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मुझे आज के दीपक चौरसियाओं से कोई गिला नहीं है!

जगमोहन फुटेला: नहीं ला सके दिल्‍ली में टीवी वाले बाढ़ : शायद केन्‍द्र सरकार के दबाव में हरियाणा ने समेट लिया बाढ़ : वृहस्पतिवार की सुबह से दीपक चौरसिया और उनके साथी देश को दिल्ली में बाढ़ और दुनिया को कामनवेल्थ खेल न हो सकने से डरा रहे हैं. बाढ़ नहीं आई. आनी ही नहीं थी. आएगी भी नहीं. खेल भी हो के रहेंगे. लेकिन चौरसिया चौकड़ी का चेहरा ज़रूर बेनकाब हो गया. ये भी पहली बार नहीं हुआ है. आप को याद दिला दें कि चौरसिया साहब की ये पहली सनक नहीं है, न उनकी तरफ से पत्रकारिता के साथ हुआ ये पहला मज़ाक….संसद पे हुआ हमला याद है आपको? दीपक चौरसिया तब सबसे तेज़ खबरें देने का दावा करने वाले एक चैनल में महज़ रिपोर्टर हुआ करते थे. उस दिन संसद वे भी पहुंचे थे. उस दिन की उस चैनल की फुटेज इस बात की गवाह है कि भाई साहब कोई डेढ़ घंटे तक संसद परिसर में बम फटने, उसका ज़ोरदार धमाका होने, वहां बम निरोधी दस्ता पहुंचने, भगदड़ मचने से लेकर ऐसे ही और बमों की तलाश तक पे ‘लाइव’ करते रहे.

जगमोहन फुटेला: नहीं ला सके दिल्‍ली में टीवी वाले बाढ़ : शायद केन्‍द्र सरकार के दबाव में हरियाणा ने समेट लिया बाढ़ : वृहस्पतिवार की सुबह से दीपक चौरसिया और उनके साथी देश को दिल्ली में बाढ़ और दुनिया को कामनवेल्थ खेल न हो सकने से डरा रहे हैं. बाढ़ नहीं आई. आनी ही नहीं थी. आएगी भी नहीं. खेल भी हो के रहेंगे. लेकिन चौरसिया चौकड़ी का चेहरा ज़रूर बेनकाब हो गया. ये भी पहली बार नहीं हुआ है. आप को याद दिला दें कि चौरसिया साहब की ये पहली सनक नहीं है, न उनकी तरफ से पत्रकारिता के साथ हुआ ये पहला मज़ाक….संसद पे हुआ हमला याद है आपको? दीपक चौरसिया तब सबसे तेज़ खबरें देने का दावा करने वाले एक चैनल में महज़ रिपोर्टर हुआ करते थे. उस दिन संसद वे भी पहुंचे थे. उस दिन की उस चैनल की फुटेज इस बात की गवाह है कि भाई साहब कोई डेढ़ घंटे तक संसद परिसर में बम फटने, उसका ज़ोरदार धमाका होने, वहां बम निरोधी दस्ता पहुंचने, भगदड़ मचने से लेकर ऐसे ही और बमों की तलाश तक पे ‘लाइव’ करते रहे.

शायद डेढ़ घंटे से भी अधिक समय तक. वे बार-बार अपने कैमरे से वो इलाका भी दिखवाते रहे जहां पर बम फटा था. हैरानी की बात ये कि ये खबर उनकी एक्सक्लूसिव भी थी… थी भी. ये खबर और किसी चैनल पे नहीं आई. न तब. न कभी बाद में. उस बम के किन्हीं टुकड़ों के शॉट खुद उनके चैनल ने भी कभी नहीं दिखाए. बताएं क्यों?…क्योंकि बम जैसा संसद के बाहर कुछ फटा ही नहीं था.

