: राजदूत बनते तो जान बच जाती : मुंबई 2008 में 26/11 के आतंकी हमले के बाद फिर से पिछली 13 जुलाई को धमाकों की शिकार हुई. 1993 के बाद पांचवीं बार हुई इस आतंकी वारदात में लगभग बीस लोग मारे गए और अनेक घायल हुए. पिछली दो-ढाई साल से शांत मुंबई में ऐसा लग रहा था कि अब आतंक को काबू में कर लिया गया है, लेकिन ऐसा न हो सका. इसके ठीक एक दिन पहले अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई के छोटे भाई अहमद वली करजई की कंदहार में उनके विश्वस्त सुरक्षाकर्मी ने घर पर ही गोली मार कर हत्या कर दी. इसकी जिम्मेदारी तालिबान ने ली. वैसे तो हर आतंकी वारदात न जाने कितनों को बेसहारा छोड़ जाती है, संपत्ति की क्षति और दहशत के आलम के अलावा परिजनों-मित्रों और समाज के भावनात्मक रिश्तों पर जो गहरी चोट लगती है, उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो पाती.
कट्टरपंथी सियासत और आतंक का शिकार बेकसूर आम लोग तो सामान्यतः होते ही हैं- राजनेताओं की भी लंबी श्रृंखला है, जो इस दर्द को भुगतते हैं. पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो ने भी इसे भुगता था और बाद में वह खुद भी आतंक का शिकार हो गईं. कभी पिता और भाई को खोने का दर्द बेनजीर की तरह अब अफगान राष्ट्रपति हामिद करजई को भी साल रहा है. पहले पिता अब्दुल अहद करजई को तालिबान के खिलाफ बोलने पर पाकिस्तान में मार डाला गया था और अब भाई को कंदहार में. वैसे इस पीड़ा को बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से ज्यादा कौन महसूस कर सकता है जिनके वालिद बांग्लादेश के राष्ट्रपिता शेख मुजीबुर्रहमान की परिवार के अन्य सदस्यों के साथ दशकों पहले हत्या कर दी गई थी.
हांलाकि सत्ता के लिए षडयंत्र और हत्याएं हमेशा से सियासत का अंग रही हैं, लेकिन कट्टरपंथ और आतंक समाज पर भी दहशत का व्यापक असर छोड़ता है. विभाजनकारी-दकियानूसी-हिंसक प्रवृत्तियों को बढ़ावा मिलता है सो अलग. महात्मा गांधी ऐसी ही प्रवृत्तियों का शिकार हुए थे, जिसका असर आज तक बना हुआ है. बाद में इंदिराजी और राजीवजी भी समाजविरोधी कट्टरवादी ताकतों का ही निशाना बने. पड़ोसी श्रीलंका समेत कई देशों में भी मिलती जुलती कहानियां हैं. हांलाकि मुंबई में आतंकी वारदात की दुनिया के अनेक देशों ने निन्दा की है और सबसे ज्यादा अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने स्पष्ट कहा है कि हमें आतंक से मिल कर लड़ना है. हिलेरी आगामी दिनों में भारत की प्रस्तावित यात्रा पर भी पहुंच रही हैं. संभव है कि दक्षिण एशिया में बढ़ रही ऐसी घटनाओं को लेकर नई संयुक्त योजनाएं भी तय हों.
लेकिन इन प्रत्याशाओं के संदर्भ में विचार ये भी जरूरी है कि अमेरिका ने पाकिस्तान को दी जाने वाली 80 करोड डॉलर की सैन्य सहायता पर रोक लगा दी है और बदले में इस्लामाबाद ने उत्तर-पश्चिम में अपनी सैन्य कार्रवाइयों को रोकने की बात कही है. पाक सरकार के मंत्रियों शहबाज भट्टी, सलमान तसीर के बाद पत्रकार शहजाद की मौत भी हाल की घटनाएं हैं, जो वहां बढ़ती आतंकी गतिविधियों का ही संकेत हैं- गौरतलब ये है कि इनमें पाकी खुफिया तंत्र आईएसआई और सेना की भी मिलीभगत है. तभी तो प्रमुख सैन्य केंद्र के बगल ऐबटाबाद में अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन वर्षों तक रहता रहा और मेहरान सैन्य अड्डों पर 15 घंटे तक आतंकी अरबों की संपत्ति मटियामेट करके तबाही मचाते रहे. अफगानिस्तान में भी इन कट्टरपंथियों ने वली करजई की हत्या कर के स्पष्ट संदेश दे दिया है कि राष्ट्रपति करजई की सरकार खुद अपनी ही रक्षा नहीं कर सकती तो जनता को क्या सुरक्षा देगी.
