: चुनाव जीतने के लिए लाखों खर्च कर रहे हैं प्रत्याशी : यूपीए सरकार द्वारा बनाये गये महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट से ग्रामीण क्षेत्रों में कोई खास परिवर्तन दिखाई नहीं दे रहा है और न ही ग्रामीण बेरोजगारों का शहरों की ओर पलायन रुका है, लेकिन इस एक्ट के तहत मुहैया कराये जा रहे धन के लालच के चलते उत्तर प्रदेश में हो रहे पंचायत चुनाव में अप्रत्याशित बदलाव दिखाई दे रहा है। तीन-चार दशक पहले विधान सभा सदस्य का चुनाव लडऩे वाले प्रत्याशी प्रचार पर जितना खर्च नहीं करते थे, उतना खर्च गांव में प्रधान पद के प्रत्याशी करते देखे जा रहे हैं, साथ ही किसी भी हालत में जीतने की लालसा के साथ प्रत्याशी एक-दूसरे का खून भी बहाते देखे जा रहे हैं।
बिहार में भी विधान सभा गठन की प्रक्रिया चल रही है, जिस पर देश भर की नजर टिकी हुई है, लेकिन उत्तर प्रदेश में हो रहे पंचायत चुनाव पर खास नजर इस लिए नहीं है, क्योंकि पंचायत छोटी इकाई मानी जाती है, लेकिन इस छोटी इकाई का ही प्रमुख बनने के लिए जिस तरह से मारामारी मची हुई है, वह आश्चर्यचकित करने के लिए काफी है। मनरेगा में व्याप्त भ्रष्टाचार का ही असर कहा जायेगा कि निवर्तमान प्रधान लाखों में खेल रहे हैं, जो ग्रामीणों से छिपी बात नहीं है, इसीलिए हर कोई प्रधान बनने के लिए लालायित नजर आ रहा है। एक समय ऐसा भी था, जब प्रधान पद के लिए लोग जबरन प्रत्याशी तैयार करते थे और जो पद पर चुन जाता था, उसे खुद भी कभी अहसास नहीं होता था कि वह प्रधान है, पर अब उसी पद के लिए लोग एक-दूसरे की जान लेने में नहीं हिचक रहे हैं। तमाम स्थानों से प्रतिदिन खबरें आ रही हैं कि प्रचार के दौरान विरोधी पक्ष ने गोली मार दी या लाठी-डंडे और छुरी-चाकू चल गये।
इतना ही नहीं, चुनाव किसी भी कीमत पर जीतने के लिए लोग दशकों की जमा पूंजी मांस और शराब आदि में उड़ा रहे हैं। प्रत्याशी जमीन, गहने आदि बेच रहे हैं और दस से पन्द्रह रुपये प्रति सैकड़ा तक का सूदखोरों से कर्ज भी ले रहे हैं, ऐसे में साफ है कि ऐसे प्रधान गांव का उत्थान या समाज सेवा करने के लिए तो प्रतिबद्ध नहीं रहेंगे। चुनने के बाद यह लोग सबसे पहले अपना ही उत्थान करेंगे। शिकायतें भी होंगी और संयोग से जांच में फंस गये तो एक-दो वर्ष के अंदर ही मुकदमा भी दर्ज हो जायेगा। गठन होने के बाद पंचायतों का इससे बेहतर भविष्य नहीं दिख रहा, जिससे सवाल उठता है कि ऐसे गठन से लाभ ही क्या?
प्रदेश में बहुत कम गांव ऐसे मिलेंगे जहां चार-पांच प्रत्याशी ही मैदान हों, अधिकतर गांवों में दस, पन्द्रह और तीस, चालीस तक का आंकड़ा पार हो गया है, जिन सबके बीच चुनने की मारामारी मची हुई है, जिससे प्रत्याशी किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रहे हैं। कई गांवों में देखने को मिला कि बिजली न होने के कारण ग्रामीणों की मांग पर धनाढ्य वर्ग के प्रत्याशियों ने अपने धन से खंबे लाकर गांव में डाल दिये हैं और चुनाव बाद तार डलवाने का वादा कर रहे हैं, तो दूसरे गांव में प्रत्येक खंबे पर एक प्रत्याशी ने लाइट्स लगवा कर अपनी विकास पुरुष की छवि बनाने की कोशिश की है। कई जगह तो आश्चर्यचकित कर देने वाले दृश्य दिखाई दे रहे हैं। एक गांव में अभी तक बिजली नहीं पहुंची हैं। यहां के एक धनाढ्य प्रत्याशी ने किराये पर चार जनरेटर मंगा कर और गांव को चार भागों में बांट कर हर घर में कनेक्शन दे दिया है, जिसका लोग मजा ले रहे हैं, लेकिन ऐसा कब तक होगा और चुनने के बाद ऐसा प्रधान क्या करेगा, इतनी सी बात मतदाता हाल-फिलहात तो समझते नजर नहीं आ रहे हैं, साथ ही इस तरह की हरकतों पर प्रशासन भी अंकुश लगाता नहीं दिख रहा।
स्वच्छ वातावरण में पंचायत चुनाव कराने की जिम्मेदारी सरकार से ज्यादा चुनाव आयोग की ही होनी चाहिए, लेकिन प्रदेश चुनाव आयोग की कहीं कोई भूमिका अभी तक तो नजर नहीं आ रही। चुनाव में जिला अधिकारी को ही जिला निर्वाचन अधिकारी का खिताब मिल जाता है, जो सत्ता के अधीन ही दिखाई दे रहे हैं, जिससे वह समुचित कड़ाई नहीं कर पा रहे हैं। कड़ाई की तो बात ही छोडिय़े, आदर्श आचार संहिता तक का पालन नहीं कराया जा रहा है। कानून का डर न होने के कारण ही गांव की गलियां शाम होते ही मयखाना नजर आने लगती हैं, लेकिन सब कुछ जानते हुए भी कोई कुछ नहीं कर पा रहा है। बस, यही है लोकतंत्र की रीढ़ कही जाने वाली पंचायतों के गठन का सच। कल को यही प्रधान, प्रमुख पद के लिए, विधान सभा व लोकसभा सदस्य के साथ मंत्री बनने तक की दावेदारी पेश करते नजर आयेंगे। हो सकता है कि मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक की कुर्सी तक भी इनमें से कोई पहुंच जाये, इनमें से कुछ ऐसा प्रयास भी जरुर करेंगे और देश का भला करने की कसमें भी खायेंगे, लेकिन फिर वही सवाल कि लूट की मानसिकता के साथ राजनीति में पदार्पण करने वाले यह लोग देश का भला आखिर कैसे कर पायेंगे?
समाज में अब आम धारणा बनती जा रही है कि समाज सेवा के लिए राजनीति और राजनीति के लिए लाभ का पद होना बेहद जरुरी है, जब कि समाज सेवा के लिए किसी भी तरह के पद का होना कोई सामाजिक या संवैधानिक नियम अथवा बाध्यता नहीं है, इसके पीछे यही लूट की मानसिकता है, जो आज कल चुनाव के दौरान दिखाई दे रही है। धन्य हैं, ऐसी सोच वाले प्रत्याशी और उनसे भी ज्यादा धन्य हैं, ऐसे भ्रष्टाचारियों को चुनने वाले मतदाता। काश! भ्रष्ट प्रत्याशियों की इस सोच के बारे में भोले मतदाताओं को कोई समझा पाता।
लेखक बी पी गौतम स्वतंत्र पत्रकार हैं.

