फिर पढ़ी जाएगी हिंदी की बदहाली पर मर्सिया

औपचारिक समारोह का प्रतीक बनकर रह गया है-हिन्दी दिवस, यानी चौदह सितम्बर का दिन। सरकारी संस्थानों में इस दिन हिन्दी की बदहाली पर मर्सिया पढ़ने के लिए एक झूठ-मूठ की दिखावे वाली सक्रियता आती है। एक बार फिर वही ताम-झाम वाली प्रक्रिया बड़ी बेशर्मी के साथ दुहरायी जाती है। दिखावा करने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता है। कहीं ‘हिन्दी दिवस’ मनता है, कहीं ‘सप्ताह’ तो कहीं ‘पखवाड़ा’। भाषा के पंडित, राजनीतिज्ञ, बुद्विजीवी, नौकरशाह और लेखक सभी बढ़-चढ़कर इस समारोह में शामिल होकर भाषणबाजी करते हैं। मनोरंजन के लिए कवि सम्मेलन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। पर्व-त्यौहार की तरह लोग इस दिवस को मनाते हैं।

कारपोरेट्स को बैंकिंग लाइसेंस देना कितना जायज?

कारपोरेट्स घरानों को बैंकिग लाइसेंस देने का रास्ता अब साफ हो गया है। इनको लाइसेंस देने के लिए जरुरी कवायद तकरीबन छह माह से किया जा रहा था। वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में घोषणा कि थी कि चालू वित्तीय वर्ष यानी 2011-12 के अंत तक बैंकिंग लाइसेंस देने के नियमों की घोषणा कर दी जाएगी। गौरतलब है कि बैंकिंग लाइसेंस हासिल करने के लिए कारोबारी घराने लाबीइंग के जरिए सरकार को अपने पक्ष में करने की कोशिश कई सालों से कर रहे थे।इस परिप्रेक्ष्य में 29 अगस्त, 2011 को भारतीय रिजर्व बैंक ने नये बैंकिंग लाइसेंस से संबंधित मसौदे के दिशा-निर्देश को जारी किया।

जनलोकपाल से खतम नहीं होगा भ्रष्‍टाचार

: इसके लिए खुद के अंदर सुचिता और ईमानदारी लानी होगी : कारपोरेट तथा‍ निजी क्षेत्रों को क्‍यों रखा गया है जनलोकपाल से बाहर :  भ्रष्टाचार की परिभाषा :  आमतौर पर सरकारी विभागों में महज घूसखोरी को भ्रष्टाचार माना जाता है। जबकि भ्रष्टाचार का दायरा काफी व्यापक है। रिश्‍वतखोरी के अलावा यदि हम अपना काम समय से या ईमानदारी पूर्वक नहीं करते हैं तो वह भी भ्रष्टाचार है। आज भ्रष्टाचार हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है और हम सभी किसी न किसी स्तर पर इसमें भागीदार हैं।

कर्ज संकट की आग में जल सकता है भारत

स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने अमेरिका की लॉन्ग टर्म कर्ज की रेटिंग को ‘ट्रिपल ए’ से कम करके ‘एए प्लस’ कर दिया है। रेटिंग कम होने से ज्यादा खतरनाक अवस्था अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार की रफ्तार का बहुत ज्यादा सुस्त होना है। डर की वजह से सरकार एतहियाती रवैया अपनाने की नाकाम कोशिश कर रही है। यूरोप और मध्य पूर्व देशों के हालत भी अच्छे नहीं हैं। दिन प्रति दिन इन देशों में कर्ज का संकट और भी गहराता चला जा रहा है। अब सब कुछ इन देशों की सरकार पर निर्भर करता है कि वे किस तरह से इस कर्ज संकट से मुकाबला करते हैं। हालांकि अमेरिका ने बेरोजगारी के फ्रंट पर अच्छा काम किया है। लेकिन फिलहाल उसका लाभ उसको मिलता नहीं दिख रहा है। ध्‍यातव्य है कि जुलाई में 75,000 के अनुमान के मुकाबले में अमेरिका ने 1,17,000 बेरोजगारों को नौकरी मुहैया करवाया है।

