भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने ताजा बयान में बैंकिंग सेवाओं का लाइसेंस लेने के लिए इच्छुक औद्योगिक घरानों को कहा है कि उन्हें कमजोर वर्गों तक बैंकिंग की हर सुविधा मुहैया करवाने के शर्त पर ही लाइसेंस मिल पाएगा। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि विदेशी बैंक भारत में अपना विस्तार करना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए भारत में सहायक बैंकों की स्थापना करनी होगी। तत्पश्चात उन्हें गरीबों के बैंक की तरह काम करना होगा। अर्थात उन्हें ऐसे लोगों को बैंकिंग सुविधा देनी होगी, जिनसे वे मुनाफा नहीं कमा सकेंगे। इस संदर्भ में ‘वित्तीय समग्रता’ की संकल्पना ऐसा ही एक सिंद्धात है।
ज्ञातव्य है कि ‘वित्तीय समग्रता’ की नीति को सरकारी बैंक भी भार के रुप में देखते हैं। निजी बैंक के लिए तो यह संकल्पना एक अनिवार्य बुराई की तरह है। लब्बोलुबाव के रुप में कहा जा सकता है कि समाज के कमजोर वर्ग के प्रति बैंक फिलवक्त अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं समझते हैं। जबकि सैंद्धातिक रुप में सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक समाज के हर तबके तक बैंकिंग की सुविधाएँ पहुँचाना चाहते हैं। गौरतलब है कि श्री डी सुब्बाराव का यह बयान कुछ समय पहले आया था। पहले बैंकिंग लाइसेंस देने की प्रक्रिया 3-4 महीनों के अंदर सम्पन्न की जानी थी। परन्तु अब सरकार ने भारतीय रिजर्व बैंक के बनाए नए बैंकिंग लाइसेंस देने के मसौदे को लागू करने की राह में रोड़ा अटका दिया है।
बहरहाल सरकार के नये फैसले के अनुसार अब लाइसेंस देने के मसौदे की पड़ताल सरकार द्वारा गठित एक समिति करेगी। वित्तीय मामलों के सचिव श्री एसके शर्मा ने अपने बयान में कहा है कि फिलहाल हम उक्त मसौदे का बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं। इसके उपरांत ही इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट फैसला लिया जाएगा। इस दिशा में हुई इस प्रगति के बाद संभावना है कि आगामी 2012 के अंत तक नए बैंकिंग लाइसेंस के नियमों की घोषणा की जा सकती है। इसके बरक्स मजेदार बात यह है कि अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री श्री प्रणव मुखर्जी ने कहा था कि चालू वित्त वर्ष के अंत तक इस मसौदे के परिप्रेक्ष्य में दिशा-निर्देश जारी कर दिए जायेंगे। समझा जाता है कि अब बैंकिंग लाइसेंस उन्हीं वित्तीय संस्थानों को दिया जाएगा जो देश के दूर-दराज प्रांतों में अवस्थित हर गाँव के हर व्यक्ति को ‘वित्तीय समग्रता’ की नीति के तहत बैंकिंग सुविधा उपलब्ध करवायेंगे।
ध्यातव्य है कि बैंकों के भारी ना-नुकर के बाद भी ‘नो फ्रिल’ योजना का शुभारंभ किया गया है। इस योजना के अंतगर्त बचत खाता शून्य राशि से खोली जाती है और इसके लिए केवाईसी के नियमों के अनुपालन पर भी जोर नहीं दिया जाता है। जाहिर है इस योजना का उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा लोगों को बैंकों से जोड़ना है। फिलवक्त देश में सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंक, 22 निजी बैंक तथा 31 विदेशी बैंक हैं। फिर भी सरकार और बैंकों की उदासीनता के कारण अभी भी देश की 40 फीसदी आबादी की पहुँच बैंक तक नहीं है। वर्तमान में हमारे देश के 6 लाख स्थानों पर मोटे तौर बड़ी आबादी है, लेकिन इनमें से महज तीस हजार स्थानों पर ही बैंक की सुविधा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति सबसे अधिक गंभीर है। बीमा की सुविधा लेने के मामले में तो हालत और भी शोचनीय है। अद्यतन आंकड़ों के अनुसार महज 10 फीसदी से कम आबादी के पास बीमा की सुविधा है। जबकि बैंक और बीमा को सामाजिक सुरक्षा का बेजोड़ हथियार माना जाता है।
बैंकों के राष्ट्रीयकरण के चार दशक बीत जाने के बाद भी बैंकिंग सुविधा को समाज के हर स्तर तक पहुँचाने के मामले में देश के सरकारी बैंकों का पिछड़ना निःसंदेह शर्मनाक है। इसमें दो मत नहीं है कि हालत पहले से सुधरे हैं, पर उसे संतोषजनक नहीं माना जा सकता है। जहाँ तक निजी और विदेशी बैंकों का सवाल है तो उनका ध्यान हमेशा से नगरों व महानगरों की ओर ही रहा है। इसका मूल कारण येन केन प्रकारेण लाभ अर्जित करना और सामाजिक बैंकिंग से सरोकार का नहीं होना है। उल्लेखनीय है कि हमारे देश में 1991 से उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई। उसके बाद निजी तथा विदेशी बैंकों को धड़ल्ले से लाइसेंस दिए गए। इस वजह से औद्योगिक घरानों की संपत्तियों में जबर्दस्त इजाफा हुआ।
