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विकास नहीं विश्‍वास से सुलझेगी नक्‍सल समस्‍या

सतीश सिंह: आदिवासियों को योजनाबद्ध तरीके से जंगल से किया जा रहा दूर : आतंरिक सुरक्षा के लिये नक्‍सलवाद सबसे बड़ा खतरा : प्राकृतिक एवं खनिज संसाधनों की जमकर की जा रही है लूट : आज नक्सल समस्या वहीं है जहां जंगल, खनिज संपदा और आदिवासी हैं। विकास से तो पूरा देश महरुम है और गरीबी ज्‍यादातर घर की थाती है, फिर भी नक्सल समस्या मूल रुप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में है। बिहार और आंध्रप्रदेश में नक्सल समस्या ज्यादा गंभीर नहीं है। सच कहा जाए तो आंध्रप्रदेश में नक्सलियों का तकरीबन सफाया हो चुका है। बिहार में भी यह अब अंतिम कगार पर है। ऐसे में यह कहना कि नक्सल समस्या का समाधान सिर्फ विकास से हो सकता है, कहीं से भी समीचीन प्रतीत नहीं होता है। आज विकास के नाम पर जंगल और आदिवासियों की जमीन को योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है। कॉरपोरेट हाऊस, सरकार और प्रशासन की मिलीभगत से प्राकृतिक संसाधनों को जमकर लूटा जा रहा है।

सतीश सिंह

सतीश सिंह: आदिवासियों को योजनाबद्ध तरीके से जंगल से किया जा रहा दूर : आतंरिक सुरक्षा के लिये नक्‍सलवाद सबसे बड़ा खतरा : प्राकृतिक एवं खनिज संसाधनों की जमकर की जा रही है लूट : आज नक्सल समस्या वहीं है जहां जंगल, खनिज संपदा और आदिवासी हैं। विकास से तो पूरा देश महरुम है और गरीबी ज्‍यादातर घर की थाती है, फिर भी नक्सल समस्या मूल रुप से झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में है। बिहार और आंध्रप्रदेश में नक्सल समस्या ज्यादा गंभीर नहीं है। सच कहा जाए तो आंध्रप्रदेश में नक्सलियों का तकरीबन सफाया हो चुका है। बिहार में भी यह अब अंतिम कगार पर है। ऐसे में यह कहना कि नक्सल समस्या का समाधान सिर्फ विकास से हो सकता है, कहीं से भी समीचीन प्रतीत नहीं होता है। आज विकास के नाम पर जंगल और आदिवासियों की जमीन को योजनाबद्ध तरीके से खत्म किया जा रहा है। कॉरपोरेट हाऊस, सरकार और प्रशासन की मिलीभगत से प्राकृतिक संसाधनों को जमकर लूटा जा रहा है।

झारखंड एवं छत्तीसगढ़ में आज भी पुलिस व प्रशासनिक सेवा के अधिकारी खनिज संपदा वाले इलाकों में अपनी पदस्थापना करवाने के लिए नेताओं को लाखों-करोड़ों की रिश्‍वत देते हैं। खानों की नीलामी रिश्‍वत लेकर कॉरपोरेट हाऊसों को औने-पौने दामों में कर दी जाती है। विकास के नाम पर कारखाने लगाये जा रहे हैं, लेकिन इसके लिए आदिवासियों की जमीन को बिना उसका वाजिब मुआवजा उन्हें दिए हुए सरकार उसे कॉरपोरेट हाऊसों के हवाले कर रही है। फलतः जल, जंगल और जमीन तेजी के साथ लुप्त होते जा रहे हैं। आदिवासियों का जीवन जंगलों में पलता है। वहीं उनका जीवन भी है। उसके सहारे ही वे अपनी सभ्यता-संस्कृति को सहेजते हैं। अगर उनको अपार्टमेन्ट और मॉल के जंगल में छोड़ दिया जाए तो वे बिना पानी की मछली के तरह तड़प-तड़प कर मर जायेंगे।

21 अप्रैल 2010 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि नक्सलवादी हिंसा आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है। बावजूद इसकेनक्सलवाद की समस्या दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होती चली जा रही है। केंद्र सरकार इस मुद्दे पर संजीदा होने का दिखावा तो करती है, पर इस समस्या को समाप्त करने के संबंध में तनिक भी चिंतित नहीं है। वैसे नक्सल हिंसा को रोकने के लिए राज्य की पुलिस और पारा मिलिट्री फोर्स लगातार कोशिश कर रहे हैं, परन्तु नक्सलवादी योजना के आगे हर बार उनको मुंह की खानी पड़ती है। कभी आतंकवाद से देश  परेशान था, लेकिन अब आतंकवाद से भी ज्यादा गंभीर समस्या नक्सलवाद बन गया है। यही कारण है कि अब आतंकवाद से ज्यादा नक्सलवाद की वजह से लोग मरने लगे हैं।