सोनिया गांधी के क्षेत्र में विकलांगता से लड़ता एक गांव

सतीश सिंह कांग्रेसनीत सरकार की आलाकमान सोनिया गाँधी के चुनाव क्षेत्र रायबरेली के खीरो ब्लॉक का कन्हामऊ गाँव सालों से फ्लोरोसिस नामक जलजनित बीमारी से जूझ रहा है। ढाई सौ घरों वाले इस गाँव में एक हजार की आबादी है। यहाँ बच्चों के स्वस्थ जन्म लेने की संभावना जरुर रहती है। लेकिन उनकी मौत विकलांग की अवस्था में होना तय माना जाता है। दरअसल, इस गाँव के आसपास के इलाके के भूजल में फ्लोराइड की मात्रा निश्चित मानक से बहुत ज्यादा पाई जाती है।

भारत के बाजारों में बढ़ता चीन का दबदबा

सतीश सिंह रक्षाबंधन भाई-बहन के प्यार को जताने का त्यौहार माना जाता है। इस पर्व में बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं। भारत में इस त्यौहार को बड़े धूम-धाम के साथ मनाया जाता है। अब चीन भी इस त्यौहार से जुड़ गया है। गौरतलब है कि सीधा-सीधा इस त्यौहार का भले ही चीन से कोई सरोकार नहीं है। फिर भी व्यापार के लिहाज से चीन का इस पर्व से गहरा रिश्‍ता है। रक्षाबंधन में एक महीना से भी कम समय बचा है और भारत का बाजार चीन की डिजाइनर राखियों से पट गया है। हर तरफ चाइना मेड राखियों की भरमार है। राखी के लिए कच्चा माल तक चीन से मंगवाया जा रहा है। दिल्ली के सदर बाजार, चाँदनी चौक, शंकर मार्केट एवं पहाड़गंज में राखी बनाने के लिए धागे, जरी, छोटी गुड़िया, कार्टून कैरेक्टर के छोटे टेडी इत्यादि चीन से आयात किये जा रहे हैं। चोरी से भी डिजाइनर राखी और उसको बनाने के लिए कच्चा सामान चीन से आ रहा है।

आम जीवन में संभोग को लेकर बहुत सारी भ्रांतियां हैं!

सतीश सिंह आज भी भारत में सेक्स को वर्जना की तरह देखा जाता है। जबकि हमारे देश में खजुराहो से लेकर वात्सायन के कामसूत्र जैसी कृतियों में सेक्स के हर पहलू पर रोशनी डाली गई है। स्वस्थ व सुखी जीवन के लिए संयमित सेक्स को उपयोगी बताया गया है। सेक्स का स्थान जीवन में पहला तो नहीं कह सकते हैं। पर इसका स्थान गेहूं के बाद पर गुलाब के साथ जरुर है। सेक्स शरीर की एक जरुरत है और साथ ही इंसान के जीवन चक्र को जारी रखने वाला जरिया भी। आम जीवन में सेक्स को लेकर बहुत सारी भ्रांतियाँ हैं। जानकारी के अभाव में, परिस्थितियों के कारण या फिर मनोविकार के कारण इंसान बलात्कार जैसा घिनौना कृत्य करके सामाजिक बहिष्कार का पात्र बन जाता है। बलात्कार आज भारत में सबसे ज्वलंत मुद्दा है। बावजूद इसके इस समस्या के तह में जाने का कभी प्रयास नहीं किया गया है।

ऑरवेलियन सिटी

सतीश सिंहहाल ही में हिन्दी साहित्य के दिग्गज साहित्यकारों की जन्मशती धूमधाम से पूरे देश में मनाई गई। नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, गोपाल सिंह नेपाली, शमशेर बहादुर सिंह, उपेन्द्रनाथ अश्‍क को उनकी जन्मशती पर शिद्दत के साथ याद किया गया। इसी क्रम में महाकवि गुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर को भी उनकी 150 वीं जयंती पर हमने याद किया। तकरीबन सभी पत्र-पत्रिकाओं में इनके व्यक्त्वि व रचना-संसार पर प्रकाश डाला गया। दरअसल हमारे देश में अपने विरासत को सहेजने की परंपरा कभी नहीं रही है। आज अधिकांश विरासत या तो जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हैं या खत्म हो चुके हैं। बावजूद इसके न तो सरकार इस मामले को लेकर चिंतित है और न ही हम। नई पीढ़ी हमसे जो सीख रही है, उसका खामियाजा भी हमें ही भुगतना पड़ेगा।

