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बापू देख रहे हो ना..

देशपाल सिंह पंवार तू खड़ा होके कहां मांग रहा है रोटी, ये सियासत का नगर सिर्फ दगा देता है (गोपाल दास नीरज)। फिलहाल सियासत से अपने वास्ते तो बाबा ने नहीं मांगी थी रोटी। हां जिनकी नीयत और नीत है खोटी। सोच है छोटी, काली कमाई कर चुके हैं मोटी-वे कैसे छीनने देते अपनी बोटी- शातिर दिमाग से चल डाली गोटी। अब चाहे गालियां पड़ रही हों कोटि- कोटि, पर वे तो मस्ती में काट रहे हैं चिकोटी। सबसे बड़े लोकतंत्र की मान मर्यादा, इस देश की आन-बान-शान पर दाग के गान चाहे आज सारी दुनिया में गूंज रहे हों पर परवाह किसे है? कम से कम उन नेताओं को तो नहीं जिनके हाथों में ताकत है। अपने तरीके से सियासत की पारी खेलने वालों की चाहत कब आम आदमी के लिए राहत की बारी आने देती है। हमेशा की आफत-बदतर हालत- गरीब की शामत-नसीब की गारत गाथा ही तो लिखती आई है।

देशपाल सिंह पंवार तू खड़ा होके कहां मांग रहा है रोटी, ये सियासत का नगर सिर्फ दगा देता है (गोपाल दास नीरज)। फिलहाल सियासत से अपने वास्ते तो बाबा ने नहीं मांगी थी रोटी। हां जिनकी नीयत और नीत है खोटी। सोच है छोटी, काली कमाई कर चुके हैं मोटी-वे कैसे छीनने देते अपनी बोटी- शातिर दिमाग से चल डाली गोटी। अब चाहे गालियां पड़ रही हों कोटि- कोटि, पर वे तो मस्ती में काट रहे हैं चिकोटी। सबसे बड़े लोकतंत्र की मान मर्यादा, इस देश की आन-बान-शान पर दाग के गान चाहे आज सारी दुनिया में गूंज रहे हों पर परवाह किसे है? कम से कम उन नेताओं को तो नहीं जिनके हाथों में ताकत है। अपने तरीके से सियासत की पारी खेलने वालों की चाहत कब आम आदमी के लिए राहत की बारी आने देती है। हमेशा की आफत-बदतर हालत- गरीब की शामत-नसीब की गारत गाथा ही तो लिखती आई है।

पहले गोरे इस देश को लूट ले गए, आजादी के बाद काले लूटने में जुट गए। लाख टके का सवाल यही पैदा होता है कि बड़े लुटेरे और डकैत कौन? गोरे या काले? 65 साल में सियासत के इस जाल ने देश व जनता को जिस तरह कंगाल किया वो किससे छिपा है? गुदड़ी के ये लाल-बजाते रहते हैं गाल-दूसरों की ढाल-घिनौनी चाल से बनाते रहते हैं माल। जनता का बिगड़े हाल या देश हो हलाल ये तो हमेशा दिखाते आए हैं कमाल। क्या बाबा को पता नहीं था? अगर अब तक पता नहीं चल पाया था तो बाबा वास्तव में बाबा हैं, दैवीय शक्ति हैं, राम के देव हैं। वरना इस देश में आजादी के बाद कौन ऐसा है जिसको नेताओं और राजनीति ने इस दलदल में ढेला ना हो? जिसने इसे झेला ना हो? जिसके साथ ऐसा खेल खेला ना हो? अगर इस देश में सियासत की दगाबाजी का मेला हर समय हर जगह हरेक को नजर आता हो वहां बाबा कैसे इससे नावाकिफ रहे?अगर बाबा को सियासत की दगाबाजी का पता था तो फिर उन्होंने उन नेताओं पर विश्वास कैसे कर लिया जिनकी दगाबाजी के इतिहास से सारा देश वाकिफ है?

