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लाभ का सर्वश्रेष्‍ठ धंधा बना राजनीति

बी पी व्यापारिक दृष्टि से देखा जाये तो राजनीति सर्वश्रेष्ठ व्यापारिक क्षेत्र बनता जा रहा है। बात आश्चर्यचकित कर देने वाली है, लेकिन है एक दम सच, क्योंकि वर्तमान राजनीतिक वातावरण देखते हुए स्पष्ट नजर आ रहा है कि राजनेता राजनीति में धन को व्यापार की तरह ही इन्वेस्ट कर रहे हैं और किसी भी तरह तीन, चार या पांच गुना नहीं, बल्कि दस गुने से भी अधिक वसूलने में लगे हैं, इसीलिए जनप्रतिनिधि की परिभाषा बदल गयी है और इसीलिए शासन के साथ प्रशासन के भी हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। संवैधानिक ढांचा तैयार करते समय जनप्रतिनिधियों को निधि आरक्षित करने की जरुरत महसूस नहीं की गयी, तभी जनप्रतिनिधियों को निधि की व्यवस्था नहीं रखी गयी। निधि की व्यवस्था न होने तक विभिन्न स्तरों पर जनप्रतिधि प्रस्ताव देते थे, जिस पर शासनादेशों के अनुसार अमल होता था, लेकिन निधि की व्यवस्था न होने के कारण कई तरह की व्यवहारिक परेशानियां भी सामने आ रही थीं। छोटे-छोटे विकास कार्यों के लिए भी जनप्रतिनिधियों को लंबी प्रक्रिया तय करनी पड़ती थी, इसलिए बेहद जरुरी समझते हुए जनप्रतिनिधियों को निधि की व्यवस्था कर दी गयी, जो समय के साथ अब करोड़ों में हो गयी है।

बी पी

बी पी व्यापारिक दृष्टि से देखा जाये तो राजनीति सर्वश्रेष्ठ व्यापारिक क्षेत्र बनता जा रहा है। बात आश्चर्यचकित कर देने वाली है, लेकिन है एक दम सच, क्योंकि वर्तमान राजनीतिक वातावरण देखते हुए स्पष्ट नजर आ रहा है कि राजनेता राजनीति में धन को व्यापार की तरह ही इन्वेस्ट कर रहे हैं और किसी भी तरह तीन, चार या पांच गुना नहीं, बल्कि दस गुने से भी अधिक वसूलने में लगे हैं, इसीलिए जनप्रतिनिधि की परिभाषा बदल गयी है और इसीलिए शासन के साथ प्रशासन के भी हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। संवैधानिक ढांचा तैयार करते समय जनप्रतिनिधियों को निधि आरक्षित करने की जरुरत महसूस नहीं की गयी, तभी जनप्रतिनिधियों को निधि की व्यवस्था नहीं रखी गयी। निधि की व्यवस्था न होने तक विभिन्न स्तरों पर जनप्रतिधि प्रस्ताव देते थे, जिस पर शासनादेशों के अनुसार अमल होता था, लेकिन निधि की व्यवस्था न होने के कारण कई तरह की व्यवहारिक परेशानियां भी सामने आ रही थीं। छोटे-छोटे विकास कार्यों के लिए भी जनप्रतिनिधियों को लंबी प्रक्रिया तय करनी पड़ती थी, इसलिए बेहद जरुरी समझते हुए जनप्रतिनिधियों को निधि की व्यवस्था कर दी गयी, जो समय के साथ अब करोड़ों में हो गयी है।

वर्तमान में विधायकों/सांसदों को जितनी निधि दी जा रही है, वह सम्बंधित क्षेत्रों में ईमानदारी से उपयोग करा दी जाये तो सरकार को विकास कार्यों के लिए अलग से धन देने की जरुरत नहीं पड़ेगी, पर हैरत की ही बात कही जायेगी कि विधान सभा व विधान परिषद सदस्य, लोकसभा व राज्य सभा सदस्यों के साथ ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत, जिला पंचायत व लोक निर्माण विभाग के अलावा अन्य केन्द्रीय व राज्य स्तरीय योजनाओं के माध्यम से प्रति वित्तीय वर्ष करोड़ों रुपये प्रत्येक जनपद या विधान सभा क्षेत्र के विकास के लिए आता है, जो कहां चला जाता है, इसकी जानकारी किसी को कानों-कान भी नहीं हो पाती, जबकि कागज बताते हैं कि विभिन्न मदों में करोड़ों रुपया खर्च होता है और लगातार हो रहा है।