बदले परिवेश में भी सरकार सबकुछ जानकर अनजान बनी रही। उदारीकरण के तहत नये कारखाने स्थापित करने या सेज के विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन को आदिवासियों से छीन करके औने-पौने दामों पर औघोगिक घरानों को उपलब्ध करवा दिया गया। कई तरह की दूसरी सुविधाएँ भी निःशुल्क कॉरपोरेट घरानों को मुहैया करवाई गई और सरकार अपने हर कदम को विकास की आड़ में तार्किक और सही बताती रही। समाज के विविध वर्गों के बीच बढ़ती खाई को शुरू से ही सरकार अनदेखा करती आई है। समाज के एक वर्ग के पास जहाँ दो जून रोटी खाने के लिए पैसा नहीं है तो दूसरे वर्ग के पास अकूत संपदा है। स्पष्ट है कि लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद भी हमारे देश में लोक कल्याणकारी योजनाओं का अनुपालन ईमानदारी पूर्वक नहीं किया जा रहा है। शायद इन्हीं कारणों से हाल के वर्षों में मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग की आय में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। ध्यातव्य है कि उनकी आय पर नजर बहुत सारी कंपनियों की है। वित्तीय कंपनियाँ भी उनमें शामिल हैं। दरअसल निजी व विदेशी बैंक, बैंकिंग को विशुद्ध व्यवसाय समझते हैं।
इसी दृष्टिकोण के परिप्रेक्ष्य में निजी वित्तीय कंपनियाँ मसलन, अनिल धीरुभाई अंबानी समूह की रिलायंस कैपिटल, श्रीराम ट्रांसपोर्ट फाइनेंस, रेलिगेयर इंटरप्राइजेज, महिंद्रा, टाटा, इंडिया बुल्स, आदित्य बिड़ला फाइनेंशियल सर्विसेज की निगाह बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने की है। वर्तमान संदर्भ में ‘वित्तीय समग्रता’ की संकल्पना इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके माध्यम से बचत को प्रोत्साहन मिलती है। साथ ही बैंक खाता होने से काफी हद तक किसान या अन्य कामगार सूदखोरों के चंगुल से बच पाते हैं। बैंकों में खाता होने से खाताधारकों की पहचान स्थापित होती है एवं वे बहुत सारी सरकारी योजनाओं का हिस्सा बनकर लाभान्वित होते हैं। मनरेगा के अंतगर्त बैंक के माध्यम से मजदूरों को उनका मेहताना देने की नीति से काफी हदतक मजदूरों को उनका हक मिला है। वैसे भ्रष्टाचार अभी भी है। पर इतना तो माना ही जा सकता है मनरेगा से कुछ मजदूरों को फायदा तो हो ही रहा है।
सरकारी योजनाओं जैसे- मनरेगा, पीएमजी, (पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री रोजगार योजना या पीएमआरवाई) स्वर्ण जयंती शहरी स्वरोजगार योजना, स्वर्ण जयंती ग्रामीण स्वरोजगार योजना इत्यादि में निजी व विदेशी बैंकों की भागीदारी का न होना निश्चित रुप से दुःखद है। 21 वीं सदी का एक दशक बीत जाने के बाद भी निजी व विदेशी बैंकों का गांवों व अलाभकारी स्थानों पर उपस्थिति नहीं के बराबर है। गाँवों व तहसील में निजी व विदेशी बैंकों के प्रतिनिधि केवल ट्रैक्टर बेचते हैं, क्योंकि इस धंधे में लाभ का मार्जिन अधिक होता है। किसानों को अल्पकालिक ऋण या किसान क्रेडिट कार्ड देने में अभी भी उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है। अस्तु भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में औद्योगिक घरानों को इस तरह से सिर्फ मलाई खाने की छूट नहीं दी जानी चाहिए। विकास के नाम पर जिस तरह से सरकारी संपत्तियों को सरकार के द्वारा औघोगिक घरानों को कौडि़यों के दाम पर बेचा जा रहा है। उसे कदापि जायज नहीं ठहराया जा सकता। हाल ही में कोयला के खानों को कॉरपोरेट घरानों को बेचा गया है। पहले भी उदारीकरण के बयार में अनगिनत सरकारी संपत्तियों को इसी तर्ज पर बेचा जा चुका है। इस संदर्भ में ध्यान देने वाली बात यह है कि निजी कंपनियाँ मजदूरों की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम नहीं करती हैं। भविष्य निधि का पैसा गड़प करने में भी उनको सकुचाहट नहीं होती है। फिर भी कॉरपोरेट कंपनियों को सरकारी बैंकों के द्वारा रेवाडि़याँ बेरोकटोक बाँटी जा रही है।
यहाँ विडम्बना यह है कि जब ऐसी रियायत किसानों को देने की बात कही जाती है तो उसे नाजायज मांग कह कर आमतौर पर खारिज कर दिया जाता है। हाँ, कभी-कभी अपना उल्लू सीधा करने के लिए राजनीतिज्ञ उन्हें ‘ऋण माफी’ जैसा लालीपॉप जरूर पकड़ा देते हैं। पड़ताल से स्पष्ट है कि निजी व विदेशी बैंकों का सामाजिक दायत्वि के अनुपालन के प्रति रूचि नगण्य है। जाहिर है ऐसे में केवल बैंकिंग लाइसेंस प्राप्त करने के लिए निजी व विदेशी बैंक सामाजिक बैंकिंग के दायित्वों का निर्वाह करने का ढोंग कर सकते हैं। जैसा कि हम जानते हैं कि भारत जुगाड़ का देश है। लिहाजा एक बार ऐसी मतलबी कंपनियों को लाइसेंस देने के बाद भारतीय रिजर्व बैंक के लिए भी उसे रद्द करना आसान नहीं होगा।
लेखक सतीश सिंह स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और स्वतंत्र लेखन करते हैं. सतीश से [email protected] या 09650182778 के जरिए संपर्क किया जा सकता है.