आजादी के बाद जिस दल के तमाम नेताओं ने जनता के विश्वास को अनगिनत बार छला हो वहां कैसे और किस बिना पर बाबा विश्वास की आस लगा बैठे थे? यहां जो इनके हिसाब से चले वो पास व खास बाकी जो इनकी इच्छा के विपरीत मांगने बैठ जाए वो हताश-निराश-उदास। सारा देश इस घास को खाकर बदहवास है। अब बाबा इसी श्रेणी में हैं। आम आदमी की तरह। हां उन्हें मौजूदा झंझट से मुक्ति के बाद ये जरूर सोचना पड़ेगा कि आखिर उन्होंने उस दल के नेताओं पर विश्वास क्यों किया जहां हमेशा छल होता रहता है। मल बहता रहता है। कोई गल जाता है। कोई जल जाता है। कोई चल जाता है। दिल्ली में जो हुआ, देश में जो हो रहा है क्या बाबा को अब राजनीति के दल दल का एहसास हो चुका है? पता चल चुका है? अगर हां तो सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वे अब किसी दल के दलदल में फंसना चाहेंगे? जिनसे नजदीकी के आरोप लग रहे हैं उनके साथ बसना चाहेंगे? राजधानी के अखाड़े में अलग से रमना चाहेंगे? या फिर राजनीति के इस घिनौने रूप को देखकर अपनी नासमझी पर हंसना चाहेंगे? आगे अति आत्म विश्वास से बचना चाहेंगे? योग से कैंसर का इलाज चाहे आसान हो पर करप्शन के कैंसर का इलाज कितना मुश्किल है बाबा और उनके अनुयाइयों को अब समझ में आ गया होगा। करप्शन के कैंसर का लाइलाज मरीज ये देश ठीक होना चाहता है पर करप्शन के कैंसर के वायरस उसका इलाज शुरू करने ही नहीं देंगे तो कोई बाबा क्या करेगा?

बाबा को अगर अब तक समझ में नहीं आया तो सरकार जिस रास्ते को अख्तियार कर चुकी है, देश की इज्जत से पहले अपनी फजीहत बचाने के वास्ते बाबा को राजनीति के रास्ते पर जाना ही होगा। नहीं जाते हैं तो सियासत उन्हें चैन से जीने नहीं देगी। जाते हैं तो बाबा की पदवी गंवानी होगी। कारण-योगी को राजनीति का रोगी बताने और कमाने वाले इतना कीचड़ तो उछाल ही देंगे कि कोई उन्हें बाबा कहने से पहले दस बार सोचे। कांग्रेसी तो चाहते यही हैं कि बाबा राजनीति में आएं पर बीजेपी के साथ नहीं। अकेले आएंगे तो बीजेपी के ही वोट बैंक को काटेंगे। सोचिए सत्यानाश की हालत में चाहत पूरी करने की कुव्वत सियासतदां के अलावा और किसमें हो सकती है? अब ये मसला केवल सत्याग्रह व अनशन तक सीमित नहीं रह गया है। बाबा के सामने अब फेस सेविंग कोई मुद्दा नहीं, खुद के जीवन की सारी सेविंग को बचाना और इस मिशन को आगे बढ़ाना ही अहम मसला है। पर इधर कुआं-उधर खाई। क्या करना है सब तय तो बाबा को ही करना है। हां ये तय है कि इस मोड़ से आगे तो जाया जा सकता है। पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं।

गलती बाबा ने कम नहीं की। एक आम आदमी में जो जलन होती है। वो इस बाबा में कहीं ज्यादा है। जब अन्ना हजारे एक झटके में सारी दुनिया में दूसरे गांधी की श्रेणी में खड़े हो गए। बाबा का धैर्य जवाब दे गया। बाबा को लगा वे तो अन्ना से हर मामले में आगे हैं। फिर वे पीछे क्यों रहें? बापू के बाद बाबा का ही नाम गूंजे। ऐसी चाह दिल के कोने से निकली, जज्बात व ख्यालात में बदली और दिल्ली कूच का ऐलान कर बैठे। वो ये सच नजरअंदाज कर बैठे कि अन्ना फकीर हैं और वो सबसे बड़े अमीर। इस देश की जनता फकीरों को ही ईमानदार मानती है। अपना अक्स खोजती है। निस्वार्थ उनके साथ चलती है। पीछे दौड़ती है। अमीरों के साथ वो ज्यादा दूर तक नहीं जाती। दस साल में बाबा ने जो चाहा। उससे ज्यादा पाया। और ज्यादा की चाह की थाह कांग्रेस को बखूबी थी। कांग्रेस ने हवा देने में देरी नहीं की। दिल्ली की सल्तनत जानती थी कि बाबा को काबू में करना जितना आसान है अन्ना पर हाथ डालना उतना ही कठिन। बस कांग्रेस ने बाबा को मोहरा बनाया। अन्ना के सामने खड़ा करने का प्लान बना डाला।

