: हमेशा नैतिक जनशक्ति ही निर्णायक रही है- गांधी का रास्ता भी यही है : क्या बर्मा की प्रख्यात लोकतांत्रिक गांधीवादी नेता और नोबेल पुरस्कार विजेता आंग सान सूकी की तुलना भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल को लेकर आंदोलनरत अन्ना हजारे से की जा सकती है? जाहिर है यह सवाल चौकाता है. लेकिन इस पर विचार के पहले सूकी के बारे में इस खबर पर कृपया गौर करें कि सूकी ने बर्मा में लोकतंत्र लाने के लिए गांधी के अहिंसक रास्ते को छोड़ने तक की बात कही है. उन्होंने हिंसा की वकालत की है.
यह बात हर किसी को इसलिए चौंकाती है कि जो सूकी पिछले 21- 22 वर्षों में से 15 साल अहिंसक गांधीवादी आंदोलन चलाते हुए नजरबंद रह चुकी हैं, जिन्हें गांधी मार्ग पर चलने वाले दुनिया के चन्द प्रमुख नेताओं में से एक माना जाता है, जिसने दशकों पहले दिल्ली में पढ़ाई करते वक्त गांधी के विचारों-सिद्धांतों को गहराई से जाना समझा था, और फिर जिसने सोच-समझकर जीवन का लंबा कालखंड गांधी के बताये रास्ते पर चलने में बिताया, जिसे बर्मा में लोकतंत्र और मानवाधिकार के लिए अहिंसक संघर्ष का नोबेल पुरस्कार भी मिला, वही अब 66 वर्ष की अवस्था में यदि गांधी के ‘साध्य और साधन की पवित्रता’ के विचार को तिलांजलि देकर हिंसा की ओर जाने की बात कहे तो सहसा विश्वास नहीं होता. विदेश में बसे परिवार और बच्चों से दूर कभी बर्मा छोड़कर न जाने वाली सूकी ऐसा भी सोच सकती हैं- यह बात बहुतों के गले नहीं उतर रही. लेकिन यह
सच है. सूकी ने लंदन में वीडियो के जरिए दिए भाषण में यह भी कहा कि, ‘मैंने अहिंसा को नैतिक कारणों से नहीं, बल्कि उसकी व्यवहारिकता और राजनीतिक वजहों से अपनाया था.’ तो क्या सूकी का यह कथन किसी हताशा या निराशा का द्योतक है? क्या वह संघर्ष से हार चुकी हैं? या फिर वो ऐसा कह कर अपने समर्थकों को फिर से निर्णायक संघर्ष के लिए एकजुट करने का आखिरी प्रयास कर रही हैं?
जो भी हो, लेकिन सूकी और अन्ना हजारे जैसे दोनों गांधीवादियों का यह साम्य ही है कि दोनों ने दशकों से गांधी को अपने ढंग से जिया है. दोनों जिद के पक्के हैं, जो ठान लेते हैं, करते हैं. दोनों ने दुनिया के सामने मिसाल पेश की है. लेकिन अब दोनों ही मौजूदा तंत्र और उसके तौर तरीकों से निराश हैं. अन्ना आगामी 16 अगस्त से अनशन करने पर आमादा हैं. उनका मानना है कि सरकार का रवैया लोकपाल को लेकर सकारात्मक नहीं हैं. संयुक्त समिति में सरकारी पक्ष की ओर से जो मसौदा रखा गया है, उसमें लोकपाल के दायरे से जहां प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश समेत अन्य न्यायमूर्तियों को तो अलग रखा ही गया है, साथ ही सांसदों और संसद में उनके ‘आचरण’ और उच्च अधिकारियों को भी लोकपाल के दायरे से बाहर रखा गया है.