बैंकों के दोहरे मापदंड

सतीश सिंहभारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव ने अपने ताजा बयान में बैंकिंग सेवाओं का लाइसेंस लेने के लिए इच्छुक औद्योगिक घरानों को कहा है कि उन्हें कमजोर वर्गों तक बैंकिंग की हर सुविधा मुहैया करवाने के शर्त पर ही लाइसेंस मिल पाएगा। उन्होंने यह भी कहा है कि यदि विदेशी बैंक भारत में अपना विस्तार करना चाहते हैं तो उन्हें इसके लिए भारत में सहायक बैंकों की स्थापना करनी होगी। तत्पश्‍चात उन्हें गरीबों के बैंक की तरह काम करना होगा। अर्थात उन्हें ऐसे लोगों को बैंकिंग सुविधा देनी होगी, जिनसे वे मुनाफा नहीं कमा सकेंगे। इस संदर्भ में ‘वित्तीय समग्रता’ की संकल्पना ऐसा ही एक सिंद्धात है।

गणतंत्र दिवस के बहाने

सतीशराष्ट्रध्वज को फहराने का अधिकार नागरिकों के मूलभूत अधिकार और अभिव्यक्ति के अधिकार का ही एक हिस्सा है। यह अधिकार केवल संसद द्वारा ऐसी परिस्थितियों में ही बाधित किया जा सकता है, जिनका उल्लेख संविधान की कण्डिका 2, अनुच्छेद 19 में किया गया है। खण्डपीठ में साफ तौर पर कहा गया है कि नागरिकों के द्वारा राष्ट्रध्वज का सम्मान किया जाना चाहिए। इसके उचित उपयोग पर कोई बंदिश नहीं है। साथ ही उक्त खण्डपीठ में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भारतीय नागरिकों को ध्‍वज संहिता के द्वारा भविष्य में शिक्षित किया जाए। सर्वोच्च न्यायलय के 22 सितंबर, 1995 के निर्णय के अनुसार भी भारत का हर नागरिक राष्ट्रीय ध्वज के ध्‍वजारोहण के लिए स्वतंत्र है। परन्तु यह देश की विडम्बना ही है कि आज भी हमारे देश के नागरिक अपने अधिकारों से तो अवगत हैं, लेकिन कर्तव्‍यों से जान-बूझकर विमुख।

महंगाई से हारी केन्‍द्र सरकार, गरीब बदहाल

सतीश सिंहपिछले वर्ष 25 दिसम्बर को मंहगाई साल के उच्चतम स्तर 18.32 फीसदी तक पहुँच गई थी। ‘करैला और नीमचढ़ा’ वाले कहावत को चरितार्थ करते हुए सरकारी तेल कंपनियों ने कच्चे तेल की कीमत में इजाफा होने का बहाना करते हुए नए साल के पहले महीने में फिर से पेट्रोल की कीमत में 2.5 से 2.54 रुपये तक की बढ़ोतरी की है। जाहिर है कि मंहगाई को कम करने का सरकार का हर प्रयास विफल हो चुका है। दूध-सब्जी जैसे खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने से आज की तारीख में मंहगाई बेलगाम हो चुकी है। सरकार ने पूरी तरह से हथियार डाल दिया है और बौखलाहट में अतार्किक बयान दे रही है। सरकार कह रही है कि मंहगाई पर काबू सिर्फ कृषि उत्पादों की उत्पादकता को बढ़ाकर किया जा सकता है, जबकि जगजाहिर है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में उछाल जमाखोरों और कालाबाजारी के कारण आया है।

आंकड़ों में उलझा 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला

सतीशपेशे से वकील और वर्तमान दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल ने जिस तरह से नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) के रिर्पोट को सिरे से खारिज किया है, वह निश्चित रुप से पूरे मामले पर लीपापोती करने के समान है। सिब्बल ने आंकडों की बाजीगरी में अपने अदालती अनुभव का इस्तेमाल करते हुए कैग के रिर्पोट में बताए गए 1.76 लाख करोड़ के सरकारी खजाने को चूना लगाने वाले दावे को खारिज करते हुए कहा कि सरकारी खजाने को एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ है। ज्ञातव्य है कि कैग ने अपनी पड़ताल में मूल रुप से 3जी स्पेक्ट्रम के नीलामी के दौरान जिन दरों पर दूरसंचार कंपनियों को लाइसेंस दिए गए थे, उनको आधार मानते हुए सरकारी खजाने को 1.76 लाख करोड़ का चूना लगाने की बात कही थी। 1.76 लाख करोड़ में से 1,02,490 करोड़ का नुकसान 2008 में हुआ था। जब पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा ने नियमों की अनदेखी करते हुए 122 नई दूरसंचार कंपनियों को 2001 की दरों पर 2जी स्पेक्ट्रम के लिए लाइसेंस दिया था। 2008 में ही आरकॉम और टाटा को 2001 की दर पर डुअल टेक लाइसेंस दिया गया, जिससे पुनश्‍च: सरकार को 37,154 करोड़ का नुकसान हुआ।

बेमानी है चीन के साथ व्यापार समझौता!