दिल्ली एयरपोर्ट पर सत्याग्रह के वास्ते चार मंत्री बाबा से मिलने नहीं गए थे। कड़वा सच यही है कि आखिर तक बाबा पर ये दबाव डाला जाता रहा कि वे अन्ना के मिशन पर अटैक करें। सरकार उनकी मांग मान लेगी। अन्ना ने बाबा को सचेत तक कर दिया था। बाबा जन समर्थन के जोश में दिल्ली तो चले गए पर जब सियासत की असली मंशा का एहसास हुआ और होश आया तो उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा था। हर तरह की धमकी दी गई। बीजेपी व संघ का एजेंट बताने से लेकर उनके ठिकानों पर छापों तक की बात कही गई। इस मोड़ पर बाबा सब छोड़ कर कैसे जा सकते थे? सरकार ने जो तस्वीर बाबा को होटल में कागज पर दिखाई थी तेवर बदलते ही वो रामलीला मैदान पर असलियत में दिखा तक दी। बाबा की सबसे बड़ी गलती यही है कि उन्होंने अन्ना का साथ नहीं दिया। क्या अब बाबा इस दूरी को पाटने में एक कदम आगे बढ़ाएंगे? दोनों से देश बड़ा है। यह बाबा को समझ में आ जाना चाहिए। अन्ना तो पहले से ही जानते हैं।

अब बात उस रात की। मैदान रामलीला-हो रावणलीला,किसे दोष दिया जाए? घोर कलयुग को? लोकतंत्र को? सत्ता के मद को? चंद मंत्रियों की नासमझी को? चोर राजनेताओं के शोर को? धन की लूट करने वाले नेताओं के झूठ को? बाबा के अति आत्मविश्वास को? जनता को? दिल्ली पुलिस को? या इस देश की किस्मत को? जिसे चाहे, जितना कोसते रहो, जो होना था वो हो चुका। जो होना है वो होगा। पर सवाल इतने पैदा हो चुके हैं कि उनका जवाब आम आदमी दो पल में दे सकता है पर बेहया सियासत लूट को दबाने के वास्ते इतने झूठ दर झूठ बोलती रहेगी कि इन सवालों के जवाब मांगने-चाहने-सुनने से सपनों में डर लगने लगेगा। सियासत यही तो चाहती आई है। सियासत यही तो चाहती थी। बाबा के फेवर और सरकार के तेवर में आज कहां है करप्शन का मुद्दा, कहां है काले धन का मसला? कहां है करप्शन के कैंसर के इलाज का डाक्टर? कहां है लोकपाल बिल की बात? सियासत का पुराना फंडा है, किसी घपले-घोटाले को दबाना है तो कोई दूसरा सुर छेड़ दो। गैर जरूरी मुद्दे मेड़ दो। दिल्ली में यही हुआ। सियासत के वीर-एक ही तीर से गए सबको चीर-अब बहाते रहो सब नीर-दबाते रहो पीर-सियासतदां मीर-बाकी जनता हीर।

सरकारी किताब में हिसाब-खिजाब-खिताब सब उसका पर अगर राजनीति में कहीं कोई मर्यादा बची है, इस देश में लोकतंत्र है, ये गांधी का देश है, राजनेता गांधी को मानते हैं तो कुछ सवालों के जवाब तो बात की जगह हाथ-लात चलाने वालों को देने ही होंगे। आज नहीं तो तीन साल बाद। सवाल उनकी कथनी व करनी में अंतर ने ही पैदा किए हैं। सारे सवाल झूठ दर झूठ ने पैदा किए हैं।

