराष्ट्र बिहार में टिकट की कुश्ती अभी भी चालू है। कहना मुश्किल है कि यह असली कुश्ती है या नूरा कुश्ती है। जो भी है चालू भी रहेगी। जब तक आखिरी दिन नामांकन का है, तब तक चालू रहेगी।
यहां बड़ी-बड़ी चुनौतियां भी दी जा रही हैं। यह कुछ ऐसी ही चुनौती है कि बिहार के दो कुश्तीबाज कह सकते हैं कि हम माई राम से कुश्ती नहीं लड़ते। हमेशा की तरह चुनौतीबाज लालू जी ने चुनौती दी है नीतीश– सुशील को कि दम है तो राबड़ी देवी से लड़ लो। दोनों चुप हैं। ऐसा ही जलवा है लालू जी का। सुरेश कलमाड़ी को समझ होती तो राष्ट्र मंडल खेलों में लालू जी को अपना सलाहकार रखते। तब अपने संपूर्ण हृदय परिवर्तन के साथ लालू जी उन्हें समझाते कि कैसे राष्ट्र मंडल खेल में संपूर्ण भारत भाग ले सकता है। आज जो स्टेडियम खाली खाली नजर आता है, वह भरा भरा होता। लालू जी का पहला सुझाव होता कि सभी पार्टियों का टिकट बंटवारा जवाहर लाल नेहरु स्टेडियम में होगा।
इसके कितने फायदे होते। दिल्ली में पर्यटन को बढ़ावा मिलता। अतुल्य भारत की झलक दिखती। बिहारी कुश्ती के विशेषज्ञ स्टेडियम से ले कर खेल गांव तक इतना तोड़-फोड़ करते कि सारा घाल मेल छुप जाता। यह भी साबित हो जाता कि बिहार में एक ही परिवार में कितने कुश्तीबाज हैं। अपने कुश्ती प्रेम के लिए अपना दल छोड़ सकते हैं। पिता–पुत्र दल बदल सकते हैं। मां का त्याग दिखता कि पुत्र के लिए कुश्ती नहीं लड़ती। पिता का प्रेम दिखता कि पुत्र के लिए नतमस्तक रहता। कांग्रेस पार्टी की उदारता दिखती कि अपना खिलाड़ी न होने पर पराया खिलाड़ी भी ले आती। अब कुश्तीबाजों के दल राष्ट्रीय जनता दल को ही देखिए न। इस दल के दो विचारवान नेता जगदानंद के पुत्र सुधाकर भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार हैं और रघुवंश प्रसाद सिंह के भाई रघुपति कांग्रेस से रघुपति राघव राजा राहुल गा रहे हैं।
यह भी अदभुत कुश्ती होगी कि पिता–भाई अपने पुत्र–भाई को हराने का प्रयत्न करेंगे। उन्हें मध्य प्रदेशीय दिग्विजय सिंह से सीख लेनी होगी कि कैसे उन्होंने 2009 के लोक सभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए अपने भाई को पराजित किया। ऐसी कुश्ती सिर्फ भारत में ही हो सकती है। इसलिए राष्ट्र मंडल में भी इंडिया कुश्ती में जीतता है।
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