सतीशआज भारत के हर शहर हर गाँव का बाजार चाइना के उत्पादों से पटा पड़ा है। उत्पाद के वास्तविक कीमत से उपभोक्ता अनजान हैं, फिर भी वे चाइना के उत्पाद बेझिझक खरीद रहे हैं। किसी भी चाइना के उत्पाद पर उसकी वास्तविक कीमत नहीं लिखी रहती है। हर दुकानदार चाइना के उत्पादों से जमकर मुनाफाखोरी कर रहा है। ऐसा नहीं है कि भारतीय उपभोक्ता चाइना का उत्पाद खरीद कर अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं। हकीकत तो यह है कि उपभोक्ता और दुकानदार दोनों भिन्‍न-भिन्‍न की मनःस्थिति में हैं। दरअसल चाइना का उत्पाद सस्ता और विविधता से युक्त है। साथ में आर्कषक भी। इस कारण टिकाऊ नहीं होने के बावजूद भी चाइना के उत्पाद बाजार में धड़ल्ले से बिक रहे हैं। आज की तारीख में आपको भारत के दूर-दराज के गाँव का एक ग्रामीण भी 3जी फीचर वाले चाइना मेड मोबाइल फोन से बात करता हुआ मिल जाएगा। मोबाइल फोन तो केवल बानगी भर है।

रक्षक बने महिला सहकर्मियों की इज्‍जत के भक्षक!

सतीश : दिल्‍ली पुलिस के कई महकमों में यौन-उत्‍पीड़न की शिकायत : ज्‍यादातर मामलों में नहीं दर्ज होती है रिपोर्ट : जब कानून का रक्षक ही अपने महिला सहकर्मियों का यौन-शोषण करें तो आम महिला की हालत क्या होगी, इसका आप सहज अंदाजा लगा सकते हैं। दिल्ली पुलिस पर भ्रष्टाचार के आरोप तो लगते ही रहते हैं, लेकिन अपने महिला सहकर्मियों के साथ यौन-उत्पीड़न की बात का खुलासा हाल ही में सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी से हुआ है। इसमें सबसे अफसोसजनक बात यह है कि विगत दस सालों में दिल्ली पुलिस के कई महकमों में महिला सहकर्मियों का लगातार यौन-शोषण होने के बावजूद थाना में एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है। इंदिरा गांधी एअरपोर्ट पुलिस शाखा, लाईसेंसिंग पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र, झरोदा कलां, दंगा निरोधी शाखा, सातवीं व ग्यारहवीं बटालियन, राष्ट्रपति भवन में तैनात पुलिस बल, स्पेशल ब्रांच, पुलिस रिक्रूटमेंट सेल, ट्रैफिक पुलिस, पुलिस संचार इकाई इत्यादि विभागों से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगी गई थी।

ब्‍लैकबेरी से देश की सुरक्षा में सेंध!

सतीश सिंह : नई तकनीक ने देश की सुरक्षा एजेंसियों को परेशानी में डाला : सूचना एवं तकनीक के क्षेत्र में आई क्रांति भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के सामने नित दिन नई तरह की चुनौती प्रस्तुत कर रही है। यह चुनौती प्रशिक्षित, जानकार और कुशल मानव संसाधन से लेकर तकनीकी पिछड़ापन जैसे पहलुओं से जुड़ा हुआ है। जिस तरह से बेधड़क नक्सली झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल इत्यादि राज्यों में अपनी समानांतर सरकार चला रहे हैं, उसमें सूचना व तकनीक का बहुत ही बड़ा योगदान है, खास करके इंटरनेट और मोबाइल का। उल्लेखनीय है कि दंतेवाड़ा में हुए सीआरपीएफ के जवानों के कत्लेआम के पीछे भी सीआरपीएफ की वॉकी-टॉकी का नक्सलियों के हाथों तक पहुँचना था। वॉकी-टॉकी के सहारे ही नक्सलियों ने सीआरपीएफ के काफिले को लोकेट किया था। मुम्बई में हुए आतंकी हमले में भी आतंकवादी अपने पाकिस्तानी आकाओं से मोबाइल पर निर्देश प्राप्त कर रहे थे।

जीन संवर्धित खाद्य पदार्थों पर क्यों न मचे बवाल!

