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सरकार भले ही कुछ न दे पर आमजन की मुश्किलें न बढ़ाए

बीपी गौतमयूपीए सरकार-टू में भी वित्तमंत्री के रूप में पारी खेल रहे प्रणव मुखर्जी एक बार फिर 28 फरवरी को देश और देशवासियों का भाग्य लिखेंगे। हमेशा की तरह ही सरकारी-गैर सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के साथ आम आदमी भी उनकी ओर टकटकी लगाये हुए है, लेकिन इस बार भी सबसे अहम देखने की बात यही रहेगी कि वह गांव, गरीब या देश के आम नागरिक का दर्द कितना महसूस कर पाते हैं और उसकी आशाओं पर कितना खरा उतरते हैं? वैसे उन पर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कंपनियों को खुश करने का ही दबाव इस बार भी अधिक है। आम आदमी को कागजी आंकड़ेबाजी या लुभावनी बातों या दावों से अब कोई मतलब नहीं रह गया है। वह चाहता है कि बाजार उसकी पहुंच में हो। रोटी, कपड़ा, मकान, दवा, खाद, बीज, पानी और शिक्षा के लिए भी उसे संघर्ष न करना पड़े।

बीपी गौतम

बीपी गौतमयूपीए सरकार-टू में भी वित्तमंत्री के रूप में पारी खेल रहे प्रणव मुखर्जी एक बार फिर 28 फरवरी को देश और देशवासियों का भाग्य लिखेंगे। हमेशा की तरह ही सरकारी-गैर सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों, उद्योगपतियों और पूंजीपतियों के साथ आम आदमी भी उनकी ओर टकटकी लगाये हुए है, लेकिन इस बार भी सबसे अहम देखने की बात यही रहेगी कि वह गांव, गरीब या देश के आम नागरिक का दर्द कितना महसूस कर पाते हैं और उसकी आशाओं पर कितना खरा उतरते हैं? वैसे उन पर उद्योगपतियों, पूंजीपतियों और कंपनियों को खुश करने का ही दबाव इस बार भी अधिक है। आम आदमी को कागजी आंकड़ेबाजी या लुभावनी बातों या दावों से अब कोई मतलब नहीं रह गया है। वह चाहता है कि बाजार उसकी पहुंच में हो। रोटी, कपड़ा, मकान, दवा, खाद, बीज, पानी और शिक्षा के लिए भी उसे संघर्ष न करना पड़े।

आम आदमी की इस छोटी सी आशा को भी वित्तमंत्री साकार नहीं कर पाते हैं, तो फिर इस बार के बजट से भी प्रगति का मार्ग प्रशस्त नहीं होगा, क्योंकि आम आदमी सशक्त होगा, तो देश स्वत: ही सशक्त हो जायेगा। अच्छी तरह ध्यान रखना चाहिए कि मुट्ठी भर लोगों के करोड़पति हो जाने से या उनका मुनाफा और बढ़ जाने से आम आदमी को न कोई लाभ होने वाला है और न ही कोई खुशी मिलने वाली है।

महंगाई ने पूरे साल ताडंव किया। हर जरूरी वस्तु के दाम उछलते देखे गये, लेकिन उचित उपाय करने की बजाये प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री का यही बयान सुनाई देता रहा कि चिंता की बात नहीं है। जीडीपी लगातार बढ़ रही है, जो बेहद खुशी की बात है। वित्त मंत्री को अपना यह बयान बजट बनाते समय ध्यान रखना होगा, क्योंकि किसी भी देश की जीडीपी उस देश के मूल कार्य पर ही निर्भर होती है और भारत का मूल कार्य कृषि है, जो आम आदमी की आमदनी का प्रमुख स्रोत है। समस्याओं से जूझ रहे आम आदमी को रोटी, कपड़ा, मकान, खाद, पानी, बीज, दवा और शिक्षा उन्होंने सही मूल्य पर उपलब्ध करा दिये और उनके उत्पादन को सही मूल्य दिलाने की दिशा में एक कदम उठा दिया, तो अगले वर्ष तक ही परिवर्तन स्पष्ट नजर आने लगेगा। जीडीपी की स्थिति कागजों में जो भी रहे, अगर मौके की स्थिति सुधर गयी, तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, इसलिए वित्त मंत्री को कागजी आंकड़ेबाजी से दूर ही रहना चाहिए, क्योंकि उससे उन्हें किसी तरह की सहानुभूति नहीं मिलने वाली।

गत वर्ष 26 फरवरी को बजट पेश करते समय उन्होंने सभी को खुश करने का प्रयास किया, जिसके दुष्परिणाम सामने हैं। जरूरत से बहुत कम या सभी को थोड़ा-थोड़ा देने से किसी का भला नहीं होने वाला। इसलिए एक बार एक भूखे का पेट भरना ही होगा। यूपीए-वन और टू में अगर इसी नियम का पालन किया गया होता, तो आज देश की तस्वीर कुछ और ही नजर आ रही होती, पर दु:ख की बात यही है कि आम आदमी की जरूरत सिर्फ चुनाव के दौरान ही महसूस की जाती है, जिससे वह एक कदम आगे बढऩे की बजाये दो कदम पीछे चला जाता है। बाजार के डगमगाते रहने का मूल कारण यही है कि खरीददार संपन्न नहीं हैं, क्योंकि आम आदमी की जेब में पैसा होगा, तो बाकी सब की जेब में पैसा स्वत: पहुंच ही जायेगा। बस, जरूरत आम आदमी को सशक्त बनाने की है, लेकिन वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी की नजर में गांव की तुलना में शहर महत्वपूर्ण हैं, तभी गत वर्ष के बजट में उन्होंने शहरी विकास के लिए आवंटित धनराशि में 75 फीसदी का इजाफा किया, पर इस बार आशा है कि वह सूखा व बाढ़ से निपटने के साथ हरित क्रांति लाने के लिए विद्युत व सिंचाई व्यवस्था का भी विशेष ध्यान रखेंगे।

