Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

तेरा-मेरा कोना

लोकतांत्रिक जनभक्षियों की शिनाख्‍त आसान नहीं!

[caption id="attachment_2336" align="alignleft" width="71"]प्रमोद पांडेयप्रमोद[/caption]: राजनीति में भलमनसाहतों के लिए ‘नो एंट्री’ है : यह पंडित नेहरू थे। देश के पहले प्रधानमंत्री, बापू के ‘लेनिन’ और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘ऋतुराज’ तथा आधुनिक भारत के निर्माता। उन्होंने कहा था – ‘लोकतंत्र इसीलिए अच्छा है क्योंकि अन्य (शासन-पद्धति) इससे भी खराब हैं।’ हमारे जैसे लोकतंत्र में ‘लोक’ ही सर्वोच्च है और संविधान उसका संरक्षक और नियंता। विरुद्धों के सामंजस्य चरित्र को जीने वाले भारत की एकदेशीयता, एकता और आजादी के लिए न जाने कितने जाने- अनजाने महानायकों ने अपना बलिदान दिया। वे लोग आपस में वैचारिक रूप से जूझते हुए, लड़ते-झगड़ते हुए एक महान राष्ट्र के सपने को अपने दिलों में लिए हुए थे। जिसमें हर तरह की विषमता और खाई पट जाए। वे देश बनाने के लिए लड़ रहे थे। रास्ते अलग थे, विचार अलग थे, लेकिन लक्ष्य एक था, देश की आजादी और नवनिर्माण! वे सभी लोग देश और समाज-संस्कृति के लिए जीते-मरते थे।

प्रमोद पांडेय

प्रमोद पांडेय

प्रमोद

: राजनीति में भलमनसाहतों के लिए ‘नो एंट्री’ है : यह पंडित नेहरू थे। देश के पहले प्रधानमंत्री, बापू के ‘लेनिन’ और गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के ‘ऋतुराज’ तथा आधुनिक भारत के निर्माता। उन्होंने कहा था – ‘लोकतंत्र इसीलिए अच्छा है क्योंकि अन्य (शासन-पद्धति) इससे भी खराब हैं।’ हमारे जैसे लोकतंत्र में ‘लोक’ ही सर्वोच्च है और संविधान उसका संरक्षक और नियंता। विरुद्धों के सामंजस्य चरित्र को जीने वाले भारत की एकदेशीयता, एकता और आजादी के लिए न जाने कितने जाने- अनजाने महानायकों ने अपना बलिदान दिया। वे लोग आपस में वैचारिक रूप से जूझते हुए, लड़ते-झगड़ते हुए एक महान राष्ट्र के सपने को अपने दिलों में लिए हुए थे। जिसमें हर तरह की विषमता और खाई पट जाए। वे देश बनाने के लिए लड़ रहे थे। रास्ते अलग थे, विचार अलग थे, लेकिन लक्ष्य एक था, देश की आजादी और नवनिर्माण! वे सभी लोग देश और समाज-संस्कृति के लिए जीते-मरते थे।

आज राजनीति एक ऐसी रपटीली राह बन चुकी है जहां भलमनसाहतों के लिए ‘नो एन्ट्री’ है । ऐसा नहीं कि भले लोग खत्म हो गये या कम हो गये, लेकिन वे परिदृश्य से गायब कर दिये गये हैं। गायब हो गये हैं। उनकी मौजूदगी है भी तो दुर्लभ जीवाश्म की तरह! संविधान के जनतांत्रिक मूल्य-समता, स्वतंत्रता, धर्म निरपेक्षता, न्याय, भ्रातृत्व का क्षरण होता जा रहा है। गांधी, अंबेडकर, जयप्रकाश, लोहिया के अनुयायी बाहुबलियों के आगे नतमस्तक होने को विवश हैं, क्योंकि वे ‘अल्पसंख्यक’ हैं इस भरी दुनिया में। पूरा जनतंत्र मानो वोटतंत्र और भीड़तंत्र में समा गया हो!

महाराष्ट्र के ‘नवनिर्माण’ के लिए सेना (मनसे) बनाने वाले राज ठाकरे एक व्यक्ति नहीं बल्कि आधुनिक राजनीतिक संस्कृति का नाम है, जिसमें जो जितना गिरने की होड़ में शामिल होता है, वह उतना ही नायकत्व से लैस होता जाता है। मुंबई हमारे बाप की है, दिल्ली उनके बाप की है, गुवाहाटी उनकी रियासत है और पटना हमारा है, भोपाल, लखनऊ… सिलसिला रूकता नहीं, फिर हिन्दुस्तान किसके बाप का है? भाषा, मराठी मानुष के लिए देश की राजनीति को अपनी तरफ मोड़ देने वाली इस राजनीतिक संस्कृति को बाल गंगाधर तिलक, बाबू राव विष्णु पराडकर से क्या मतलब? शिवसेना और मनसे के इस राजनीतिक कारोबार को महाराष्ट्र की सत्ता का भी समर्थन हासिल है। बिना समर्थन के कानून हाथ में लेना सम्भव ही नहीं। जनसमर्थन चाहे जिस स्तर का हो वह तो हासिल है ही।

