अव्यवस्थाओं का महाकुम्भ समाप्त हुआ. जिन लोगों के जिम्मे राष्ट्रकुल खेलों की बागडोर रही, उन लोगों ने तो राष्ट्रीय अपमान कराने में कोई कोर क़सर नहीं रख छोड़ी थी, मगर उन्नीसवें राष्ट्रमंडल खेलों से राष्ट्र अपमानित नहीं, गौरवान्वित हुआ, चाहे वह अभिभूत कर देने वाले उद्घाटन या समापन समारोह की अनुपम भव्यता रही हो या लम्बी छलांग लगाते हुए पदक तालिका में दूसरे स्थान पर रहने वाले भारत के खिलाड़ियों का हैरतअंगेज प्रदर्शन..! अब यह सब एक सुखद यथार्थ है। आयोजन समिति के मुखिया सहित अन्य समस्त खेल प्रशासक इन खेलों की गंभीरता को शायद नहीं समझ सके थे और उनकी सोच (ऐसी नकारात्मक उम्मीद) तो यह थी कि खिलाड़ी इतना लचर प्रदर्शन करेंगे कि सारे देश में थू-थू होगी और उस शोर में उनकी चोरी दब जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। खिलाड़ियों ने जिसका खाया, उसका गुण गाया।
खेलों की मेजबानी में देश के 70 हजार करोड़ रुपए लगे, उससे बुनियादी सुविधाओं का उत्थान तो हुआ ही राजधानी दिल्ली भी विश्वस्तरीय हो गई। लेकिन जो पहली बार हुआ, वह यह था कि खेल मंत्रालय ने जो पौने सात सौ करोड़ रुपए खिलाड़ियों के प्रशिक्षण पर खर्च किए थे, वह पूंजी लाभ के साथ लौटी। एक सौ एक पदक इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। हमारे खिलाड़ियों ने यह बता दिया कि ‘हम पर निवेश करके तो देखो, हम अश्वमेध के घोड़े हैं।’ इन खेलों से हमें ढेरों सबक मिले, उनमें पहला तो यही था कि भविष्य में किसी ऐसे व्यक्ति को एकल रूप से इतने बड़े आयोजन की जिम्मेदारी न मिले, जो बचपन में पेट भर खाया भी न हो। कहते हैं- बचपन का छोछा, मन का ओछा। ऐसे भ्रष्टाचारियों को पोंछा मारकर धकियाना होगा।
दूसरी ओर, अब तक जो खेल के प्रति अगंभीर दृष्टिकोण रहा, उसमें भी बदलाव लाना पड़ेगा। कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता, भारतीय खिलाड़ियों ने तबीयत से पत्थर उछालकर कई सूराख आसमान में कर दिए। यह बात दीगर है कि अब भी हमारे पास वह ‘फिनिश’ (आखिरी क्षणों में किया गया बेहतर प्रदर्शन) नहीं है। फिर भी एक लगभग विश्व स्तरीय आयोजन में परिणाम की अगर यह प्रतिशत दर है, तो सिर्फ अपने प्रदर्शन को थोड़ा और तराशने का काम शेष रह जाता है। और अगर ऐसा हुआ, तो कौन जानता है दस वर्ष बाद ओलंपिक में भी हम पहले पांच स्थान पर खड़े नजर आएंगे।
सवाल यह नहीं कि कितने पदक हमें मिले। 1982 एशियाड की मेजबानी में भी हमने खूब पदक जीते थे, लेकिन उस प्रदर्शन को हम कभी दोहरा नहीं पाए। सवाल तो यह है कि पदक जीतने की आदत कैसे पड़े। यह मानसिकता तभी हमारे देश के खिलाड़ियों में आ सकती है, जब उनमें स्वतंत्रता का बोध हो, ‘सर, बिल पास करेंगे, सर, व्यक्तिगत रूप से खुश हैं, व्यक्तिगत रूप से मस्त हैं,’ जैसी निकृष्ट सामंती प्रक्रिया जब तक समाप्त नहीं होगी, तब तक खिलाड़ी धृतराष्ट्र शैली में खेलेंगे और कलमाड़ी जैसे ‘दास प्रभु’ मजा लेते रहेंगे, गुलछर्रे उड़ाते रहेंगे। जहां तक नतीजों की बात है तो भारतीय एथलीटों ने- ‘ आये, देखा, जीत लिया’ शैली में अपनी चमक बिखेरी और यह रूपांतरण यानी transformation मात्र पुरुष खिलाडियों तक ही सीमित नहीं रहा, जिस तरह से भारतीय महिला एथलीट सामने आईं, उससे कविवर मैथिलीशरण गुप्त की काव्य पंक्ति – अबला तेरी यही कहानी – निरर्थक होती दिखी। शारदेय नवरात्र में एन षष्टी पूजन के दिन कृष्णा पूनिया की अगुवाई में डिस्कस थ्रो में संपूर्ण वर्चस्व यानी क्लीन स्वीप, नयी सदी की भारतीय ‘नारी शक्ति’ का प्रतीक बन गया।
भारत के कुल 38 स्वर्ण पदकों में से महिलाओं के खाते में 13 स्वर्ण आए, इसे देख कर और आप क्या कहेंगे। राष्ट्रमंडल खेलों में हम कुश्ती, निशानेबाजी और भारोत्तोलन स्पर्द्धाओं में परंपरागत रूप से अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं, लेकिन हमने इन तीनों स्पर्द्धाओं में बेहतर तो किया ही, लेकिन सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं रहे। बैडमिंटन, टेनिस, टेबल टेनिस के अलावा तीरंदाजी में जहां हमारे खिलाड़ियों ने विश्वस्तरीय प्रदर्शन किया, वहीं तैराकी और जिमनास्टिक जैसी स्पर्द्धाओं में खाता खोलकर भारतीयों ने भविष्य के लिए सुखद संकेत भी दे दिए। एथलीटिक्स में दो स्वर्ण सहित दहाई अंकों में मिले पदक यह दर्शाने के लिए काफी हैं कि ट्रैक एंड फिल्ड में जो ‘फिटनेस’ अपरिहार्य है, उसे पाने की दिशा में भारतीय एथलीट अग्रसर हैं। भारतीय महिला बैडमिन्टन की प्रकाश पादुकोण साइना नेहवाल और भारतीय टेनिस के चेहरे सोमदेव देवबर्मन ने जिस तरह अपनी प्रतिष्ठा के साथ न्याय किया, वह सचमुच यह दिखाता है कि महान प्रतिभाएं दबाव की चुनौती का सामना कैसे करती हैं।
