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विनाश काले विपरीत बुद्धि

सुरेश नीरवविनाश काले विपरीत बुद्धि। जी हां, जब सत्यानाश होना होता है तो अच्छे-अच्छे अक्लमंद भी उलट बुद्धि हो जाते हैं। चाहे नर हो या नारी, अधिकारी हो या भिखारी, ऐसे आपत्तिकाल में उनकी अक्ल मौका देखकर पतली गली से घास चरने चली जाती है। ऐसे भीषण विपत्ति के समय में जिनकी बुद्धि घास चरने के लिए अखिल भारतीय तो क्या मोहल्ले स्तर के चारागाह के पर्यटन का भी साहस नहीं जुटा पाती है, तो शास्त्रों और उपनिषदों के मुताबिक ऐसे भीरु व्यक्ति की अक्ल में तब पत्थर पड़ने का ईश्वरप्रदत्त प्रावधान तुरंत सेवा की स्टाइल में अपने आप लागू हो जाता है। प्रगतिशील लोग जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते हैं, वो इस पत्थर डालने की घटना में किसी प्रतिक्रियावादी एजेंसी का हाथ मानते हैं। पत्थर पड़े दिमाग के प्लाट में खड़ा यक्ष आईक्यू टेस्ट लेने के लिए किसी खबरिया चैनल के पत्रकार की तर्ज पर राह चलते लोगों को पकड़-पकड़ के धमकाता है कि इधर आओ और बताओ अक्ल पर पत्थर डालने का काम कौन करता है। समझदार लोग पीछा छुड़ाने के लिए कहते हैं कि अक्ल पर पत्थर कौन डालता है इसकी जानकारी सीबीआई को तो छोड़िए सीआईए तक को नहीं है, बास। फिर हम किस खेत की गैर-मामूली मूली है।

सुरेश नीरव

सुरेश नीरवविनाश काले विपरीत बुद्धि। जी हां, जब सत्यानाश होना होता है तो अच्छे-अच्छे अक्लमंद भी उलट बुद्धि हो जाते हैं। चाहे नर हो या नारी, अधिकारी हो या भिखारी, ऐसे आपत्तिकाल में उनकी अक्ल मौका देखकर पतली गली से घास चरने चली जाती है। ऐसे भीषण विपत्ति के समय में जिनकी बुद्धि घास चरने के लिए अखिल भारतीय तो क्या मोहल्ले स्तर के चारागाह के पर्यटन का भी साहस नहीं जुटा पाती है, तो शास्त्रों और उपनिषदों के मुताबिक ऐसे भीरु व्यक्ति की अक्ल में तब पत्थर पड़ने का ईश्वरप्रदत्त प्रावधान तुरंत सेवा की स्टाइल में अपने आप लागू हो जाता है। प्रगतिशील लोग जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते हैं, वो इस पत्थर डालने की घटना में किसी प्रतिक्रियावादी एजेंसी का हाथ मानते हैं। पत्थर पड़े दिमाग के प्लाट में खड़ा यक्ष आईक्यू टेस्ट लेने के लिए किसी खबरिया चैनल के पत्रकार की तर्ज पर राह चलते लोगों को पकड़-पकड़ के धमकाता है कि इधर आओ और बताओ अक्ल पर पत्थर डालने का काम कौन करता है। समझदार लोग पीछा छुड़ाने के लिए कहते हैं कि अक्ल पर पत्थर कौन डालता है इसकी जानकारी सीबीआई को तो छोड़िए सीआईए तक को नहीं है, बास। फिर हम किस खेत की गैर-मामूली मूली है।

कुछ विद्वान जोर देकर कहते हैं कि ऐसे विश्वकल्याण के कार्य करने का ग्लोबल ठेका तो अमेरिका के ही पास है और वह ऐसे जनहितकारी कृत्य सीआईए के जरिए ही कराता है। बड़े करुणा भाव से सीआईए किसी शरीफ आदमी को पकड़ती है और विश्वहित में उसकी अक्ल पे पत्थर डालती है। फिर मीडिया के जरिए उसका नाम उछालती है। सद्दाम हुसैन और ओसामा बिन लादेन-जैसे प्रचंड नौनिहालों का उद्धार इसी कल्याणकारी संस्था के जरिए ही हुआ है। और भविष्य में भी अमेरिका की कृपा से होता रहेगा। लेकिन हमारी कालोनी की मिस कालीशंकर की अक्ल पे पत्थर किसने डाले इस मामले में अभी तक कोई जांच आयोग नहीं बैठा है, इसलिए विश्वासपूर्वक तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता है पर अक्ल पे पत्थर पड़ गए हैं, इस मामले में विश्व के सभी विद्वानों की बहुमत के साथ सर्वसम्मति है।

