Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

संगीत-सिनेमा

मनोरंजन का विषय नहीं है किसान की मजबूरी

प्रमोद कुमार पांडेय: होरी और घीसू के जीवन में सवेरा अभी भी नहीं आया है : आमिर खान होम प्रोडक्शन की चर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’ में ग्रामीण जन जीवन के चित्रण की काफी चर्चा है। इस फिल्म में यथार्थ की जमीन को प्रभावी तरीके से फिल्माया गया है। सइयां के बहुत कमाने के बावजूद महंगाई द्वारा सताये जाने से लेकर किसानों की आत्महत्या तक का चित्रण किया गया है। आज खेती-किसानी, भूख-बेरोजगारी जैसे मुद्दे लगता है महज ‘वाद-विवाद प्रतियोगिता’ के विषय बन गये हों। क्योंकि पहल कहीं नजर नहीं आती और आती भी है तो राजनीतिक रणनीतियों तक ही सिमट कर रह जाती है। भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी, जो कि पत्रकार और फिल्म समीक्षक रहे हैं, उन्होंने कहा है कि पीपली लाइव में किसानों की आत्महत्या को इस तरह से चित्रित करने से बचना चाहिये था। उनका कहना है कि जिन परिवारों के लोग इस त्रासदी से गुजरे हैं, उनके लिए इस फिल्म का हंसी-ठिठोली वाला रूप कितना बेधता होगा। बात सही भी है कि यथार्थ की जमीन को मनोरंजन की चीज बनाने से बचना चाहिए। हां यह फिल्म हंसी-ठिठोली वाली परिणति से अलग हो सकती थी जब वह संवेदना उसी स्तर की होती जो वास्तविक समस्या है।

प्रमोद कुमार पांडेय

प्रमोद कुमार पांडेय: होरी और घीसू के जीवन में सवेरा अभी भी नहीं आया है : आमिर खान होम प्रोडक्शन की चर्चित फिल्म ‘पीपली लाइव’ में ग्रामीण जन जीवन के चित्रण की काफी चर्चा है। इस फिल्म में यथार्थ की जमीन को प्रभावी तरीके से फिल्माया गया है। सइयां के बहुत कमाने के बावजूद महंगाई द्वारा सताये जाने से लेकर किसानों की आत्महत्या तक का चित्रण किया गया है। आज खेती-किसानी, भूख-बेरोजगारी जैसे मुद्दे लगता है महज ‘वाद-विवाद प्रतियोगिता’ के विषय बन गये हों। क्योंकि पहल कहीं नजर नहीं आती और आती भी है तो राजनीतिक रणनीतियों तक ही सिमट कर रह जाती है। भाजपा के शीर्ष नेता लालकृष्ण आडवाणी, जो कि पत्रकार और फिल्म समीक्षक रहे हैं, उन्होंने कहा है कि पीपली लाइव में किसानों की आत्महत्या को इस तरह से चित्रित करने से बचना चाहिये था। उनका कहना है कि जिन परिवारों के लोग इस त्रासदी से गुजरे हैं, उनके लिए इस फिल्म का हंसी-ठिठोली वाला रूप कितना बेधता होगा। बात सही भी है कि यथार्थ की जमीन को मनोरंजन की चीज बनाने से बचना चाहिए। हां यह फिल्म हंसी-ठिठोली वाली परिणति से अलग हो सकती थी जब वह संवेदना उसी स्तर की होती जो वास्तविक समस्या है।

हिन्दी के महान लेखक प्रेमचंद के ‘गोदान’ का होरी आज भी कर्ज में फंसा हुआ है। सूदखोरी के जाल में फंसा हुआ है। वह जीवन भर कमाता है, संघर्ष करता है, रोज मरता और जीता है… लेकिन वह अपने सपनों से हमेशा बेदखल कर दिया जाता है। ‘कफन’ के घीसू और माधव आज भी नियति के साथ लड़ रहे हैं, उसके साथ हंसी-ठिठोली कर रहे हैं, लेकिन उनकी जिंदगी में अभी भी सवेरा नहीं आया है। यह विडम्बना ही है कि आज की कॉरपोरेट पूंजीतंत्र व्यवस्था के लिए असंख्य होरी और घीसू-माधव कोई मुद्दा नहीं रह गये हैं और वह ऐसी नियति के शिकार हैं कि उनकी समस्या महज मनोरंजक हंसी-ठिठोली बनके रह जाती है। यह समझ में नहीं आता है कि हमारी एक बड़ी आबादी, श्रम-संस्कृति में जीने वाली आबादी की समस्याएं इतने अरसे बाद भी अभी तक समस्या ही क्यों बनी हुई है? जहां करोड़ों बच्चे प्राथमिक शिक्षा से वंचित हों, जहां गरीबों और मध्यवर्ग के लिए शिक्षण संस्थाओं के दरवाजे बन्द हों। खेत-खलिहान, घर-आँगन एकाएक विकास के लिए खाली करा दिया जाए तो वह होरी किस बिना पर जिंदगी को स्वाभाविक प्रक्रिया में जी सकता है? हमारे समाज और राष्‍ट्र की ज्वलंत समस्या वह नहीं है, जिसे कि आज हमारा साहित्य, सिनेमा, कला रच रही है।

