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रघुवंशम् विरोधम् हुंकारम्

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 8 : बोले तो बोले रघुवंश बाबू भी बोले। लालू जी के विरोध में बोले। रामबिलास जी के विरोध में बोले। नीतीश कुमार पर चुप रहे। सुशील मोदी पर ध्यान ही नहीं दिया। कांग्रेस पर ध्यान दिया। अपने अनुज भ्राताश्री रघुपति का बचाव किया। सब कुछ किया पर यह समझ में न आया कि वह चाहते क्या हैं। जाहिर है कि अब जगदानंद की बारी है। वह रघुवंश बाबू के विरोध में बोल सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वह रघुवंश बाबू और लालू जी के बीच में न पड़ें। जगदानंद की गिनती समझदार लोगों में होती है। इतने समझदार हैं कि भ्रष्टाचार के डर से अपने विभागों में इतना भ्रष्टाचार मिटाया कि कुछ काम न हुआ। इसका फायदा नीतीश कुमार ने उठाया कुछ काम कर दिखाया। रघुवंश बाबू भी जब केंद्रीय मंत्री थे तो बहुत काम करते थे। बहुत बड़ा मंत्रालय था उनके पास – ग्रामीण विकास।

जुगनू शारदेय

जुगनू शारदेय: कुछ बातें बेमतलब 8 : बोले तो बोले रघुवंश बाबू भी बोले। लालू जी के विरोध में बोले। रामबिलास जी के विरोध में बोले। नीतीश कुमार पर चुप रहे। सुशील मोदी पर ध्यान ही नहीं दिया। कांग्रेस पर ध्यान दिया। अपने अनुज भ्राताश्री रघुपति का बचाव किया। सब कुछ किया पर यह समझ में न आया कि वह चाहते क्या हैं। जाहिर है कि अब जगदानंद की बारी है। वह रघुवंश बाबू के विरोध में बोल सकते हैं। यह भी हो सकता है कि वह रघुवंश बाबू और लालू जी के बीच में न पड़ें। जगदानंद की गिनती समझदार लोगों में होती है। इतने समझदार हैं कि भ्रष्टाचार के डर से अपने विभागों में इतना भ्रष्टाचार मिटाया कि कुछ काम न हुआ। इसका फायदा नीतीश कुमार ने उठाया कुछ काम कर दिखाया। रघुवंश बाबू भी जब केंद्रीय मंत्री थे तो बहुत काम करते थे। बहुत बड़ा मंत्रालय था उनके पास – ग्रामीण विकास।

अपने मंत्रालय के काम के साथ-साथ पत्र भी बहुत लिखा करते थे। कहा जाता है कि उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 2006 से 2009 के बीच में इतनी चिट्ठियां लिखीं कि नीतीश कुमार ने पत्रों का जवाब देना ही बंद कर दिया। रघुवंश बाबू के पत्रों के कारण हर प्रकार की चिट्ठियों का जवाब भी नीतीश कुमार ने बंद कर दिया। जानकार बताते हैं कि जैसे ही मुख्यमंत्री को सूचना मिलती थी कि रघुवंश बाबू की चिट्ठी आई है – वह गाना गाने लगते थे। हाल की कवितागिरी उन्हीं पत्रों का असर है। अपने अंत:पुर के दरबार में वह गाते भी थे कि चिट्ठी आई है, चिट्ठी आई है, नरेगा की दुहाई है – रघुवंश बाबू की सिर खपाई है…।

नतीजा यह निकला कि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय में नीतीश कुमार अनेक एनजीओ के समान ब्लैक लिस्टेड हो गए। मौजूदा केंद्रीय गामीण विकास मंत्री उसी का लाभ उठाते हैं। नरेगा को मनरेगा बना कर नीतीश कुमार की खिंचाई करते हैं। राहुल बाबू भी उन्हीं फाइलों के बल पर नीतीश कुमार को हड़काते हैं। शुक्र है कि रघुवंश बाबू ने लालू जी को चिट्ठी नहीं लिखी। सीधे-सीधे विरोध कर दिया कि कांग्रेस का साथ छोड़ना गलत था। इतना ही नहीं लोजपा को साथ लेना भी गलत था। एनडीए की बढ़त भी बता दी लोजपा के कारण और लालू जी के प्रति समर्थन भी जता दिया कि लालू जी सामाजिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। समाज क्या है। यह परिवार से बनता है। लालू जी अपने परिवार का भी नेतृत्व कर रहे हैं। उनसे प्रेरणा ले कर रघुवंश बाबू ने भी अपने परिवार का नेतृत्व करना शुरू कर दिया है। सच तो यह है कि जिनके पास परिवार है, वह अपने परिवार का नेतृत्व करते ही हैं। परिवार कोई नीतीश कुमार नहीं कि ब्लैक लिस्टेड कर दिया जाए।

रघुवंश बाबू अपने नेता लालू जी और अपनी पार्टी राजद से नाराज नहीं हैं। पुराने लोहियावादी हैं। वाणी में स्वतंत्रता और कर्म में अनुशासन में विश्वास करते हैं। इसलिए वाणी से अपने कांग्रेसी टिकटधारी भाई का समर्थन करेंगे और कर्म को इतना अनुशासित रखेंगे कि लालू जी कहने पर राजद के लिए वोट भी मांगेगें ।

जुगनू शारदेय हिंदी के जाने-माने पत्रकार हैं. ‘जन’, ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ से शुरू कर वे कई पत्र-पत्रिकाओं के संपादन/प्रकाशन से जुड़े रहे. पत्रकारिता संस्थानों और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में शिक्षण/प्रशिक्षण का भी काम किया. उनके घुमक्कड़ स्वभाव ने उन्हें जंगलों में भी भटकने के लिए प्रेरित किया. जंगलों के प्रति यह लगाव वहाँ के जीवों के प्रति लगाव में बदला. सफेद बाघ पर उनकी चर्चित किताब “मोहन प्यारे का सफ़ेद दस्तावेज़” हिंदी में वन्य जीवन पर लिखी अनूठी किताब है. इस किताब को पर्यावरण मंत्रालय ने भी 2007 में प्रतिष्ठित “मेदिनी पुरस्कार” से नवाजा. फिलहाल दानिश बुक के हिन्‍दी के कंसल्टिंग एडिटर हैं तथा पटना में रह कर स्वतंत्र लेखन कर हैं.

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