एक और बात पर खुली चर्चा होनी चाहिए कि इस तरीके की उपराष्ट्रवाद क्यों पनपती है। नेता और पार्टी अगर नफरत फैलाने वाले है तो उन्हें जनसमर्थन कैसे हासिल हो जाता है? क्षेत्रीयता, भाषावाद, रोजगार में भागीदारी को लेकर एक स्पष्ट और निर्णायक बहस होनी चाहिए तथा देश की एकता और अस्मिता को मजबूती से बरकरार रखने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा अरूणाचल से गुजरात तक विकास का विकेन्द्रीकरण होना चाहिए। उत्तर भारतीय नेताओं को भी सिर्फ ठाकरे और राज को कोस कर काम चलाने से बचना होगा। उन्हें केन्द्र से उचित हक-हकूक की मांग रखते हुए अपने राज्य में रोजी-रोजगार तथा विकास की धारा फैलानी होगी। इस देश का नागरिक कहीं भी रोजी-रोटी के लिए जा सकता है, से खाना पूर्ति करने की आदत से बचना होगा। नीतीश, लालू, मुलायम, मायावती, शिवराज सभी को अपने-अपने राज्य में हर शिक्षित-अशिक्षित को रोजगार कैसे मिले इस पर चिन्तन-मनन करनी होगी।

फिर क्या किया जाना चाहिए? क्या इस देश में कानून, संविधान, शासन तंत्र को कोई मतलब नहीं रह गया? चुनी हुई चुप्पियां,  सुविधाजीवी विरोध के स्वर, लोकतंत्र के ‘गेम’ और व्यर्थता बोध से सिक्त लेखन-प्रसारण! क्या सभी अपना-अपना ‘धंधा’ कर रहे है! सत्ता पक्ष कुछ भी कहे-करे विपक्ष विरोध प्रदर्शन का अपना काम करता है, सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ता धरना-प्रदर्शन पुतला फूंकने और जेल जाने का काम करता है, पुलिस प्रशासन अपना काम करता है। कोई लम्पट नायक कहता है- ‘यह हमारा है, वह तुम्हारा है’ और फिर वहीं खों खों, हें हें। संसद से सड़क तक के कवि ‘धूमिल’ के शब्दों में कहे तो पूरा तंत्र ही अपराधियों का संयुक्त परिवार है?

संसदीय बहसें अपनी गरिमा खो रही हैं और संसदीय व्यवहार सड़क छाप गली मार्का हो गयी है। ‘धर्म की राजनिति’ की दुहाई देने वाले ‘राजनीति के धर्म’ की कोई परवाह नहीं करते। जातीय-क्षेत्रीय-सांप्रदायिक क्षत्रप ताल ठोककर अपने निहायत स्वार्थी एजेन्डे पर काम करते हैं। आम नागरिक असुरक्षा, हताशा की मनोवैज्ञानिक ग्रंथी से इस कदर ग्रस्त है कि कोई समाधान नजर नहीं आता। गरीबी, यातना-शोषण को अपने जीवन में ठीक प्रकार से जीने वाले लोग ही ऊंचाई पर पहुंच कर उस वर्ग-संस्कृति को जीने लगते हैं जिसके कि वे कभी शिकार रहे। उनका वर्ग चरित्र, उनकी नैतिकता, उनके हित घुलमिल जाते है उन्हीं सरोकारों के नाम जिसके प्रतिरोध स्वरूप वे ‘नायक’ बने। फिर किससे आशा की जाय?

क्या यह अच्छा नहीं होगा, जैसा कि महान कवि ब्रेख्त अपनी एक कविता में कहते हैं- वे सभी जो जनतंत्र से डरे हुए हैं, वे जनतंत्र को ही भंग कर दें और अपने लिए एक ‘नयी जनता’ चुन लें। युवा पत्रकार-कवि व पटकथा लेखक प्रदीप तिवारी की काव्य-पंक्तियां हैं- जन-भक्षियों की शिनाख्त आसान नहीं/आदमखोर जानवरों को/पालतू बना चुके है जनभक्षी/भूख से मरते हजारों लोगों के/हिस्से का अनाज/वर्षो से उनके गोदामों में बंद है/इसी अनाज की खरीद के लिए/बोलियां लगा रही हैं/बहुराष्ट्रीय कंपनियां/इंटरनेट पर है जनभक्षियों की/पेशेवर मुस्कानें/सूचना पथ पर उनके/खूंरेजी पंजों के निशान हैं।

लेखक प्रमोद कुमार पांडेय पत्रकारिता विषय के शिक्षक हैं.

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You May Also Like

मेरी भी सुनो

अपनी बातें दूसरों तक पहुंचाने के लिए पहले रेडियो, अखबार और टीवी एक बड़ा माध्यम था। फिर इंटरनेट आया और धीरे-धीरे उसने जबर्दस्त लोकप्रियता...

राजनीति-सरकार

मोहनदास करमचंद गांधी यह नाम है उन हजार करोड़ भारतीयों में से एक जो अपने जीवन-यापन के लिए दूसरे लोगों की तरह शिक्षा प्राप्त...

साहित्य जगत

पूरी सभा स्‍तब्‍ध। मामला ही ऐसा था। शास्‍त्रार्थ के इतिहास में कभी भी ऐसा नहीं हुआ कि किसी प्रश्‍नकर्ता के साथ ऐसा अपमानजनक व्‍यवहार...

मेरी भी सुनो

सीमा पर तैनात बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने घटिया खाने और असुविधाओं का मुद्दा तो उठाया ही, मीडिया की अकर्मण्यता पर भी निशाना...