मेरी कोई जाती दुश्मनी नहीं है.. प्रभु चावला से। न कभी होगी। यह दुर्भाग्य है, देश के उन संस्थानों का जो नई पीढ़ी को बताने और सिखाने के लिए इस तरह के पत्रकारों से उन्हें रु-ब-रु कराया जाता है। देश में सुरेश डुग्गर। राम बहादुर राय। और भी बहुत पत्रकार हैं। जो नई पीढ़ी को सही दिशा और ज्ञान के अलावा पत्रकारिता की पवित्रता को समझा सकते हैं। लेकिन नहीं। हालांकि प्रभुजी तो सीधी बात करते रहे हैं…। मैं भी सीधी बात करता हूं… हिम्मत हो तो आएं आगे.. मीडिया के वो मठाधीश… दे जबाब उन लाखों स्ट्रिंगरों का। जो जान पर खेलकर स्टोरी करते हैं। और उसमें स्िक्रप्ट के साथ शब्दों से थोड़ा उलटफेर करके एअरकंडीशन में बैठने वाले टीआरपी बटोरते हैं। प्रमोशन भी ले लेते हैं। कोई नहीं आएगा सामने। लेकिन एक शर्त है.. जो सामने आए उसमें एक पवित्रता होनी चाहिए..।
वह मालिक का पिठ्ठू नहीं हो। उसने किसी का शोषण नहीं किया हो। वह देश और समाज के प्रति इमानदार हो। उसकी संस्था में पत्रकारों की बहाली लोकतांत्रिक तरीके से हुई हो। उसके यहां भाई-भतीजावाद और साले-साढू की नियुक्ति उसके चैनल में न हो। है कोई पवित्र। जबाब नहीं में आएगा। क्योंकि हंस के कुछ साल पहले निकले मीडिया विशेषांक का वह अंक मैंने भी पढ़ा था.. जिसमें एक महाशय ने अपनी भड़ास निकालते हुए लिखा था.. कि यहां काम करने का मतलब.. करो कम दिखाओ ज्यादा होता है। याद है प्रभु जी…।
अब जरा आप गौर से खुशवंत सिंह जी की आत्मकथा को पढ़ लिजिएगा। जिन्होंने हिन्दुस्तान टाइम्स छोड़ने के बाद सार्वजनिक रुप से कहा था कि हिन्दुस्तान अखबार में मूर्खों की टोली भरी है। यह मैं नहीं कह रहा हूं। बिड़ला जी पहुंचे थे खुशवंत को मनाने के लिए। किसी की पैरवी आती थी और बिड़ला जी उसे पत्रकार बना देते थे। इस मामले में चट्टान रहे इंसान के बारे में भी आपको पता होगा। रामनाथ गोयनका। जब इंडियन एक्सप्रेस के संपादक मुलगांवकर थे और उस समय इंदिरा गांधी सत्ता में नहीं थी। बिहार के बेलछी में नरसंहार हुआ था और इंदिरा हाथी पर सवाल होकर बिहार गई थीं। उस समय जब इंडियन एक्सप्रेस ने इंदिरा को पहले पेज पर फ्लायर करके छापा तो.. तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरार जी देसाई ने गोयनका को फोन किया था.. कैसे छप गई यह खबर। तब गोयनका ने क्या कहा था.. मालूम है आपको.. नहीं… तो हम बता देते हैं.. गोयनका का जबाब था.. मोरार जी भाई यह सब मामले मेरे संपादक मुलगांवकर देखा करते हैं आप उनसे बात कर लीजिए।
आपको ही या पत्रकारिता के किसी भी हाउस को आज प्रधानमंत्री का फोन आ जाए.. क्या आप थमा देंगे फोन अपने रिपोर्टर या संपादक को। नहीं..। वह ताकत और वह जीवटता आज नहीं है। पवित्रता का लाबादा ओढ़कर अब पत्रकारिता में हाईटेक दलाली हो रही है। उसे युवापीढ़ी तो अभी समझ भी नहीं पाई है। उसमें क्या सड़ेगा। सड़ रहे हैं… वो जो होंडा सिटी और शीशे के भीतर से पत्रकारिता करते हैं। हम नहीं सड़ेंगे। जान चली जाएगी। लेकिन सच्चाई तो निकलेगी ही। क्योंकि हम तो भूखे पेट हैं। हमारा पेट भरा नहीं। देहात और छोटे शहरों में एक प्रेस कांफ्रेस में पेन लेने के लिए किसी अखबार और क्षेत्रीय टीवी चैनल का रिपोर्टर क्यों लड़ जाते हैं। कभी सोचा आपने। क्या उन्हें कार्यालय से पेन भी नहीं मिलता। पूछिए गया और जहानाबाद के अलावा किशनगंज, पूर्णियां, अररिया जहां के पानी में 22पीपीएम आयरन यूनिट है। वहां भरी दुपहरी और ठंड के दिनों में पैकेज रिपोर्ट कैसे आती है। बड़ा अच्छा लगता है किसी सेमिनार में दो शब्दों का बोलना। लेकिन उन्हीं शब्दों को विस्तार से जब चित्र बनाकर देखिएगा तो आंखें फट जाएंगी..। मुझे इंतजार है आपके जबाब का।
लेखक आशुतोष कुमार पांडेय टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.