वस्तुस्थिति से स्‍पष्‍ट है कि समस्या के मूल में सिर्फ विकास नहीं है। यह जरुर है कि नक्सलवादी क्षेत्रों में विकास करने से उसका फायदा आदिवासियों को मिलेगा, किंतु इसके साथ-साथ हमें जल, जंगल और खनिज संपदा को भी बचाना होगा। स्वरोजगार, सरकारी राहत का जंगलों में प्रवेश, शोषण रहित्त माहौल, आपसी विश्‍वास और भाईचारा जैसे सकारात्मक पहलुओं का जंगलों में प्रवेश आज समय की मांग है। नक्सलवाद की संकल्पना वामपंथी विचारधारा से बहुत हद तक मेल खाता है। आज की तारीख में सभी नक्सल नेता मार्क्सवादी व लेनिनवादी विचारों वाले हैं।

अन्य नेताओं की तरह ही नक्सल नेताओं का भी उद्देश्‍य मोटे तौर पर केवल अपने हित की रोटी सेंकना है। इसलिए आदिवासियों का तभी भला हो सकता है जब इन तथाकथित नक्सली नेताओं का नकेल बढ़िया से कसा जाये। यदि इन नेताओं पर काबू कर लिया जाता है तो आधी नक्सल समस्या का समाधान स्वतः ही हो जायेगा। जिस तरह से आजादी के बाद से मुसलसल आदिवासियों की जमीन को हड़पा जा रहा है, जंगल में रहने का हक छीना जा रहा है, उनके अपने ही जंगल के उपभोग से रोका जा रहा है, इसके कारण आदिवासी अपना आपा खो चुके हैं और अब वे अपने अधिकारों की रक्षा के लिए हथियार उठाने से भी गुरेज नहीं कर रहे हैं। दरअसल गरीब और उपेक्षित इंसान को सब्जबाग दिखाकर उनको बरगलाना बहुत ही आसान होता है। यह तब और आसान हो जाता है जब भ्रटाचार का हर तरफ बोलबाला हो।

नक्सलबाड़ी में 1967 में शुरु होने के बाद से नक्सल आंदोलन ने बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे हैं। पहले आदिवासियों से कहीं ज्यादा गैर आदिवासी इस आंदोलन से जुड़े हुए थे, लेकिन धीरे-धीरे नक्सलवाद सघन जंगल वाले इलाकों में सिमटता चला जा रहा है। बिहार में भी आहिस्ता-आहिस्ता नक्सल समस्या कम हो रही है। इसका मूल कारण प्रशासनिक व कानूनी सुधार और भ्रटाचार पर लगाम लगाना है। इन सुधारों के कारण आज पूरे राज्य में विश्‍वास का माहौल कायम हो रहा है। नक्सलियों की ताकत को कम करने में ‘आपकी सरकार आपके द्वार’ कार्यक्रम बिहार में काफी सफल रहा है। इसकी वजह से अब आम आदमी वहां अपने को सुरक्षित महसूस कर पा रहा है। गृह मंत्री श्री पी चिदंबरम भी अन्य राज्यों को बिहार से सीख लेने की सलाह दे रहे हैं।फिलवक्त नक्सल समस्या आदिवासी बहुल इलाकों में ज्यादा गंभीर है।

इसमें दो राय नहीं है कि केवल विकास की गंगा को बहाकर नक्सल समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता है। इसके बरक्स में प्रशासनिक व कानूनी सुधार के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन हेतु सकारात्मक कार्यों को प्राथमिकता के साथ किए जाने की जरुरत है। इस संदर्भ में सबसे अहम् काम है आदिवासियों के बीच विश्‍वास की जमीन को तैयार करना। यह तभी संभव होगा जब वहां खनन के कार्यों पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाया जाए। आदिवासियों को उनकी जमीन लौटायी जाए। उनके घर को उजड़ने से बचाया जाए। विकास से किसी को कोई आपत्ति नहीं है, परन्तु वैसा विकास किस काम का जो किसी का घर उजाड़ दे।

लेखक सतीश सिंह स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और स्वतंत्र लेखन करते हैं.

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