भूख, गरीबी, अशिक्षा, पिछड़ापन, बीमारी, प्राकृतिक और सामाजिक आपदाएं, हिंसा, लूट, भ्रष्‍टाचार-ये ऐसी सच्चाईयां हैं, जिनसे कोई भी संवेदनशील फिल्मकार, साहित्यकार, कलाकार या कोई भी व्यक्ति आँखें नहीं मूंद सकता। १८५७ से लेकर स्वाधीनता संग्राम के आंदोलन (१९४७) और अब तक किसान और मजदूर हमारे देश के सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति हैं। इतनी बड़ी सामाजिक शक्ति को चंद कॉरपोरेटों की विजय-यात्रा का शिकार नहीं बनाया जा सकता। अगर आप एक बड़ी आबादी को, मेहनती हाथों को यूं ही गरीबी और बेरोजगारी, खेत-किसानी के बीच उसे मरने के लिए छोड़ देंगे तो फिर देश और समाज का क्या होगा? यह सवाल हर किसी को अपने आप से करना होगा कि जो मेहनती हाथ हैं, जो रचयिता हाथ हैं, जो रोजाना जीवन को बूझने वाले और जीवन से जूझने वाले हाथ हैं, उनकी क्या गलती है कि उनका स्पेस कम होता जा रहा है। कालाहांडी हो या बस्तर यदि हमारी सत्ता व्यवस्था, राजनीतिक व्यवस्था सिर्फ ६० साल बाद भी उनके सिपाही बनकर ही राजनीतिक बढ़त लेना चाह रही हो तो सवाल किया ही जाना चाहिये कि इतने सालों बाद भी हम अपनी रोटी के लिए क्यों जूझ रहे हैं। आखिर क्यों अभी तक हम दो अक्षरों के शब्द ‘वोट’ बनकर रह गये हैं!

की सृजनशीलता चाहे सिनेमा की हो या साहित्य की वह भी नकली है। उससे असल आवाज नहीं निकलती। पीपली लाइव में ग्रामीण जीवन तो दिखता है लेकिन होरी की नियति मजाक बनकर रह जाती है। वह सन्नाटा या चुप्पी या संवेदना नहीं जगती जो कि यथार्थ की रचनात्मक जमीन पर जगनी चाहिये। जब रचना में असल की आवाज दर्ज होती है तो उससे वही निकल कर आता है, जो जमीन का यथार्थ है। सिनेमा मुनाफा देता है। सिनेमा का व्याकरण और अर्थतंत्र मुनाफे की जमीन पर टिका होता है। उसे जाने दीजिये लेकिन आमिर खान ने जो ग्राम्य जीवन का कटु चित्रण किया है, उसे सराहा तो जाना ही चाहिये।

लेकिन, बात वहीं की वहीं है कि हमारे राजनेता जो जनता के विश्वास और उन्हीं के नाम पर सत्ता शीर्ष पर पहुंचते हैं, उन्हें सिर्फ फिल्म देखकर सराहना और बधाई तक नहीं सिमटना चाहिये बल्कि उस समस्या का मिलजुलकर समाधान करना चाहिये जिसे ‘महंगाई डायन खाये जात है।’ आज का किसान गरीबी के बीच कर्ज के जाल में फंसा हुआ है। कर्ज को जीवन की सबसे बड़ी समस्या कहा गया है। ये अलग बात है कि आज की भू-बाजारीकरण की व्यवस्था ऋण को समस्या नहीं मानती बल्कि ऋण का उत्सव (लोन फेस्टिवल) मनाती है। तभी तो होरी के गाय का सपना अभी अधूरा है और पीपली लाइव मुनाफा बटोर रही है।

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...