बताया जा रहा है कि अपने श्याम सलौने अलौकिक सौंदर्य के कारण सोसायटी में सेलिब्रटी का दर्जा हासिल कर चुकी और कालीमाई के नाम से पूजित मदाम काली शंकर को अपने मौलिक श्यामवर्ण को त्यागकर गोरे होने की सनक पता नहीं कैसे और कहां से आ गई, यह सोचकर सब लोग हैरान हैं। कुछ लोगों का मानना है कि इस विध्वंसकारी विचार की जड़ टीवी पर आनेवाला गोरेपन की किसी क्रीम का विज्ञापन है। इस विज्ञापन ने ही मैडम कालीशंकर का दिमाग फेर दिया और वे गोरे होने की मुश्किल कवायद में जुट गईं। अब बदनसीबी देखिए कि वैसे तो हमारे इंडिया में नकली घी भी असली नहीं मिलता पर पता नहीं इन मैडम को ये गोरेपन की असली और ओरीजनल क्रीम कहां से किसने टिपा दी। मैडम को ये दुर्लभ संजीवनी कहां से मिल गई ये सोच-सोचकर खुद कंपनीवाले परेशान हैं। यह हादसा किसी कर्मचारी की लापरवाही से हुआ है या कि इस षडयंत्र में किसी प्रतिद्वंदी कंपनी का हाथ है, इसकी असलियत खंगालने की हाड़तोड़ कसरत के मारे गोरेपन की क्रीम बनानेवाली कंपनी के अफसरों के खुद के ही चेहरे काले पड़ गए हैं।

कंपनी-विरोधी गतिविधि में शामिल होने के शक में तमाम कर्मचारियों को बिना नोटिस दिए नौकरी से ऐसे निकाल दिया गया है जैसे कि गोरी पुलिस ने बिना सूचना दिए जलियंवालाबाग में निहत्थों पर गोलियां चलाकर उन्हें इस संसार से निकाल दिया था। मगर तमाम जुल्म और जंग के बावजूद असली मुल्जिम की शिनाख्त अभी तक नहीं हो पायी है। कंपनी के इतने लंबे इतिहास में ऐसी संगीन वारदात आजतक नहीं हुई है। गोरेपन का विज्ञापन कर के पब्लिक में माल खपाना एक बात है और सचमुच में किसी का गोरा हो जाना दीगर बात है। मगर मैडम कालीशंकर के साथ तो यह अजूबा हो ही गया। आखिर ऐसा हुआ कैसे। ऐसा अचूक नुस्खा कंपनी के पास तो क्या इस धरती पर भी  कहीं नहीं है, ऐसा दृढ़ विश्वास कंपनी के मालिकों को था, मगर आज ये अटल विश्वास जनता पार्टी की तरह चूर-चूर हो गया।

आखिर ये क्रीम बनी कैसे। किसने बनाई। और वो भी हमारे ही ब्रांड से। किस जालिम ने ये चोट दी है, जिससे न रोते बने न हंसते। अगर एक क्रीम की डिबिया से लड़कियां सचमुच गोरी होने लगीं तो इस खबर का असर ये होगा कि रातों-रात हमारा सारा स्टाक खत्म हो जाएगा। दुकानों पर मधुमक्खियों के छत्तों की तरह लड़कियां टूट पड़ेंगी। और फिर जब कोई लड़की सचमुच में गोरी नहीं होगी तो हमारी कंपनी की गुडविल तो ऐसे ही खत्म हो जाएगी जैसे कांग्रेस में एनडी तिवारी की हो गई है। कौन है जो हमारी कंपनी का डुप्लीकेट माल बेच रहा है। कंपनी के आका खोपड़ी खुजा-खुजाकर गंजे हो रहे हैं। उधर मैडम कालीशंकर परेशान हैं। उनकी परेशानी के आगे कंपनीवालों की परेशानी उतनी ही तुच्छ है जितनी कि हिमालय के आगे कोई आइसक्रीम होती है। एक नहीं ऐसी दस कंपनियों के घाटे से दसगुना ज्यादा घाटा मैडम कालीशंकर का गोरे हो जाने के कारण हो गया है। सबसे बड़ी ट्रेजिडी तो ये हुई है कि मैडम कालीशंकर के महापतिदेव सर भोलेशंकर महादेवन ने इन्हें तलाक देने का मन बना लिया है। उन्हें देवी कालीशंकर की इस बचकानी हरकत से मल्टीपल नाराजगियां हैं। इस गुस्से से निकली ऊर्जा के कारण महादेवनजी का तीसरा नेत्र ऐसे खुल गया है, जैसे अधिक भाप बन जाने के कारण प्रेशर कुकर की सीटी खुल जाए। उन्होंने मैडम को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए निम्नलिखित बिंदुवार प्रश्न पूछे हैं-

(1) आप जानती हैं कि मैंने आपको आपके श्याम-सलौने रंग के कारण ही अपनी पत्नी-कैबिनेट में शामिल किया था। क्योंकि इस वर्ण, गोत्र और समाज की आप अकेली प्रतिनिधि थीं, तो फिर आपने बिना सुप्रीमों से अनुमति लिए बिना गोरे होने का ये महत्वपूर्ण पैसला कैसे ले डाला।