दरअसल, काबुल के बाद दूसरे प्रमुख शहर कंदहार में व्यवहारिक तौर पर ‘राजा’ या ‘राष्ट्रपति’ के तौर पर अहमद वली करजई जनता के बीच जाने जाते थे. उन्हें दक्षिणी अफगानिस्तान का सबसे ताकतवर शख्स भी माना जाता था. उन पर नौ बार आतंकी हमले हो चुके थे. वैसे उन पर आरोप भी बहुत थे जैसे कि वे व्यापक स्तर पर सरकारी शह से नशीले पदार्थों की तस्करी करते थे और कंदहार में अफगान तालिबान के नेता रहे मुल्ला मुहम्मद उमर के घर को उन्होंने सीआईए को किराए पर दे रखा था. न्युयार्क टाइम्स ने बहुत प्रमुखता से छापा था कि 9/11 के हमले के बाद जब वो शिकागो से वापस कंदहार आए तभी से सीआईए उन्हें नियमित पैसे दिया करती थी. 2007 में अफगान संसद में भी उन पर ड्रग तस्करी के आरोप लगे थे. वली करजई की सबसे बड़ी ताकत उनकी निजी सुरक्षा कंपनियां थीं जैसे वतन रिस्क मॅनेजमेंट और एशिया सिक्योरिटी ग्रुप. ये नाटो और अमेरिकी सेनाओं के आपूर्ति तंत्र को दुरुस्त रखती थीं. उनकी कंदहार में निजी अर्धसैनिक यूनिट ‘कंदहार स्ट्राइक फोर्स’ थी, यह सिर्फ नाटो को मदद ही नहीं करती थी, बल्कि तालिबानियों के सफाए का भी काम करती थी. इसके अलावा वली करजई के अनेक होटल, रियल इस्टेट कंपनियां और टोयोटा कार की डीलरशिप भी थी.
तभी तो कुछ साल पहले 2006 में बढ़ते आरोपों के चलते अमेरिकी राजदूत रोनाल्ड न्युमैन ब्रिटिश राजनयिकों और सीआईए अधिकारियों के साथ राष्ट्रपति करजई से मिले और वली करजई को अफगानिस्तान के बाहर कहीं राजदूत बना कर भेजने का प्रस्ताव रखा. उन्हें उम्मीद थी कि राष्ट्रपति अपने भाई को कहीं बाहर रुखसत कर देंगे, लेकिन हुआ उल्टा. राष्ट्रपति ने आरोपों से पूरी तरह इनकार करते हुए भाई को बाहर भेजने से मना कर दिया. 2009 में विकीलीक्स केबल ने राजदूत के इन्हीं बयानों को उजागर भी किया था. कहने वाले कहते हैं कि भाई के प्यार ने उन्हें बाहर नहीं भेजा और यही उनके लिए जानलेवा साबित हुआ. वैसे वली करजई की हत्या के कुछ महीने पहले कंदहार के डिप्टी गवर्नर अब्दुल लतीफ आशना और वहां के पुलिस प्रमुख खान मुहम्मद मुजाहिद भी आतंकी हमले में मारे गए थे. पिछली अक्टूबर में कुंडूज के गवर्नर इंजीनियर उमर को भी मस्जिद में बम से तब उड़ा दिया गया, जब वो वहां इबादत के लिए गए थे.
‘वाशिंगटन पोस्ट’ के पत्रकार बॉब वुडवर्ड ने जब ‘ओबामा वार्स’ किताब में लिखा कि अमेरिकी अधिकारी मानते हैं कि अफगान राष्ट्रपति करजई डिप्रेशन की दवा खाते हैं, तो भाई वली करजई ने ऐतराज जताते हुए इसे झूठ कहा था. उन्होंने इसे दो संस्कृतियों का अंतर बताया था. वैसे तभी वली करजई द्वारा भाई की तरफदारी के कारण भी तलाशे गए. पिता की हत्या के बाद से दोनों के भावनात्मक रिश्ते तो मजबूत थे ही, लेकिन बड़ा कारण ये भी था कि राष्ट्रपति चुनाव में भाई को फर्जी वोटों और धांधली से जिताने का काम भी मजबूत पैसे वाला भाई वली करजई ही करता था. यह प्रोपेगेंडा भी हो सकता है लेकिन ऐसे आरोप तो लगे ही थे. बहरहाल, जो भी हो, कंदहार में पैदा हुए मौजूदा शून्य को स्थानीय लोकतांत्रिक ताकतों द्वारा भरा जाना ही करजई सरकार की तालिबानियों और कट्टरपंथियों को माकूल जवाब हो सकता है. वैसे अब समय आ गया है कि प्रतिगामी ताकतों को कंदहार ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में अलग थलग किए जाने के संदर्भ में विचार होना चाहिए. आखिर अरब जगत के अनेक देशों की अवाम ने भी इस दिशा में पहल की ही है.
लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