1- सरकार कहती है हमसे योग कैंप की इजाजत ली गई थी। सरकार बताए किस योग कैंप से पहले बाबा को रिसीव करने को मंत्रियों ने चक्कर काटे? किस योग कैंप को रोकने की इस देश में जरूरत पड़ी? अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता के बाद बाबा चिल्ला रहे थे- दिल्ली में सत्याग्रह करूंगा। सरकार को पता था। उसकी चाल में बाबा ढाल नहीं हुए तो योग कैंप की दलील दे डाली। कपिल सिब्बल के हाथ में डील की चिट्टी और बाबा को धोखेबाज कहने से बड़ा सच और क्या होगा कि वहां सत्याग्रह होना था। फिर कैंप की आड़ लेकर मंजूरी कैंसिल करने का ढोंग क्यों? क्या बाबा की वजह से दिल्ली में दंगा हो सकता था? सरकार अगर तीन दिन चुप रह जाती तो डील के खत से वैसे ही बाबा की बोलती बंद हो जाती। फिर धैर्य खोने का मतलब? या तो कांग्रेस का थिंक टैंक रिस चुका है या फिर काले धन पर फंदे का गंदे नेताओं को डर सताने लगा था? कुछ तो है वरना जिस राज में बरसों तक घोटाला और घपला करने वालों को छुआ तक नहीं जाता, किसी फाइल को खोला नहीं जाता वहां इतनी जल्दी का राज क्या है? जनता तो समझ चुकी है। कांग्रेसियों की एक मंडली नहीं चाहती कि करप्शन और कालेधन पर कोई गन तनकर मन को और विचलित करे। उन्होंने ही बाबा को संघी एजेंट बताकर सारा गुड़ गोबर कर डाला। कांग्रेस में अब कौन पावरफुल है? ये सवाल हर किसी के मन में कौंध रहा है?

2- रावण लीला को सही ठहराने के पीछे की दलील- बाबा की हत्या की आशंका थी। अगर सरकार को डर था तो बाबा की सुरक्षा बढ़ाते। ये कानून की जिम्मेदारी है। ये हर किसी का संवैधानिक अधिकार है। उल्टे जो दिल्ली पुलिस ने किया उसे किस तरह जायज ठहराया जा सकता है? अगर बलवे का डर था। सुबह जनता को हैंडिल करना मुश्किल नजर आ रहा था तो रात में रामलीला मैदान में पुलिस को पहले सबको सचेत करना चाहिए था। वार्निंग देनी चाहिए थी। हजारों लोगों का रात में कहीं रहने का बंदोबस्त करना चाहिए था। ये कहां का लोकतंत्र है कि रात के अंधेरे में बिना चेतावनी बच्चों, महिलाओं, औरतों और बुजुर्गो पर लाठियां चलाई जाएं। गालियां दी जाएं। लातों और डंडों से पीटा जाए। महिलाओं की बेइज्जती की जाए। क्या यही गांधी का देश है? क्या यही लोकतंत्र है कि रात में हजारों लोगों को अपने देश में सड़क पर धक्के खाने को छोड़ दिया जाए? क्या बंद कमरों, तंबुओं में आंसू गैस का उपयोग किया जा सकता है? कानूनन तो नहीं हां मनमर्जी हो तो सब जायज है। अगर मंच पर लगी आग फैल जाती, अफरातफरी किसी हादसे की ओर ले जाती, रात में सड़कों पर धक्के खाती जनता के साथ कोई अनहोनी हो जाती, उस रात हजारों लोग मौत के मुंह में चले जाते तो कौन जिम्मेदार होता? बाबा गलत थे, उनकी जिद गलत थी तो बाबा को सजा देते, उस जनता को क्यों? जो सही कारण के लिए आवाज उठाने आई थी। क्या ये आवाज लाठियों और गोलियों से बंद करना लोकतंत्र है? क्या गांधी की कमाई खाने वाली पार्टी को एक बार बापू की याद नहीं आई? अगर यही लोकतंत्र है तो एक बार इसके बारे में सोचने की जरूरत है।