(2) क्या आपके इस अदूरदर्शी कदम से जिन क्षेत्रों की आप एकक्षत्र नेत्री थीं, वहां के लोग अब आपको अपना इष्ट-शिष्ट प्रतिनिधि स्वीकार कर पाएंगे।

(3) पत्नी कैबिनेट की अन्य गौरवर्ण सदस्याएं आपके गोरे होने की इस हरकत को अपने अस्तित्व के खिलाफ आप द्वारा रचा जा रहा षडयंत्र नहीं मानेंगी। मैं उनकी आशंकाओं को किन तर्कों के आधार पर संतुष्ट कर सकता हूं, बताएं।

(4) याद रहे कि संगठन में व्यक्ति महत्वपूर्ण नहीं होता है। व्यक्ति की ताकत संगठन से होती है। आपकी इस हरकत से संगठन का ही अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। इसलिए इस पत्र प्राप्ति के तुरंत बाद से आपको न केवल संगठन से बल्कि पत्नी कैबिनेट से भी निष्काषित किया जाता है। इसके साथ ही असम, उड़ीसा और बंगाल की प्रभारी संपत्ति से भी आपको बेदखल किया जाता है।

(5) याद रहे काली हमारे संगठन का ब्रांड नेम है, इसलिए आज से आप काली नाम का उपयोग अपने व्यक्तिगत हित में नहीं कर सकेंगी, वैसी भी अब आप न तो काली रह गई हैं और न संगठन की सदस्य। अब आप गोरी, चकोरी कोई भी नाम रखने के लिए स्वतंत्र हैं।

(6) साथ ही आपको निर्देश दिया जाता है कि आप को संगठन के कार्य हेतु जो शेर की दहशतवाली लालबत्ती की कार दी गई थी, उसे और आत्म रक्षा के लिए दिए गए अस्त्र-शस्त्रों को आप तत्काल प्रभाव से संस्था को वापस कर दें। क्योंकि पार्टी से निकाले गए सदस्य की सुरक्षा का जिम्मा तो बीजेपी तक नहीं लेती है। और कांग्रेस तो संगठन में रहते हुए भी सदस्यों की सुरक्षा का जिम्मा नहीं लेती है। वरना पार्टी के दो शीर्ष नेताओं की नृशंस हत्या कैसे हो जाती। खैर हमें दूसरों के संगठन के आंतरिक मामलों में बोलने की कोई आदत नहीं है। ये उदाहरण तो हमने अपनी कार्वाई को जायज ठहराने की नियत से दिए हैं।

(7) आशा है आप प्रसन्न हैं..

(8) प्रतिलिपि समस्त शाखाओं को प्रेषित

हस्ताक्षर

भोलेशंकर महादेवन

मैडम कालीशंकर ने तो सपने में भी नहीं सोचा होगा कि गोरे होने का जो उनका सपना था वो साकार होकर उनके लिए इतना भारी पड़ेगा। आज उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा उखड़-उजड़कर उतनी ही रह गई है, जितनी कि राज ठाकरे की नजर में किसी उत्तर भारतीय की। और-तो-और मैडम काली शंकर के बदले हुए गेटअप को देखकर मुहल्ले के कल्लू और कालिया जैसे टुच्चे भी- गोरी चलो न हंस की चाल, जमाना दुश्मन है जैसे जागरण गीत गाते हुए अपनी दबी हुई श्रद्धा का सरे आम खुलासा करने लगे हैं। अब कोई भी मैडम कालीशंकर से नहीं डरता है। वो तो काले रंग का ही कमाल था, जिससे चलता था कालीमाई का काला जादू। कभी इसी मुहल्ले में जब कभी कालीशंकर निकलती थीं तो तो लोग जयकाली..कलकत्तेवाली के कोरसी जयकारे के साथ, मैडम का स्वागत किया करते थे। अब काली न घर की रही न कालीघाट की। एक गोरेपन की सनक से काली हर जगह से निकाली गई। एक गोरेपन के फितूर ने न जमीं का रक्खा न आसमान का। लालच में गोरी मुई, मोती रही न सीप। इधर मैडम कालीशंकर का हाल बेहाल था, उधर गुस्साई कन्या-कालियों ने गोरेपन की क्रीम बनानेवाली फैक्टरी को जलाकर काली राख कर दिया। गोरेपन की क्रीम का ये कैसा कहर..जिसने बनाया और जिसने लगाया दोनों ही बरबाद हो गए।

व्यंग्य लेखक पंडित सुरेश नीरव हिंदी काव्यमंच के लोकप्रिय कवि हैं. 16 पुस्तकें प्रकाशित. 7 धारावाहिकों का पटकथा लेखन. अंग्रेजी, उर्दू, फ्रेंच में अनुवाद. 30 वर्ष तक कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध. छब्बीस देशों की विदेश यात्राएं. भारत के राष्ट्रपति से सम्मानित. आजकल स्वतंत्र लेखन और यायावरी. उनसे संपर्क सुरेश नीरव, आई-204, गोविंद पुरम, गाजियाबाद या मोबाइल नंबर 09810243966 के जरिए किया जा सकता है.

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