यह तस्वीर है छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के मानपुर क्षेत्र के मदनवाड़ा गाँव की. प्राप्त जानकारी के अनुसार जो बैलगाड़ी है उस पर रखी है मदनवाड़ा के सरपंच यानी मुखिया की लाश. उससे भी भयानक बात यह बतायी जा रही है कि इस तथाकथित बैलगाड़ी को खींच रहे हैं उस इलाके के ग्रामीण. कहानी यह बतायी जा रही है कि नक्सलियों ने 19 सितम्बर को मदनवाड़ा के सरपंच की हत्या कर दी थी और अब उसकी लाश को मानपुर तक पोस्टमार्टम के लिए लाना था. यह सफ़र लगभग 25-30 किलोमीटर का था. उससे भी सोचने वाले बात यह बतायी जा रही है कि इस मदनवाड़ा में पुलिस और आईटीबीपी दोनों का कैम्प है. इस तरह पहली सोचने वाली बात यह सामने आती है कि उसी गाँव में कैम्प के होते हुए भी नक्सलियों ने गाँव के मुखिया का ही अपहरण कर लिया और फिर उसकी हत्या कर दी. यह सूचना देने वाले राजनांदगांव जिले के ही अतुल श्रीवास्तव के अनुसार लाश को मानपुर तक पहुंचाने की हिम्मत फोर्स में नहीं हुई और उसने ग्रामीणों को फरमान जारी कर दिया गया, अतुल बताते हैं कि बेचारे ग्रामीणों ने लाश को बैलगाड़ी में रखा और बैल की जगह खुद जुतकर लंबा सफर कर मानपुर पहुंचे. रास्ते में नदी पड़ी, ग्रामीण खुद डूबकर निकले, लाश भी नदी में डूब कर मानपुर पहुंची. इस पर अतुल श्रीवास्तव टिपण्णी करते हैं, “अब यदि ये कहें कि राजनांदगांव जिले के मानपुर क्षेत्र में इन दिनों नक्सलियों की सरकार चल रही है तो क्या गलत है.”
ज्ञातव्य हो कि यह राजनांदगांव जिला वही है, जहां करीब डेढ साल पहले इस क्षेत्र के मदनवाड़ा में तात्कालिक पुलिस अधीक्षक सहित 30 जवानों की हत्या नक्सल गतिविधियों में हो गयी थी. उन लोगों की शहादत के बाद राजनांदगांव जिले के मदनवाड़ा में आईटीबीपी और जिला पुलिस बल ने एक अभेद किला तैयार किया. इसके बाद भी इस तरह की घटनाएं हो जा रही हैं.यह इस पूरे परिदृश्य का एक पहलू हुआ. अब दूसरा दृश्य देखें. इसी देश में रहने वाले कई सारे “भयानक” बुद्धिजीवी हैं जिन्हें ये नक्सली कभी सताए हुए, कभी जुझारू तो कभी-कभी तो देश-भक्त तक नज़र आने लगते हैं. मैंने सुना है कि एक स्थान पर अरुंधति नामक एक विशालकाय बोधिसत्व व्यक्तित्व ने एक नया फ़ॉर्मूला दिया जिसके अनुसार- “माओवादी एक तरह से देशभक्त हैं.”
अब ये दोनों ही सोच इस प्रक्रिया के दो विपरीत ध्रुव से जान पड़ते हैं. इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ताकत और शक्ति के प्रदर्शन मात्र से नक्सलवाद जैसी समस्या को पूरी तरह कुचला नहीं जा सकता, क्योंकि ये अपने साथ हिंसा के अलावा एक विचारधारा भी ले कर चलते हैं.