3- दिग्विजय सिंह कहते हैं बाबा ठग हैं। कैंसर का इलाज करने का ढोंग करते हैं। संघी हैं। जनता को धोखा देते हैं। अगर बाबा ठग हैं तो इतिहास में कौन सा ऐसा उदाहरण है कि एक ठग को लेने चार-चार मंत्री एयरपोर्ट गए हों। दिग्गी राजा के इस बयान का बाजा पल में मीडिया उड़ा सकता था पर शायद इस तकरार में मीडिया अपने फायदे के रास्ते पर है। अगर बाबा ठग है तो कांग्रेस के तमाम नेता इस ठग के सामने हाथ जोड़कर-पैर छूकर आर्शीवाद लेने को लाइन क्यों लगाए रहते थे? सबकी तस्वीरें मीडिया के पास हैं। पर दिखाएगा कौन? जो काले धन या करप्शन पर आवाज उठाता है सबसे ज्यादा दिग्विजय सिंह ही बोलते हैं। क्यों? इस क्यों की तह में मीडिया को नहीं जाना चाहिए? कहीं बाबा व अन्ना जो शक जाहिर कर रहे हैं उसकी जद में वो तो नहीं हैं? काले धन व करप्शन की बात करते ही चंद नेताओं के पेट में ही दर्द क्यों होने लगता है? जांच का विषय है? हसन अली के पासपोर्ट को लेकर जिस अमलेंदू पांडेय से ईडी ने पूछताछ की है वो कांग्रेस में किसके ज्यादा करीब है, किस नेता के सारे काम वो देखता आ रहा था यह ना तो कांग्रेसियों से छिपा है और ना ही पत्रकारों से पर मुंह खोलेगा कौन?

4- कपिल सिब्बल कहते हैं कि रामदेव को सिर्फ योग करना चाहिए। किसी योगी का राजनीति में क्या काम? क्या कपिल सिब्बल या ऐसी ही बातें करने वाले नेता राजनीति का पट्टा लिखवाकर आए थे? फिर सिब्बल खुद वकालत ही क्यों नहीं करते रहे? लोकतंत्र में ऐसी बातें करने वालों के पास या तो सोच नहीं हैं। या फिर वे जनता को बेदिमाग समझते हैं। खुद करें तो सही दूसरा करे तो गलत। दूसरे की कमीज हमसे सफेद क्यों? सब उजली कमीजों को निशाना बनाने में जुटे हैं, ना जाने इस देश का क्या हश्र होगा?

5- अपने कर्मों से बिहार में अपनी राजनीतिक जमीन में कांटे उगाने वाले एक और नेता अरसे बाद प्रकट हुए। लालू प्रसाद कहते हैं-बाबा ढोंगी हैं। योगी हैं तो योग करें। राजनीति में क्या काम? आना है तो खुलकर आएं। देखते हैं संसद से कैसे बिल पास कराते हैं। घर में नहीं हैं दानें और अम्मा चली भुनाने-लालू से कोई पूछे कि संसद में कितने हो? फिर क्या करप्शन व कालेधन के खिलाफ आवाज उठाने के वास्ते राजनीति में आना जरूरी है? महात्मा गांधी तो राजनेता नहीं थे। फिर उनके पीछे ये देश क्यों चला? जिस बापू ने देश को आजाद कराया क्या कोई अन्ना या कोई बाबा काले धन और करप्शन के खिलाफ आवाज नहीं उठा सकता? क्या इस पर बोलने के वास्ते राजनीति के दरवाजे खोलने जरूरी हैं? सवाल यही पैदा होता है कि क्या लालू गांधी को जानते हैं? क्या उन्हें मानते हैं? अगर नहीं तो कुछ कहना फिजूल है वरना ऐसी बातों का क्या मतलब? वैसे लालू की ढेरों बातों का कोई मतलब नहीं होता। वो आज बाबा को कोस रहे हैं। कोई उनसे पूछे कि पटना के गांधी मैदान में बाबा के सामने वे नतमस्तक क्यों थे? पतंजलि पीठ के उदघाटन समारोह में बाबा के कसीदे क्यों पढ़ रहे थे? बाबा के दवा कांड में वे खुद बाबा की हवा बना रहे थे। अब अचानक ऐसा क्यों? कहीं कांग्रेसी दरबार में री एंट्री के लिए तो ये सब नहीं कर रहे हैं। बिहार में तो अब सत्ता में उनका पत्ता हिलने वाला नहीं-क्या दिल्ली में ही फटा लत्ता फिर पहनने लायक बनाने की जुगत में तो नहीं हैं? बाबा को राजनीति में कूदने को शायद इस वास्ते उकसाया जा रहा है कि कुछ दिन बाद वो इसी रंग में रंगे नजर आएंगे। यानी सियासत का अपना ढंग, अपना रंग-जहां करप्शन की घुली है भंग- ज्यादा कमाने पर नहीं होती कोई जंग।