इसी तरह निशानेबाजी में बढ़ती प्रतिभा खोज सुनहरे भारतीय भविष्य का संकेत देती ही है, साथ ही इस और भी इशारा करती है कि निशानेबाजी में अब देश राणाओं, बिंद्राओं, जंगों और राठौरों का मोहताज़ नहीं रह गया है। इन खेलों में कुछ निराशाओं का भी भारत को सामना करना पड़ा, चाहे वो 26 डेविस कप मुकाबलों में अपराजेय रही लिएँडर पेस और महेश भूपति की जोड़ी की युगल टेनिस के सेमीफाइनल में अप्रत्याशित विदाई रही हो या दुनिया के नंबर एक मुक्केबाज बिजेंद्र का विवादस्पद निर्णय के चलते खिताबी लड़ंत से बाहर हो जाना। ये दोनों हादसे भारतीय खेल प्रमियों के लिए कम सालने वाले नहीं रहे। फिर भी विवादों से घिरी मुक्केबाजी में तीन स्वर्ण ने यह सुखद संकेत दे दिया है कि मुक्केबाजी हरियाणा के छोटे से कस्बे भिवानी से निकलकर पूरे देश में छाती जा रही है और भारतीय मुक्केबाजों के प्रभुत्व को चंद दिनों में पूरी दुनिया स्वीकार करने लगेगी।
हॉकी के फाइनल में मिली करारी हार के बावजूद हमें बहुत कुछसकारात्मक मिला है। हम पहली बार फाइनल में पहुंचे।
कंगारुओं के खिलाफ फाइनल और लीग मुकाबलों के दौरान कुछ मौकों पर हमारे खिलाड़ियों ने बहुत शानदार हॉकी का प्रदर्शन किया। उन बेहतर क्षणों को यदि खिलाड़ियों और हॉकी के आकाओं ने अपनी स्मृतियों में बैठा लिया, तो भारतीय हॉकी टीम अपने खेल में निरंतरता पाकर विश्व विजेता हो सकती है। अब अगली चुनौती एशियाई खेलों की है। अगले महीने चीन में होने जा रहे एशियाड में क्या भारतीय खिलाड़ी अपने इस प्रदर्शन को बरकरार रखने में सफल होंगे? क्या वे 1982 एशियाड में मिले 57 पदकों के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को पीछे छोड़ने में कामयाब होंगे और क्या चीन, जापान कोरिया जैसे देशों की और से मिलने वाली कठिन चुनौतियों से पार पाने में भी वे उतने ही सफल रहेंगे?
फिलहाल फिजाओं में यही सवाल तैर रहे हैं। इनका जवाब तो नवंबर के बाद ही मिल सकेगा, लेकिन इतना जरूर कहना होगा कि खिलाड़ियों से
इतनी जल्दी दो बार शीर्ष पर पहुंचने की उम्मीद करना उनसे कुछ ज्यादा ही अपेक्षा रखना कहा जाएगा। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को भविष्य में राष्ट्रमंडल खेलों और एशियाड के बीच कम से कम छह से आठ माह का अंतराल रखना चाहिए।
बहरहाल, हर दृष्टि से बेहतरीन आयोजन को लेकर हम फूल कर कुप्पा न हों और इसके आयोजन में निर्माण से लेकर टिकट वितरण तक में जैसे धत्करम हुए, जिस तरह से प्रशासकीय अक्षमता सामने आई, उसे ढंकने की जरूरत नहीं है। सारी गड़बड़ियों की निष्पक्ष लेकिन त्वरित जाँच हो और जनता के पैसे की खुली लूट मचाने वालों को उनके अंजाम तक पंहुचाया जाय। साथ ही अब सड़-गल चुकी व्यवस्था में बदलाव लाकर समूची
प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की जरूरत है। यदि ऐसा संभव हुआ तो निस्संदेह, भारत ओलंपिक जैसे विशालतम खेल महाकुंभ के आयोजन में भी सक्षम है, लेकिन आयोजन समिति का मुखिया कोई कलमाड़ी जैसा नहीं, मेट्रो मैन श्रीधरन जैसा समय से पहले काम पूरा करने वाला शख्स होना चाहिए।
सॉफ्टवेयर के बाद जीवन के हार्डवेयर में भी भारत का यह उत्कर्ष विश्व को यह संदेश देने की स्थिति में है कि मेटाफिजिक्स की दुनिया का बादशाह फिजिक्स की दुनिया में भी बादशाह बनने वाला है और- पूत के पांव पालने में दिखाई पड़ चुके हैं।
लेखक पदमपति शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं. इनकी गिनती देश के जाने-माने हिंदी खेल पत्रकारों में होती है. उनका यह लेख राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हो चुकी है.