अब मैं और आप उस विचारधारा से सहमत हो सकते हैं या असहमत, पर एक सिरे से यह कह देना कि उनके साथ कोई जनमत या कोई विचार संग्रह नहीं है, उचित नहीं होगा. एकाकी हिंसा या एक हिंसक व्यक्तित्व अकेले उसी रूप में कभी भी लम्बे समय तक अपने आप को प्रभावी नहीं बना सकता- उसे जरूरत होती है विचारों की, समर्थन की, पिछ्ल्ल्गुओं की. चाहे वे विचार सही हों, गलत हों, उनके उद्देश्य सही हों या गलत पर उन विचारों और उनके समर्थकों के बिना सारे तथाकथिक “आपराधिक” कृत्य ताश के पत्तों की तरह ढह जायेंगे. यही कारण है कि दाउद इब्राहिम जैसा घृणित और कुख्यात अपराधी भी समय के साथ अपने आप को अपराध से परे किसी सांचे में सुरक्षित करने का प्रयास करता है और बाबरी दंगे जैसी घटना को अपने लिए लाभकारी समझते हुए कौम-परस्ती का ताना-बाना बुनता हुआ मुंबई विस्फोट को अंजाम दे देता है, जिससे उसकी जिन्दगी और उसकी स्वीकार्यता में कई गुना वृद्धि हो जाती है और वह कई स्थानों पर हाथों-हाथ लिया जाता है.
कहने का अर्थ यह है कि नक्सलवाद से निपटने के लिए हमें नक्सलियों को आपराधिक कृत्य करने वाले व्यक्तियों के तौर पर देखने के साथ-साथ उनकी शक्ति, उनके समर्थन और उनकी स्वीकारता के आयामों पर भी खुले आँखों से संयमित दृष्टि डालनी पड़ेगी. कहावत है कि- “मूंदहु आँख कतहूँ कछु नाही” उस तरह से तो कोई भी अपनी आँखें मींच ले और कहने लगे कि उसे तो नक्सलियों का कोई समर्थन नहीं दिखता और उन्हें ताश के पत्तों की तरह उड़ा दिया जाएगा. यह उचित दृष्टिकोण नहीं होगा और निश्चित रूप से हानिकारक भी.यदि उन लोगों के पास समर्थन नहीं होता, कहीं ना कहीं विचार हवा में तैरा नहीं करते, कई किस्म की सहानुभूति नहीं हुआ करती तो क्या यह संभव था वे सालों-साल उन्ही गाँवों और शहरों में रह कर अपने आप को न सिर्फ जिंदा किये रखते बल्कि साल-दर-साल अपनी ताकत में इजाफा ही करते जाते.
मेरा मानना है कि नक्सली गतिविधियों पर पूर्ण नियंत्रण की जरूरत है- कारण यह कि एक जगह एक ही सरकार रहे, चुनी गयी सरकार रहे और स्वयंभू शासक नहीं रहे तो बेहतर है. जब कई बार चुनी गयी सरकारों में नाना प्रकार की विषमताएं, कमियाँ और विद्रूपताएं दिख जातीं हैं तो सोचिये कि वे मुट्ठी भर लोग जो स्वयं को ही शासन समझने लगते हैं- बन्दूक की ताकत पर, वे किस हद तक निरंकुश, हानिपरक और खतरनाक हो सकते हैं. बहुत मुश्किल से तो हम राजशाही, तानाशाही और कबीलाई तंत्र से अलग हुए हैं और प्रजातंत्र ( अच्छी या बुरी) हासिल किया है. अब जो गड़बड़ियां हैं उसे यहीं सुधारें, यहां-वहां अज्ञात सुख की चाहत में गोते लगाने से नक्सली और आतंकी हिंसा जैसी बातें ही हाथ लगेंगी. कहावत है ना- “आधी छोड़ पूरे को धावे, आधी मिली ना पूरे पावे.”
अंतिम बात बस यही कि इन स्थितियों को हासिल करने और नक्सलवाद पर समुचित विजय प्राप्त करने के लिए हमें ताकत के साथ-साथ छत्तीसगढ के राजनांदगांव जिले के मानपुर क्षेत्र के इस मदनवाडा गाँव जैसे हर गाँव के हर आदमी का ह्रदय भी जीतना होगा जो कभी भी उन्हें इस प्रकार से बैल की जगह जुतवा कर हासिल नहीं हो सकता. इस प्रकार की घटनाओं से तो उलटे आक्रोश में वृद्धि ही होगी.
लेखक अमिताभ ठाकुर पुलिस अधिकारी हैं. इन दिनों अवकाश लेकर शोध, लेखन और घुमक्कड़ी के काम में व्यस्त हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.