सिविल सोसायटी के मसौदे के अनुसार यह अस्वीकार्य है. सरकारी पक्ष की ओर से भले ही सिर्फ चन्द बिंदुओं पर विवाद की बात कही जाए लेकिन सच्चाई यही है कि यह दो दृष्टियों का फर्क है, जिसका एक होना मुश्किल है. सीबीआई जैसी संस्था को भी लोकपाल के दायरे में लाना सरकार को मान्य नहीं है. अब कहा जा रहा है कि विभिन्न पार्टियों की बैठक होगी, साथ ही सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भी राय ली जाएगी. कैबिनेट में भी विचार होना है.बहरहाल, इन सारी औपचारिकताओं के बाद भी किसी मसौदे पर एकराय हो पाएगी – इसके आसार बहुत कम हैं. अन्ना हजारे की टीम भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने के लिए वो सबकुछ प्रस्तावित कर रही है जो आदर्श हैं, तो सरकार ने अब यह कहना शुरू कर दिया है कि लोकपाल के रूप में किसी समानान्तर सरकार या गैर संवैधानिक व्यवस्था को नहीं माना जा सकता.
अब द्वंद्व खुलकर सामने आ गया है. अब दिल्ली के सत्ता चक्रव्यूह में अन्ना की कुछ कुछ वैसी ही घेरेबंदी शुरू होने के आसार हैं, जैसी बाबा रामदेव की हुई थी. सत्ता कोई भी हो, उसका अपना अलग चरित्र होता है- और वह अपने सधे दांव चलने में माहिर होती है. वह डरती है तो सिर्फ जनता की एकजुटता से – उसकी नैतिक ताकत से. गांधी की बात करने वालों को समझना चाहिए कि गांधी की ताकत हमेशा से यही नैतिक जनशक्ति थी. यही वजह थी कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अलावा कभी भी ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार की हिम्मत गांधी को आंदोलन के दरम्यान गिरफ्तार करने की नहीं होती थी. और, गांधी इस नैतिक जनशक्ति को जगाने का काम हमेशा ही अनवरत रूप से करते भी रहते थे. तभी तो हर आंदोलन के पहले वो रचनात्मक कार्यक्रमों के आधार पर लंबी तैयारी करते थे और हमेशा उनके दो आंदोलनों के बीच लम्बा अंतराल भी रहता था. और सबसे खास बात यह थी कि इसीलिए गांधी देश की नब्ज को पहचानते हुए इस नैतिक शक्ति यानी कि उसकी आत्मा को दिल्ली से दूर किसी सुदूर अंचल में जगाते दिखते हैं, फिर चाहे वो साबरमती हो, वर्धा हो, या फिर कोई और जगह. गांधी बार बार गांव-गांव पैदल घूमते और देश की इसी नैतिक ताकत को जगझोरते दिखाई देते हैं.
लेकिन दुर्भाग्य कि आज गांधीटोपी है, बापू का गुणगान है, अचंभित करने वाले गांधी के तरीके अपनाने पर नोबेल पुरस्कार है, लेकिन जनता को उस तरह अंदर तक कोई कुरेदता नहीं, नतीजतन जनता जागती भी नहीं. और अगर थोड़ा बहुत जागती भी है तो सिर्फ वक्ती तौर पर. इसीलिए बाबा रामदेव को आंधी रात को पुलिस से बचकर भागने के लिए मंच से कूदना पड़ता हैं. महिलाओं के वेश में छिपना पड़ता है. लेकिन लोग यह भूल जाते हैं कि गांधी ने ऐसा कभी कुछ नहीं किया. दिल्ली के सत्ता षडयंत्र से भी भरसक दूर रहे- क्योंकि वह अच्छी तरह जानते थे कि उनकी शक्ति का स्त्रोत कोई राजधानी या महानगर कभी नहीं हो सकता, वो तो किसी उपेक्षित सुदूर अंचल की पगडंडी से निकलने वाली गंगोत्री के जनशक्ति में परिवर्तित होने वाली गंगा ही हो सकती है, जो बिना किसी विभेद के हर किसी के लिए जीवनदायिनी से कम नहीं- जिसका सीधा रिश्ता लोगों की आत्मा से है.