विकास के लिए आने वाला यह जरुरी धन जा कहां रहा है? इस सवाल की तह में जाने की कोशिश की तो और भी चौंकाने वाला सच सामने आया। उत्तर प्रदेश के कई जनपदों का लेखा-जोखा देखने पर पता चला कि विधायकों ने एक वित्तीय वर्ष की पूरी निधि एक ही मद में दे रखी है और दूसरे वर्ष निधि का समस्त रुपया किसी दूसरी और एक ही मद में दे दिया, इसी तरह तीसरे वर्ष भी पूरा रुपया तीसरी एक ही मद में दे दिया। ऐसा कैसे और क्यों हो रहा है, यह जानना और भी बेहद जरुरी हो गया, तो पता चला कि विधायकों की मांग पर शासन ने स्वागत द्वारों को विधायकों के कार्य क्षेत्र में शामिल करने का फरमान जारी कर दिया और विधायकों ने अपनी सुविधा के अनुसार साढ़े चार से साढ़े छ: लाख रुपये तक का एस्टीमेट बनवा लिया। प्रदेश के विभिन्न जनपदों में एस्टीमेट अलग-अलग ही देखने को मिल रहा है।

इंजीनियर्स ने बताया कि यह लोहे का गेट नब्बे हजार से लेकर सवा लाख के बीच में बन कर तैयार हो जाता है। एक वर्ष की पूरी निधि लोहे व सीमेंट के यात्री शेड पर खर्च होती देखी गयी, जिसका एस्टीमेट साढ़े तीन लाख से साढ़े चार लाख तक का है, जबकि यात्री शेड भी सवा लाख से कम लागात में बन कर तैयार हो जाता है। एक वर्ष की निधि में विधायकों ने गांवों में हाईमास्ट लाइट्स लगवा दीं, जिसका एस्टीमेट पचहत्तर हजार से पिचासी हजार रुपये तक देखने मिला, जबकि एक लाइट पैंतीस हजार रुपये से कम में ही लग जाती है। यहां गौर करने की बात यह है कि यह लाइट्स ऐसे-ऐसे गांवों में भी लगी देखी जा सकती हैं, जहां आजादी से अब तक बिजली पहुंची ही नहीं है और न ही बिजली पहुंचाने के लिए जनप्रतिनिधि सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। अब सवाल यह उठता है कि बाकी धन कहां जा रहा है, तो समझना अब अधिक मुश्किल नहीं है कि धन कहां जा रहा होगा?

इसी तरह माननीय जनप्रतिनिध निजी विद्यालयों को धन खुले दिल से देते देखे जाते हैं। इसके पीछे भी यही बताया जाता है कि चालीस प्रतिशत कमीशन का खुला रेट चल रहा है, जो माननीय सदस्य लेने के बाद ही सम्बंधित विद्यालय के नाम प्रस्ताव जारी करते हैं। इस तरह का खेल उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश के बाकी राज्यों में देखने को मिल रहा है, तभी चुनाव प्रचार के दौरान विधान सभा सदस्य पद के प्रत्याशी खर्च का एक करोड़ का आंकड़ा भी पार करते देखे जा सकते हैं, इसीतरह लोकसभा सदस्य बनने के लिए प्रत्याशी तीन से पांच करोड़ तक बहाते देखे जाते हैं। इसी तरह ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत प्रमुख, जिला पंचायत सदस्य, जिला पंचायत अध्यक्ष पद हथियाने के लिए भी दावेदार बुरी तरह रुपया बहाते देखे जा रहे हैं। इस सबसे जाहिर है कि राजनीति व्यपारिक दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ लाभ का क्षेत्र बनता जा रहा है, जिसमें इन्वेस्ट करने के बाद बड़ी आसानी से कई गुना रुपया वसूल हो जाता है, तभी राजनीति के प्रति अब क्रेज भी बढ़ता दिख रहा है।

लेखक बी पी गौतम स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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