बिहार में इन दिनों पंचायत चुनाव चल रहा है। चारों ओर चिल्ल-पों मची है। सबलोग मुखिया बनना चाहते हैं। इसके लिए सभी तरह के हंथकंडे अपनाए जा रहे हैं। जिसमें धनबल और बाहुबल तो आम बात है। क्योंकि मुखिया, सरपंच और पंचायत प्रतिनिधि बनने का फायदा लोगों ने इन पांच सालों में देख लिया है। अब चुनाव जीताऊ हथकंडे में एक और हथकंडा शामिल हो गया है। वह है चमड़ी का। समझे नहीं आप। गर्म गोस्त का। अब जो शख्स अपने आपको को वोट मैनेजर कहता है उसे शराब, कबाब के साथ शहर में शबाब की भी व्यवस्था की जा रही है। मात्र तीन दिनों में मुजफ्फरपुर शहर के आवासीय इलाकों में चलने वाले दो सेक्स रैकेट गिरोह का पर्दाफाश हुआ है। इस कांड में जो महिलाएं और पुरुष गिरफ्तार हुए हैं उनके बयान काफी चौंकाने वाले हैं।
मंगलवार 27 अप्रैल को नगर थाना के इलाके के बालूघाट में एसएसपी राजेश कुमार के नेतृत्व में छापेमारी की गई। जहां कई पुरूष और महिलाएं आपत्तिजनक अवस्था में पाए गए। हालाकि पुलिस इन पर देह व्यपार अधिनियम के तहत कार्रवाई कर रही है। वैसे तो मुजफ्फरपुर में एक विश्वप्रसिद्ध बदनाम इलाका है चतुर्भुज स्थान। चतुर्भुज नाम भगवान विष्णु के एक पुराने मंदिर के नाम पर पड़ा है। आज भी वह मंदिर जीर्ण अवस्था में स्थित है। लेकिन पंचायत चुनाव में बह रहे काले पैसे ने लोगों को ऐसा बउरा दिया है कि शहर के कई मुहल्लों में इस तरह के धंधे शुरू

सेक्स रैकेट में पकड़ी गईं महिलाएं
पंचायत में चुने जाने का लालच विधायक और एमपी से ज्यादा लोगों को लुभा रहा है। बिहार में विधायकों के फंड खत्म हो गए। लेकिन पंचायत स्तर पर बिहार में हुई शिक्षक बहाली और कल्याणकारी योजनाओं में पंचायत प्रतिनिधियों ने भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के सारे मायने बदल दिए हैं। यदि हिम्मत हो तो नीतीश सरकार जांच कराकर देख ले। कई जिलों में कितने मुखियों ने शिक्षक बहाली के नाम पर यौन शोषण किया। पत्नी कहने को मुखिया और पार्षद बन जाती हैं, लेकिन बागडोर पति के हाथ में होता है। यहां तक कि महिला जनप्रतिनिधि को फोन कीजिए तो फोन भी उनके पति उठाते हैं। एपीएल, बीपीएल, अत्योदय, अन्नपूर्णा, इंदिरा आवास से लेकर बीआरजीएफ तक की सभी योजनाओं में कमीशनखोरी तय है। चारों ओर बस भ्रष्टाचार का बोलबाला है। राज्य के सभी जिलों में पंचायत प्रतिनिधियों का कमोवेश यही हाल है। लोग देख रहे हैं कि कल तक जो साइकिल पर घूमता था मुखिया बनते ही स्कार्पियो और बोलेरो पर चढ़ने लगता है।
पंचायत शब्द पंच से मिलकर बना है। हमें याद है। वह कालजयी कहानी। जिसे प्रेमचंद ने लिखी थी। पंच परमेश्वर। वह कहानी नहीं थी। एक ऐसा संदेश था जो समाज के उस पहलू को दर्शाता है जहां पंच न्याय शब्द का पर्यायवाची बन जाता है। जुम्मन की दुश्मनी मिट जाती है। इंसाफ की जीत होती है। लेकिन अब इंसाफ या पंचायत जैसी पवित्र संस्था में किसी का यकीन नहीं है अब तो सिर्फ जितना जिसे नोच सको।
लेखक आशुतोष कुमार पांडेय टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