यही वजह है कि 1989 के चुनाव में जीत के बाद भी जब सूकी को बर्मी सैनिक सरकार लंबे समय तक जेल में डाल देती है, उनकी पार्टी में फूट डलवा देती है, और फिर दशकों बाद हुए चुनाव में सूकी के बहिष्कार के बाद उनकी पार्टी पर भी बंदिशें लगा देती है- तो हताशा में सूकी अमेरिकी कांग्रेस के सांसदों को वीडियो संदेश भेजकर बर्मा के घटनाक्रमों की जांच का आग्रह ही नहीं करती, बर्मा सरकार पर प्रतिबंध की फरियाद भी करती हैं. वो बीबीसी के एक कार्यक्रम के लिए गुप्त रूप से भाषण रिकॉर्ड करवाती हैं. उनको लगता है कि दुनिया उनके संदेश को सुनेगी और बर्मा में लोकतंत्र आ जाएगा, या कम से कम इस बारे में कोई पहल होगी. लेकिन, काश! ऐसा हो पाता. वो भूल जाती हैं कि बर्मा का भविष्य बर्मा जनता ही गढ सकती है, कोई और नहीं. सूकी आज जब सत्ता के षडयंत्र के चलते जनता से दूर होती हैं, उनके समर्थकों की संख्या में भारी कमी होती है, तो निराशा में वो हिंसा अपनाने की बात कह जाती हैं. वो अफ्रीकी नेता देसमंद टूटू की तारीफ करती हैं, लेकिन गांधी और मार्टिन लूथर किंग जूनियर की विजय यात्रा के मर्म को भूल जाती हैं.
अच्छी बात है कि सूकी ने फिर से बर्मी जनता से मुलाकात के लिए देश की यात्रा की इजाजत बर्मी सरकार से मांगी है. लगता नहीं कि ये इजाजत उन्हें मिलेगी. लेकिन अन्ना हजारे को तो ऐसी किसी इजाजत की जरूरत नहीं है- उन्हें यदि सच में देश में बदलाव लाना है तो गांवों की ओर लौटना होगा. सिर्फ मुंबई के पत्रकार जे. डे. की मौत पर ही चिंता नहीं जतानी होगी, बल्कि पिछले 11 साल से सैन्य बलों के विशेष अधिकार कानून के खात्मे के लिए उत्तर पूर्व में अनशनरत इरोम शर्मिला के साथ भी खड़ा होना होगा और सौ दिनों से ज्यादा अनशन करके जान देने वाले स्वामी निगमानंद की मौत पर भी दो बूंद आंसू के बहाने होंगे क्योंकि वे भी सिविल सोसायटी के ही लोग हैं. समाज के ये तबके भी खंडित न हों – इसका भी ध्यान रखना होगा. गांधी को आत्मसात करना होगा. समझना होगा कि अरब जगत में लोकतंत्र की आंधी चलने पर ट्यूनीशिया और मिस्र जैसे भाग्यशाली सभी राष्ट्र नहीं है, जहां शासक जनसैलाब में बेदखल हो सिर्फ इतिहास की किताबों के पन्नों में समा गए, वहां आज भी झंझावात में उलझे लीबिया और सीरिया जैसे देश भी हैं. लेकिन यहां तो कहानी उस हिंदुस्तान की है, जो हजारों साल से अनगिनत उतार-चढ़ाव झेलने का आदी रहा है, जहां आज भी गांधीवाद और गांधीटोपी नहीं, गांधी ही याद किए जाते है; तो रामदेव और राम मंदिर नहीं, देश की आत्मा को राम ही लुभाते हैं.
लेखक गिरीश मिश्र लोकमत समाचार के संपादक हैं. उनका यह लिखा लोकमत समाचार में प्रकाशित हो चुका है, वहीं से साभार लेकर इसे यहां प्रकाशित किया गया है.