समझ से बाहर है कि जिस धमाके की ज़ोरदार आवाज़ चौरसिया ने सुनी वो आखिर काहे की थी, कहाँ से आई थी. अगर बन्दूक से निकली गोलियों को भी उन्होंने बम धमाके की आवाज़ मान लिया हो तो भी बात समझ में नहीं आती. वे संसद दरअसल गोलियां चल चुकने के भी काफी देर बाद पहुंचे थे. सच तो ये है कि उनके पंहुचने से पहले सेना के दस्ते वहां पंहुच चुके थे और वो उनके ही कैमरे में दिखाई भी दे रहे थे. भारतीय सेना, दिल्ली पुलिस या इस पूरे प्रकरण को लेकर चले मामलों के किसी अदालती रिकार्ड में भी संसद के भीतर या बाहर किसी बम फटने का कोई उल्लेख नहीं है…फिर भी!…डेढ़-पौने दो घंटे तक!!..लाइव!!!

कुछ तो शर्म करो यार. और मज़ाक भी दरअसल आप दर्शकों नहीं, अपने आप से कर रहे हो. जिस दिल्ली में बाढ़, बर्बादी और तबाही का कहर आप मचाते रहे दिन भर, वो कहाँ है? क्या जवाब है आप के पास? क्या कहोगे? क्या कहोगे कि आनी तो थी, नहीं आई तो हम क्या करें?..या शायद कह सकते हो कि आनी ही थी मगर खेलों के आयोजन से डरी और राष्ट्रमंडल देशों के दबाव में आई केंद्र सरकार के अर्दब में हरियाणा ने पानीपत के पास दरार डाल के पानी पानीपत के गाँव में घुसेड़ लिया. ये भी नहीं कह सकोगे. बाढ़ कोई वहां भी नहीं आई.

ये देश का दुर्भाग्य है कि जो नहीं है उसे खबर बनाने वाले, भूखे और ईमानदार पत्रकारों पे हुक्म चलाने के लिए, आज चैनलों में ऊंचे ओहदों पे बैठे हैं. पर, मैं इस बहस को इसके आगे तक ले जाना चाहता हूँ. मुद्दा ये है कि हम, खासकर चैनलों में काम करने वाले लोग आज अफरातफरी मचाने में दिलचस्पी क्यों रखने लगे हैं. मैं एक मिसाल दूंगा. उत्तर भारत के एक शहर में किसी पीड़ित प्रेमी ने जान दे दी. मीडिया ने इसे बढ़ा-चढ़ा के पेश किया. अगले दिन एक और प्रेमी ने आत्महत्या कर ली. मीडिया ने फिर वही किया. मीडिया हर रोज़ तमाशा करता रहा. लोग रोज़ मरते रहे. उसी एक महीने में उन्नीस ने आत्महत्या कर ली.

आप, मैं और इस देश के टीवी चैनलों में काम करने वाले सब लोग जानते हैं कि भीड़ सिर्फ नारे लगा रही होती है. पत्थर वो हमारे कैमरे और कभी कभी तो हमारे इशारे देखने के बाद बरसाना शुरू करती है. आप आज तक के किसी भी चैनल के किसी भी प्रदर्शन के शाट उठा के देख लीजिये, पत्थर जब बरसते हैं तो हम खुद पुलिस की आड़ के बहुत पीछे होते हैं .उस भीड़, भागमभाग या अफरातफरी में कभी कोई गरीब पत्रकार घायल हुआ भी तो सिर्फ वो, जिसे उन धुरंधर पत्रकारों के खेल का पता नहीं होता जो हर हाल में खबर ‘बनाने’ के लिए निकले होते हैं.

एक कवि सम्मलेन हो रहा था कहीं. सब के सब घटिया कवि. पहले हूटिंग शुरू हुई. फिर गालियाँ. कुछ श्रोता लट्ठ लेकर स्टेज पर चढ़ गए. माइक पर खड़ा कवि बोला, ‘भाइयों अपना काम शुरू करो हमें तो ऐसी ही कवितायें आती हैं.’ लट्ठधारी ने कहा, ‘भाई तेरी कोई गलती नहीं, तू अपना कवितापाठ जारी रख. हम तो दरअसल उनकी तलाश में हैं, जो तुम्हें बुला के लाये हैं.’ सच पूछिए, मुझे आज के दीपक चौरसियाओं से कोई गिला नहीं है..!!

लेखक जगमोहन फुटेला वरिष्ठ पत्रकार हैं और इन दिनों वेब मीडिया की दुनिया में सक्रिय हैं.

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