: कुछ बातें बेमतलब 5 : है अपना दल तो आवारा, न जाने किस पर आएगा/नीतीश ने बुलाया, बहुत समझाया, विकास भी दिखाया/उम्मीद भी जताया, भरोसा भी दिलाया, टिकट नहीं ही दिलाया… है अपना दिल तो टिकट का मारा। अब इसे बदल दें। कुछ यूं गाएं। मैं पार्टी का साथ निभाता चला गया/हर टिकट पाने, न पाने को भुलाता चला गया। भटकता हुआ लालू के दर पर भी माथा टिकाया/ कहा उनसे कि मैं तो पार्टी का साथ निभाता चला गया/लालू ने भी ठुकराया/तब आया, कहां-कहां भटके हम इधर-उधर/कांग्रेस का रास्ता भी अपनाया/वहां अपने को हमने रघुपति जैसा न पाया। रघुपति कोई एक नहीं है। मगर रघुपति एक ही हैं। लोहिया से आरंभ कर किशन पटनायक तक पहुंचे थे। बीच में एनजीओ भी हो जाते थे।
जब एनजीओ बहुत ज्ञान देता है। यह एक ऐसा ज्ञान है जिसमें फल भी है। राजनीति में भी फल है। यह फल टिकट के पेड़ पर उगता है। जिनके पास टिकट नहीं होता, वह फलदार वृक्ष नहीं होते। रघुपति के पास पहले से ही फलदार वृक्ष था-रघुवंश प्रसाद सिंह। राजद सांसद हैं। राजद सांसद ही हैं जगदानंद सिंह। इन्हें फलदार वृक्ष नहीं माना जाता। मगर जिन पेड़ों में फल नहीं होता, वह भी कीमती होते हैं। इस हिसाब से जगदानंद ज्यादा कीमती हैं। उनके पुत्र को भी टिकट का फल मिला है। रघुपति को कांग्रेस का और सुधाकर को भारतीय जनता पार्टी का। दोनों पर आरोप नहीं लगा सकते कि अपनी पार्टी में भाईवाद– पुत्रवाद किया।
सुशील कुमार सिंह जदयू के सांसद हैं। उनकी छोटी सी इच्छा थी कि उनके बड़े भाई सुनील को भी विधान सभा का टिकट मिल जाए। नीतीश कुमार ने नहीं दिया। वह राजद का टिकट ले आये। अब दोनों भाई फल खाएंगे। नीतीश कुमार को लालच होगा कि देखो, इन्होंने विकास का फल नहीं चखा। अब भुगते चुनाव लड़ने का कड़वा फल चखने का। ऐसा ही कड़वा फल चखने पर नीतीश कुमार ने मजबूर कर दिया अपने सांसद मोनाजिर हुसैन को। बेचारे सांसदी का फल चखते हुए अपनी पत्नी को विधायकी का फल चखाना चाहते थे। उनकी पत्नी विकास का बासी फल को भूल कर निर्दल का ताजा फल खाने जा रही हैं।
टिकट को ले कर मैं गीता पढ़ रहा हूं। यह ज्ञान की खान है। तू कर्म कर पार्थ। फल की चिंता न कर। विकास का फल नीतीश को खाने दे। अविकास का फल लालू को चखने दे। हम बिहारी किसका फल चखें। तब यही गाने को मन करता है कि दिल जो भी कहेगा मानेंगे/दुनिया में हमारा दिल ही तो है। पर यहां लोग ऐसे भी हैं कि कहते हैं कि यह दिल बदलू भी है और दल बदलू भी। दिल के विशेषज्ञ डाक्टरों ने तय किया है कि दिल के कारण दल बदलने वालों पर शोध किया जाए। उन्हें कोई वालंटियर नहीं मिल रहा है। चुनाव नतीजों के बाद मिल जाएंगे। वरना मेरा दिल तो है ही गाता हुआ, है अपना दिल तो आवारा न जाने किस पर आएगा।
जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