स्वास्थ्य की दृष्टि से देखा जाये, तो हालात असहनीय ही हैं। शिशु मृत्यू दर में भी सुधार नहीं हो पा रहा है। भारत में प्रति हजार शिशु मृत्यू दर करीब 56 फीसदी है, जबकि दूसरे नंबर पर ब्राजील में 31 फीसदी ही है। प्रति एक लाख की आबादी पर अमेरिका में 256, आस्ट्रेलिया में 247, ब्राजील में 115 और भारत में साठ डाक्टर के हवाले एक लाख जिंदगियां हैं। वयस्क शिक्षा दर के आंकड़ों पर नजर डाली जाये, तो अमेरिका में 99 फीसदी, आस्ट्रेलिया में भी 99 फीसदी, चीन में 91 फीसदी व ब्राजील में करीब 89 फीसदी लोग साक्षर हैं, जबकि दुनिया को टक्कर देने जा रहे भारत का आंकड़ा 61 फीसदी ही है। सिंचाई की दृष्टि से भारत प्रति वर्ग लाख किमी में सिर्फ 5.58 फीसदी हिस्सा सींचने में सक्षम है, जबकि अर्थ व्यवस्था में कृषि क्षेत्र का महत्वपूर्ण और प्रमुख योगदान है, इस लिए इन क्षेत्रों में अधिक धन देना ही पड़ेगा।

दुनिया के सभी देश अपनी मूल जरूरतों पर ही अधिक खर्च करते हैं। गत वर्ष के बजट पर नजर डाली जाये, तो चीन ने रक्षा क्षेत्र पर 32413 करोड़ रुपये जारी किये। वह एशिया का सबसे बड़ा दबंग बनता जा रहा है, पर भारत को इसकी कोई चिंता नहीं है, तभी पिछले साल भारत ने मात्र 147344 करोड़ रुपये दिये, जो सही से खर्च भी नहीं हो पाये। पिछले साल ब्रिटेन ने शिक्षा क्षेत्र पर 5627 करोड़ रुपये खर्च किये और भारत ने 3136 करोड़ रुपये दिये। सामाजिक क्षेत्रों के लिए गत वर्ष अमेरिका ने अपने 31 करोड़ लोगों के लिए कुल 323255 करोड़ रुपये खर्च किये, जबकि अपने वित्त मंत्री ने सवा अरब लोगों के लिए 137674 करोड़ रुपये जारी किये। आमदनी की दृष्टि से सरकार के पास धन के पर्याप्त स्रोत हैं और खजाने में पर्याप्त धन है भी, क्योंकि आमदनी लक्ष्य से बढ़ कर ही हो रही है, पर धन कमाने से अधिक खर्च करने के लिए बुद्धि चाहिए एवं निजी स्वार्थों को भी दरकिनार करना पड़ता है। अगर ऐसा हो गया, तो स्पष्ट तौर पर बजट बनाते समय आम आदमी या देश ही नजर आयेगा, पर कहीं न कहीं निजी स्वार्थ भारी पड़ जाते हैं और सब कुछ जानते हुए विपरीत निर्णय ले लिये जाते हैं। ऐसा ही कुछ पिछले बजट के दौरान दिखता रहा है, पर आशा है कि इस बार ऐसा नहीं होगा।

सिक्योरिटी कांट्रैक्ट रेगुलेशन एक्ट में भी और सुधार की जरूरत है। उद्योगपतियों की नाराजगी नजरअंदाज करते हुए शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों में पब्लिक होल्डिंग बढ़ानी ही होगी, क्योंकि सरकारी कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, नाल्को, पावर ग्रिड कारपोरेशन और निजी क्षेत्र की रिलायंस पावर, टेक महिंद्रा, विप्रो, डीएलएफ, टाटा कम्यूनिकेशन आदि प्रमुख कंपनियों में पब्लिक होल्‍िडंग बेहद कम है, तभी इनसे जुड़े लोग अप्रत्याशित तरीके से धनाढ्य होते जा रहे हैं, पर ऐसे निर्णय लेने के लिए साहस की जरूरत होती है, जो कम ही दिखता है। खैर, जो भी हो, लेकिन आम आदमी इसी बात से संतुष्ट हो जायेगा कि वित्त मंत्री भले ही उसे कुछ न दें, पर मुश्किलें और न बढ़ायें।

लेखक बीपी गौतम मान्‍यता प्राप्‍त स्‍वतंत्र पत्रकार हैं.

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