6- जनार्दन द्विवेदी हों या दूसरे कांग्रेसी-बाबा को गरियाने और कोसने में जुटे हैं। अचानक सारे खोट बाबा में क्यों नजर आने लगे। बाबा की सारी फाइलें अब क्यों खोलने की बात करने लगे? अगर बाबा और उनके शिष्यों ने गलत ढंग से धन कमाया तो बाबा को सजा दो पर पहले उन मंत्रियों, अफसरों और नेताओं को सजा मिलनी चाहिए जिनके सहारे बाबा ने इस अकूत संपत्ति को खड़ा किया। तब बाबा ईमानदार थे। अब बाबा बेईमान हैं। अगर हैं तो उनकी सारी कमाई देश में है- सरकार जब चाहे जब्त कर सकती है, बाबा को जेल में डाल सकती है पर नेताओं और धंधेबाजों की काली कमाई जो विदेश में पड़ी है पहले उससे इस देश को तो बचाओ। करप्ट नेताओं को तो हथकड़ी पहनाओ। जनता को ये विश्वास तो दिलाओ कि देश की चिंता है।

7- सबसे बड़ा सवाल ये है कि रात की रावणलीला के बाद अगले दिन तक इस देश के प्रधानमंत्री ने मुंह क्यों नहीं खोला? देश अगर अरब देशों की तरह जनक्रांति की ओर बढ़ता नजर आ रहा हो तो ऐसे में क्या सरकार का मुखिया होने के वास्ते उन्हें फ्रंट में नहीं आना चाहिए था। देश की जनता उस दिन यह जानना चाहती थी कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? उस दिन मनमोहन सिंह के बोलने के अलग मायने होते? पर शायद यही उनकी विवशता है। वे कदापि समय पर सही जगह सही बात करते नजर नहीं आते। बोलना तो उस दिन सोनिया गांधी को चाहिए था। पर वो क्या बोलतीं? कुछ करना तो उस दिन युवराज को चाहिए था। वो युवराज जो 8 साल से इस पार्टी को आगे बढ़ाने में हर हथकंडा अपना रहा था। यूथ उसे अपना हीरो मान रहा था। गरीब-गुरबे-मजदूर-किसान उसमें सही तस्वीर देखने लगे थे। वो नोएडा के किसानों में जा सकता है पर चंद कदम की दूरी पर जब उसकी पार्टी के राज में निहत्थों पर जुल्म ढाए जाते हैं तो इस युवराज के पास समय नहीं होता। माया के राज में लाठियां चलें तो गलत, कांग्रेस के हाथ से लाठियां-गोलियां चलें तो सही। अब किस बिना पर ये युवराज माया राज को जंगलराज कहेगा? क्या बीजेपी और दूसरे दलों के ये आरोप अब सही साबित नहीं होते कि किसानों के घावों पर मरहम लगाने का उनका कदम राजनीति की नौटंकी था। सवाल ये उठता है कि क्या राहुल गांधी की आठ साल की कमाई कांग्रेस आठ घंटों में गंवा चुकी है?