[caption id="attachment_2359" align="alignleft" width="85"]सतीश सिंहसतीश[/caption]: प्रस्तावित विधेयक में न तो स्वास्थ का ख्याल रखा गया है और न ही जैव सुरक्षा का :  इस विधेयक को लागू करने की जल्दी सरकार को क्यों है : वियतनाम में जीन संवर्धित ‘ऐजेंट संतरा’ के प्रयोग से तकरीबन 4 लाख लोगों की मौत हो गई थी : जीन संवर्धित खाद्य पदार्थ (जी एम फूड) से जुड़ा हुआ बिल ‘भारतीय जैव प्रौद्यौगिकी नियामक प्राधिकरण विधेयक-2009’ (बीआरएआई) को मानसून सत्र में पेश करने का मन सरकार बना रही है। बवाल इस बिल के पास के होने के बाद भारत में जी एम फूड के उपभोग से होने वाले खतरों को दृष्टिगत करके मचा हुआ है। बीटी बैंगन को लेकर पहले ही काफी हो-हल्ला हो चुका है। जी एम फूड सबसे पहले विश्‍व के बाजार में सन् 1990 में आया था। सबसे पहले टमाटर के जीन में परिवर्धन किया गया था। इसके पीछे की दलील यह थी कि इससे फसलों की उत्पादकता में इजाफा होगा। साथ ही साथ फसलों की गुणवत्ता भी बढ़ेगी। इस काम को अंजाम दिया था मल्टीनेशनल कंपनी कालजेन ने। जो कि विश्‍वविख्यात मौनसेन्टो कंपनी की सहायक थी।

कॉमन लोगों पर भारी पड़ रहा कॉमनवेल्‍थ गेम

सतीश सिंह: सीवीसी की रिपोर्ट में भारी भ्रष्‍टाचार की आशंका : अधिकांश परियोजनाएं अधर में : राष्ट्रमंडल खेल के शुरु होने से पहले खेल की तैयारी को लेकर जिस तरह से रोज नाटक हो रहे हैं, वह निश्चित रुप से अफसोसजनक है। भारत विश्‍व का ही एक हिस्सा है और यहाँ पर होने वाली हलचलों से विश्‍व के अन्य देश भी बखूबी अवगत हैं। ऐसे में दिल्ली को सजाने-संवारने और खेल गांव तथा स्टेडियम को माकूल तरीके से चाक-चौबंद करने के लिए जिस तरह से रंगमंच पर रोज पक्ष-विपक्ष में महाभारत के समान घमासान हो रहा है,  उसकी जितनी भी निंदा की जाए, वह कम है। भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश, जहां विकास आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा किया जाता है, में राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने जैसा है। क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम के लिए संघर्ष करने के बावजूद आधे पेट पानी पीकर सोते हैं।

विकास नहीं विश्‍वास से सुलझेगी नक्‍सल समस्‍या

सतीश सिंह: आदिवासियों को योजनाबद्ध तरीके से जंगल से किया जा रहा दूर : आतंरिक सुरक्षा के लिये नक्‍सलवाद सबसे बड़ा खतरा : प्राकृतिक एवं खनिज संसाधनों की जमकर की जा रही है लूट : आज नक्सल समस्या वहीं है जहां जंगल, खनिज संपदा और आदिवासी हैं। विकास से तो पूरा देश महरुम है और गरीबी ज्‍यादातर घर की थाती है, फिर भी नक्सल समस्या मूल रुप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में है। बिहार और आंध्रप्रदेश में नक्सल समस्या ज्यादा गंभीर नहीं है। सच कहा जाए तो आंध्रप्रदेश में नक्सलियों का तकरीबन सफाया हो चुका है। बिहार में भी यह अब अंतिम कगार पर है। ऐसे में यह कहना कि नक्सल समस्या का समाधान सिर्फ विकास से हो सकता है, कहीं से भी समीचीन प्रतीत नहीं होता है। आज विकास के नाम पर जंगल और आदिवासियों की जमीन को योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है। कॉरपोरेट हाऊस, सरकार और प्रशासन की मिलीभगत से प्राकृतिक संसाधनों को जमकर लूटा जा रहा है।