8- लोकतंत्र की विडम्बना कहिए, या राजनीतिक धींगामश्ती। अगर कोई शख्स दिल्ली के लिए खतरा हो सकता है, तो फिर उसे हरिद्वार क्यों ठेला गया? क्या हरिद्वार काला पानी है? क्या हरिद्वार इस देश का हिस्सा नहीं है? क्या हरिद्वार में बाबा की वजह से कोई दंगा-फसाद होता है तो क्या ये केंद्र सरकार की जिम्मेदारी नहीं है? फिर क्या सोचकर दिल्ली की सियासत ने उन्हें हरिद्वार तड़ीपार किया? बाबा ना तो कोई अपराधी हैं? ना उनके पास वीरप्पन जैसी डकैतों की फौज। फिर क्यों दिल्ली में घुसने पर पाबंदी लगा दी गई? क्या दिल्ली तक ही सारा देश सीमित है? क्या सिर्फ दिल्ली को बचाने तक ही केंद्र सरकार का दायरा है? क्या लोकतंत्र में ये जायज है? देश के किसी हिस्से में कोई जा सकता है। रह सकता है। रोजी-रोटी कमा सकता है। किसी शरीफ को कहीं जाने से रोकने का किसे हक है? बसपा सरकार को ही ले लीजिए। दिल्ली के अत्याचार पर वो दिन में कांग्रेस पर निशाना साध रही थी पर शाम होते-होते उसे बाबा में कांटे नजर आने लगे। बाबा यूपी की सीमा में नहीं घुस सकते। क्यों क्या वो किसी का कत्ल करने जा रहे थे? क्या वो आतंकवादी थे? मायावती ने ये फैसला क्यों लिया इसका एहसास सबको है। वैसे कानून की किस किताब में धरना-प्रदर्शन-सत्याग्रह गुनाह है? लोकतंत्र में अपनी आवाज उठाने का इसके अलावा और क्या माध्यम जनता के पास बचता है? सरकारें क्या ये अपनी जनता को बताने की जहमत उठाएंगी? हरियाणा सरकार कहती है कि वो उसकी धरती से दिल्ली नहीं जा सकते। मनमोहन सरकार अन्ना से कहती है कि वो जंतर-मंतर पर धरना नहीं दे सकते। यानि अब धरतियां सत्ताधारी दलों की हो गई। देश और जनता की नहीं। बापू देख रहो ना। ज्यादा समय नहीं गुजरा है पाकिस्तान के फौजी शासन पर हम चुटकियां लिया करते थे पर सियासत के कदम क्या साबित कर रहे हैं? शुक्र है बस फौज को नहीं घसीटा गया। बापू के देश में अगर इसी राह पर सियासत को चलना है तो फिर इस देश में लोकतंत्र का ढोंग क्यों किया जा रहा है? अगर सब संघ और बीजेपी के इशारे पर हुआ तो फिर इस दल को राजघाट पर अनशन की अनुमति क्यों दी? क्या बाबा बीजेपी से ज्यादा खतरनाक हो गए?

9- राजनीति में एक कहावत बेहद चर्चित है। 40 साल से मैं सुनता आ रहा हूं। सही है या गलत सब जानते हैं। कांग्रेस भ्ररष्टाचारियों की पार्टी और बीजेपी अंहकारियों की पार्टी। कांग्रेस और कांग्रेसियों पर आजादी के बाद से ही करप्शन के आरोप लगातार लगते आ रहे हैं। पर बीजेपी नेताओं की सोच को देखिए। रामलीला मैदान में रावणलीला के बाद सारे नेताओं में अचानक जोश आ गया। राजघाट समेत देश में सत्याग्रह और अनशन की बिगुल फूंक डाला। यहां तक तो ठीक था पर क्या राजघाट पर डांस करना जरूरी था? देश प्रेम के गीत हों या राष्ट्र का जज्बा, तर्क जो चाहे दे डालो पर हकीकत यही है कि कांग्रेस की पतली हालत देखकर बहुत जल्दी ये पार्टी अहंकार में फिर डूबती नजर आने लगी है। वहां जो किया वो नासमझी की सारी सीमाओं को पार करने की करतूत थी। पार्टी को इस पर माफी मांगनी चाहिए थी। पर राजनेता कोई किसी दल का हो कब अपनी गल्तियों पर माफी मांगता है? बाबा से नहीं देश की जनता से रामलीला मैदान पर कांड के बाद मनमोहन माफी मांग लेते, सोनिया माफी मांग लेती, राहुल गांधी माफी मांग लेते तो शायद ये नौबत ही नहीं आती। राजघाट पर बीजेपी को माफी मांगनी चाहिए। माफी तो दिग्गी राजा को मांगनी चाहिए जो सुषमा को अपशब्द कह गए। माफी तो उस जूता उठाने वाले को मांगनी चाहिए। माफी तो बाबा को मांगनी चाहिए। जनता सब देख रही है। मौका खुशियां मनाने का नहीं। देश जिस मुहाने पर खड़ा है ये खुशियों का समय नहीं। तमाम मुद्दे और दिक्कतें मुंह बाये खड़ीं हैं। देश सर्वोपरि है। कोई दल-कोई नेता और कोई बाबा नहीं। वैसे बीजेपी के वास्ते 2010-11 का समय या कहा जाए खुद कांग्रेस छप्पर फाड़कर दे रही है। एक से एक मसले-रोज नए घोटाले-घपले। खिलाफत के लिए इनसे बड़े और क्या हथियार किसी को मिल सकते हैं?

10- रामलीला मैदान पर रावणलीला राजनीति में अब और बहुत से गुल खिलाएगी। कांग्रेसी माने या ना मानें पर ये कड़वा सच उन्हें झेलना ही होगा कि निहत्थे और निर्दोष लोगों पर अत्याचार और बाबा के साथ अपराधियों जैसे सलूक से आज हमदर्दी की धारा बाबा की ओर ज्यादा बह रही है। कांग्रेसी लाख साबित करने की कोशिश करें कि बाबा करप्ट हैं पर इस बात को कहने का समय वो गंवा चुके हैं। कांग्रेसी लाख बाबा को संघ का एजेंट बताएं पर तब तक इस बात पर कोई विश्वास नहीं करेगा जब तक रामदेव उस दल की गोद में पूरी तरह जाकर बैठ नहीं जाते। रामदेव कोई ताज मांगने नहीं आए थे करप्शन और कालेधन पर आवाज उठाने आए थे। जनता में कहीं ना कहीं ये संदेश साफ है। कांग्रेस के साथ रहने वालों को ये डर सता रहा है। साथ जाने की तैयारी करने वाले मौके ताक रहे हैं। यूपी के चुनाव से पहले अजित सिंह कांग्रेस की ओर जाते नजर आ रहे थे क्या अब वो जाएंगे? लालू बाबा के खिलाफ, मुलायम बाबा के साथ। क्या होगा इस गठजोड़ का? रामविलास पासवान खामोश हैं। ना इसकी-ना उसकी। जो जीत जाएगा बाद में उसकी। हो सकता है उमा को बीजेपी और चक्कर कटवाती पर इससे बेहतर समय और क्या हो सकता था? अब यूपी में नई धुन पर फिर से पुराने गीत गूंजेंगे, यह तय है। अब कांग्रेस के लिए यूपी की रेस और कठिन होने जा रही है। राहुल गांधी जिस तरह हवा बनाते जा रहे थे अब उसे तूफान में बदलना आसान नहीं होगा।

11- लाख टके का सवाल यही है कि अब क्या होगा? बाबा कब तक सत्याग्रह करेंगे? सरकार करप्शन और कालेधन को कब अपनी सूची में शामिल करेगी? पीएम के आदेश पर मंत्री क्या सच में अपनी असली संपत्ति की घोषणा करेंगे? आखिर पीएम केवल मंत्रियों तक ही क्यों सीमित रह गए? सारे सांसदों और देश में सारे कांग्रेसी विधायकों की संपत्ति का ब्योरा क्यों वो जनता के सामने रखने का साहसिक कदम उठाने से कतरा गए? होने से ज्यादा दिखना जरूरी है। फिलहाल देश के जो हालात हैं उसमें सियासत करने वालों को आज नहीं तो कल इस अनचाही राह पर जाना ही होगा। फिर अब क्यों नहीं? आज क्यों नहीं? अगर वो सब सही हैं तो फिर डर किस बात का? हो सकता है काला धन हसन अली जैसों का हो? पर कौन हसन अली बिना नेताओं की शह के इतना कमा पाया है? पीएम के  फरमान का स्वागत करना चाहिए। यह अप्रत्यक्ष रूप से अन्ना-बाबा के मिशन की ही जीत है। वक्त की नजाकत और इस देश की जनता की चाहत यही है कि ये दोनों एक मंच पर साथ रहें। एक साथ मिशन चलाएं। मकसद सफल बनाएं। सारा देश उनके साथ है। ऐसा हुआ तो ये देश हमेशा आबाद रहेगा। वरना…फिर कोई अन्ना-बाबा बनने की जुर्रत शायद ही करे।

लेखक देशपाल सिंह पंवार वरिष्‍ठ पत्रकार हैं तथा कई अखबारों के संपादक रह चुके हैं.

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